डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए तमाम छोटे-बड़े आंदोलन किए गए। अंग्रेजी सत्ता को भारत की जमीन से उखाड़ फेंकने के लिए गांधी जी के नेतृत्व में जो अंतिम लड़ाई लड़ी गई थी उसे ‘अगस्त क्रांति’ के नाम से जाना गया है। इस लड़ाई में गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था। यही वजह है कि इसे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ या क्विट इंडिया मूवमेंट भी कहते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत 9 अगस्त 1942 को हुई थी, इसलिए इसे अगस्त क्रांति भी कहते हैं।इस आंदोलन की शुरुआत मुंबई के एक पार्क से हुई थी जिसे अगस्त क्रांति मैदान नाम दिया गया। आजादी के इस आखिरी आंदोलन को छेड़ने की भी खास वजह थी। दरअसल जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने भारत से उसका समर्थन मांगा था, जिसके बदले में भारत की आजादी का वादा भी किया था। भारत से समर्थन लेने के बाद भी जब अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने का अपना वादा नहीं निभाया तो महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम युद्ध का एलान कर दिया। इस एलान से ब्रिटिश सरकार में दहशत का माहौल बन गया। 9 अगस्त 1942 को इस क्रांति का एलान किया गया जिसके कारण 9 अगस्त को अगस्त क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके पीछे का इतिहास है कि 4 जुलाई 1942 के दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया कि अगर अंग्रेज अब भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके खिलाफ देशव्यापी पैमाने पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाएगा।हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर भी पार्टी दो धड़ों में बंट गई। लेकिन उन्होंने गांधीजी के आह्वान पर इसका समर्थन करने का निर्णय लिया। यही भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत थी—यह सिर्फ नेताओं का आंदोलन नहीं रहा, बल्कि आम लोगों का आंदोलन बन गया। छात्र सड़कों पर उतरे, किसानों और मजदूरों ने विरोध किया और महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन, हड़ताल और गुप्त गतिविधियां जारी रहीं। ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए गिरफ्तारियां और सख्त कार्रवाई की, लेकिन इससे लोगों का हौसला नहीं टूटा। आंदोलन को भले ही अंग्रेजों ने दबाने की कोशिश की, लेकिन उसने एक बात साफ कर दी थी—भारत अब गुलामी की जंजीरों में ज्यादा समय तक नहीं रहने वाला। 1942 की यह क्रांति 1947 की आजादी की राह में एक बड़ा मोड़ साबित हुई।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











