डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा भारत के परिसरों को अधिक सुरक्षित और समावेशी बनाने के लिए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने हेतु किए गए नए नियामक प्रयासों ने उच्च जाति समुदायों में भारी विरोध को जन्म दिया है। यह कदम जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में आई तीव्र वृद्धि के मद्देनजर उठाया गया है, जो पांच वर्षों में दोगुनी से भी अधिक हो गई हैं, यानी 2019-20 में 173 से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गई हैं, यानी 118.4% की वृद्धि। नए ढांचे के तहत, संस्थानों पर यह जिम्मेदारी डाली गई है कि वे भेदभाव को रोकने और निर्धारित समय सीमा के भीतर शिकायतों का समाधान करने के लिए परिसर नेतृत्व को सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराएं। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए लागू किए गए नए नियमों के तहत, यूजीसी ने संस्थानों को विशेष समितियां, हेल्पलाइन और निगरानी दल गठित करने को कहा है ताकि विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की शिकायतों का समाधान किया जा सके। सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के साथ धर्म, नस्ल, जाति, दिव्यांगता और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव की शिकायतें आती रहीं हैं. ऐसे लोगों को यूजीसी की नई गाइड लाइन से सहूलियत मिलेगी. वे अपने खिलाफ हो रहे अन्याय की शिकायत कर सकेंगे. इसका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने और वहां काम करने वालों को समान अवसर उपलब्ध कराना है. चाहे वे किसी भी जाति-धर्म के हों.मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल की डॉक्टर पायल तड़वी ने साल 2019 में सुसाइड कर लिया था. मामले में 3 सीनियर डॉक्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था. परिजनों ने आरोप लगाया था कि साथी डॉक्टर उसकी रैगिंग करते थे. पायल अनुसूचित जनजाति की थी, उस पर जातिसूचक टिप्पणियां करते थे. यह मामला काफी दिनों तक सुर्खियों में रहा था. यूजीसी की नई गाइड लाइन का विरोध करने वालों का मानना है कि जो छात्र SC, ST या OBC की सूची में शामिल नहीं हैं, उनके खिलाफ शिकायत आएगी. ऐसे स्टूडेंट में ब्राह्मण, ठाकुर समेत कई जातियां आती हैं. मान लिया गया है कि ऐसी जातियों के स्टूडेंट ही भेदभाव के दोषी होते हैं. पुरानी गाइड लाइन में गलत शिकायत पर कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था, लेकिन नई में इसे हटा दिया गया है. इसके अलावा समिति में जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं किया गया है. नए नियम के मुताबिक कॉलेज में प्रवेश के समय छात्र-शिक्षक और कर्मचारियों को एक घोषणा पत्र देना होगा. इसमें बताना होगा कि वे किसी भी तरह से भेदभाव वाली गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे. संस्थान को कैंपस में जागरूकता अभियान चलाना होगा. समानता को बढ़ावा देने के लिए कार्यशाला भी करानी होगी. छात्रों की मदद के लिए काउंसलर भी उपलब्ध रहेंगे.सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यूजीसी के नए नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. जनहित याचिका के जरिए सामान्य वर्ग के लोगों के साथ भेदभाव न होने देने की बात कही गई है. यह भी लिखा गया है कि नए नियम चुनिंदा वर्गों को ही संरक्षण प्रदान कर रहे हैं. यह भी कहा गया है कि वे दूसरे वर्गों के छात्रों को संरक्षण देने का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि सामान्य वर्ग के हक की बात कर रहे हैं.यदि कोई शिक्षण संस्थान यूजीसी की इस गाइड लाइन का पालन नहीं करता है तो उसे कई तरह की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. उसे यूजीसी की किसी योजना में शामिल नहीं किया जाएगा. डिग्री कार्यक्रम चलाने पर रोक लगा दी जाएगी. दूरस्थ शिक्षा पर बैन रहेगा. उच्च शिक्षा संस्थानों की सूची से भी हटा दिया जाएगा. यह देश के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है. इसका मुख्य कार्य देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उच्च शिक्षा के स्तर को बनाए रखना और उन्हें नियंत्रित करना है. यह योग्य यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों को ग्रांट उपलब्ध कराता है. यह 2026 के संशोधित नियमों की खासियतों में से एक है. संस्थानों को सभी शिकायतों और उनके जवाब में की गई कार्रवाई का सही और अपडेटेड रिकॉर्ड रखना होगा, हर दो साल में रिपोर्ट पब्लिश करनी होगी, और यूजीसी और अन्य सभी संबंधित अधिकारियों को समान अवसर केंद्रों के कामकाज पर सालाना रिपोर्ट जमा करनी होगी. समान अवसर केंद्र लागू करने की प्रक्रिया की निगरानी और समीक्षा को आसान बनाने के लिए, यूजीसी ने एक राष्ट्रीय निगरानी समिति बनाई है जिसमें वैधानिक परिषदों, वैधानिक आयोगों और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि संगठनों के सदस्य शामिल हैं. नियमों का पालन न करना कानून का उल्लंघन है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. पुष्टि किए गए उल्लंघनों से संस्थानों को यूजीसी योजनाओं से बाहर किया जा सकता है, डिग्री प्रोग्राम चलाने पर रोक लगाई जा सकती है, ऑनलाइन और डिस्टेंस लर्निंग मोड तक पहुंच से वंचित किया जा सकता है और गंभीर मामलों में, यूजीसी अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची से हटाया जा सकता है.यूजीसी के पास राष्ट्रीय स्तर की निगरानी समिति होगी. इसे कम से कम साल में दो बार बैठक करनी होगी. वह इस तरह की शिकायतों को लेकर समिति में चर्चा करेगी. उसका प्रोग्रेस रिपोर्ट तैयार करेगी और इसे वार्षिक रिपोर्ट में पेश भी करेगी. इसे संबंधित कॉलेज को प्रस्तुत किया जाएगा. किसी भी संस्थान को इनकी अवहेलना करने की छूट नहीं होगी. यदि वे ऐसा नहीं करेंगे, तो उनके खिलाफ एक्शन लिया जाएगा. यूजीसी खुद एक्शन लेगा. वह जांच समिति का गठन करेगा और फिर आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी. यूजीसी उस संस्थान को डिग्री कार्यक्रम चलाने से रोक सकती है, ऑनलाइन शिक्षा कार्यक्रम पर भी रोक लगा सकती है. कैंपस में निगरानी और भेदभाव रोकथाम के लिए समता दस्ते नाम से एक छोटी इकाई का भी गठन किया जाएगा. नियम यहीं पर खत्म नहीं होता है. यह भी बताया गया है कि अगर कोई भी शिकायतकर्ता समता समिति की रिपोर्ट को ठीक नहीं मानता है, तो वे एक महीने के भीतर लोकपाल के समक्ष अपील कर सकते हैं. लोकपाल की नियुक्ति यूजीसी के नियमों के तहत होती है. लोकपाल की जवाबदेही होगी कि वे एमिकस क्यूरी नियुक्त कर मामला को आगे बढ़ाएं. इनकी फीस संस्थान को देनी पड़ेगी. इस दौरान यूजीसी किसी भी चरण में संबंधित शिकायत की डिटेल प्राप्त कर सकता है. यूजीसी की कमेटी दौरा भी कर सकती है. उनके द्वारा दिए गए सुझावों पर संबंधित संस्थानों को कार्रवाई करनी पड़ेगी. भारत का हायर एजुकेशन सिस्टम तेजी से बढ़ रहा है. इसका मकसद अधिक एनरोलमेंट और ग्लोबल कॉम्पिटिशन है. बिना सबको शामिल किए, विस्तार करने से मौजूदा असमानताएं फिर से पैदा हो सकती हैं. इसलिए इक्विटी को लागू होने वाला नियम बनाकर यूजीसी ने यह कदम उठाया है. 2026 के नए नियम सिर्फ पॉलिसी में ही नहीं, बल्कि कैंपस के माहौल में भी बदलाव लाने की कोशिश हैं. स्टूडेंट्स के लिए अपने अधिकारों का दावा करना कम खर्चीला हो और बदलाव की ज़िम्मेदारी संस्थान पर हो, इसे सुनिश्चित किया गया है. क्या ये पॉलिसी समानता में बदल पाएंगी, यह पॉलिसी को अपनाने और लागू करने की प्रक्रिया से तय होना चाहिए. लेकिन पहली बार, भारतीय कैंपस में इक्विटी को सिर्फ बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है, बल्कि इसे अनिवार्य किया गया है, मॉनिटर किया जा रहा है और रेगुलेशन की ताकत से इसका समर्थन किया जा रहा है. उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के नाम पर लागू किए गए यूजीसी के नए नियमों (रेगुलेशन 2026) ने भारतीय जनता पार्टी के अंदर नाराजगी का माहौल बना दिया है. ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा देने वाली सरकार अब अपने ही कैडर के गुस्से का सामना कर रही है. हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक इस्तीफों की झड़ी लग गई है. सरकार के मंत्री और सांसद की ‘सफाई’ भी काम नहीं आ रही है. विरोध करने वालों का सीधा आरोप है कि यूजीसी के नए नियमों में झूठी शिकायतों पर सजा का कोई प्रावधान नहीं है. आरोप है कि यह कानून सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” को बढ़ावा देगा और उनकी सुरक्षा को खत्म कर देगा. सामान्य वर्ग के छात्रों को पहले से ही संदेह के घेरे में खड़ा कर देते हैं। उनका डर है कि अब किसी भी छोटी बात पर शिकायत दर्ज हो सकती है और बिना पूरी जांच के छात्र की छवि खराब हो सकती है। छात्रों का आरोप है कि इक्विटी स्क्वाड और लगातार निगरानी से कैंपस में पढ़ाई का माहौल प्रभावित होगा। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय ज्ञान, बहस और खुले विचारों की जगह होते हैं, न कि ऐसे स्थान जहां हर छात्र खुद को निगरानी में महसूस करे। प्रदर्शन में शामिल छात्रों ने यह भी कहा कि झूठी या फर्जी शिकायतों के दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा हुआ, तो इसका सीधा असर छात्रों के करियर, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक रिश्तों पर पड़ेगा. लोकतंत्र के कटघरेमें शिक्षा!लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











