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स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराएगा एम्स ऋषिकेश

18/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के लोगों के लिए अंतिम उम्मीद माने जाने वाले एम्स ऋषिकेश की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आरोप हैं कि यहां गंभीर मरीजों को भी केवल बेड नहीं है कहकर इमरजेंसी गेट से लौटा दिया जाता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई मामलों में मरीजों को प्राथमिक उपचार तक नहीं मिल पाता और दूसरे अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो जाती है।एम्स ऋषिकेश की स्थापना उत्तराखंड सहित पर्वतीय राज्यों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। समय के साथ संस्थान ने अपनी चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञ सेवाओं के दम पर देशभर में पहचान बनाई है। इसका परिणाम यह हुआ कि उत्तराखंड के अलावा हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार और पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में मरीज यहां उपचार के लिए पहुंच रहे हैं।संस्थान के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में एम्स ऋषिकेश की ओपीडी में 7 लाख 89 हजार 187 मरीजों ने स्वास्थ्य परामर्श लिया। वहीं अस्पताल की शुरुआत से लेकर 31 मई 2026 तक कुल 63 लाख 83 हजार 955 लोग यहां की स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठा चुके हैं। इसी अवधि में भर्ती मरीजों यानी आईपीडी की संख्या 4 लाख 89 हजार 432 तक पहुंच गई है। यह आंकड़े बताते हैं कि एम्स ऋषिकेश पर मरीजों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है।वर्तमान में अस्पताल में प्रतिदिन लगभग 2500 से 3000 मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। कई बार यह संख्या 3200 तक भी पहुंच जाती है। इनमें से 150 से 175 मरीजों को भर्ती करने की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त ट्रॉमा सेंटर और मेडिकल इमरजेंसी में आने वाले गंभीर मरीजों की संख्या अलग से होती है। ऐसे में अस्पताल की मौजूदा बेड क्षमता पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है।एम्स प्रशासन का कहना है कि हर वर्ष मरीजों की संख्या में औसतन 10 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। वर्ष 2022 में ओपीडी में 6 लाख 20 हजार 654 मरीज आए थे। यह संख्या 2023 में बढ़कर 6 लाख 80 हजार 75 हो गई। वर्ष 2024 में 7 लाख 42 हजार 963 मरीजों ने ओपीडी सेवाओं का लाभ लिया, जबकि 2025 में यह आंकड़ा लगभग 7.9 लाख तक पहुंच गया। लगातार बढ़ती यह संख्या अस्पताल के विस्तार की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एम्स ऋषिकेश आज पूरे क्षेत्र के लिए तृतीयक चिकित्सा केंद्र की भूमिका निभा रहा है। गंभीर बीमारियों, जटिल सर्जरी, कैंसर, न्यूरोलॉजी, कार्डियोलॉजी और ट्रॉमा मामलों में बड़ी संख्या में मरीज यहां रेफर किए जाते हैं। लेकिन सीमित बेड और संसाधनों के कारण कई मरीजों को भर्ती होने के लिए इंतजार करना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उनके पास निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराने का विकल्प नहीं होता।एम्स की निदेशक ने कहा कि संस्थान में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है और मौजूदा संसाधन भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने कहा कि संस्थान को सबसे पहले अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता है। भूमि मिलने के बाद ही विस्तार योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जा सकेगा। उनके अनुसार एम्स का विस्तार अब केवल एक योजना नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है।प्रस्तावित 200 एकड़ भूमि पर नए अस्पताल ब्लॉक, अतिरिक्त बेड, उन्नत चिकित्सा केंद्र, शोध सुविधाएं और छात्रावास विकसित किए जाने की योजना है। हालांकि यह योजना पिछले आठ वर्षों से विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण लंबित है। यदि यह परियोजना शीघ्र शुरू होती है तो मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी और अस्पताल पर बढ़ता दबाव भी कम होगा।विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, वहां एम्स ऋषिकेश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। एम्स से सभी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को टेली मेडिसिन से जोड़ा जाएगा। सभी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में सामुदायिक चिकित्साधिकारी (सीएचओ) तैनात होगा। जिसके माध्यम से एम्स के चिकित्सक मरीजों के रोग की पहचान करेंगे। किसी मरीज को तत्काल दवाई की आवश्यकता होगी तो एम्स की ड्रोन मेडिकल सेवा के तहत उपलब्ध कराई जाएगी। उत्तराखंड में आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की संख्या करीब 2500 है। इस मॉडल के तहत एम्स उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से में भी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराएगा।  ऐसे में संस्थान का समय पर विस्तार न केवल मरीजों के हित में है बल्कि पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए भी जरूरी है। फिलहाल हजारों मरीजों और उनके परिजनों की उम्मीदें इस विस्तार योजना के जल्द धरातल पर उतरने पर टिकी हुई हैं।अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश में तीमारदारों को उपचार बिल का आनलाइन भुगतान की सुविधा नहीं मिल रही है, जिससे तीमारदार परेशान हो रहे हैं। पत्नी के उपचार के बाद एम्स से छुट्टी मिलने पर बिल का भुगतान करने पहुंचे एक तीमारदार को नकद निकासी के लिए करीब पांच किलोमीटर दूर दौड़ लगानी पड़ी।ताज्जुब है कि अन्य विकल्प न होने के कारण उसे एक घंटे तक अपने मरीज को अकेला छोड़ना पड़ा। ऐसे में आधुनिक चिकित्सा एवं जन सेवाओं में अग्रणी होने का दावा करने वाले एम्स ऋषिकेश में आमजन को मौलिक सुविधा न मिलने से व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।एम्स वास्तविकता का आकलन अवश्य करेगा। एम्स में बेड की समस्या सतत रूप से बनी हुई है। एम्स में एक बेड के लिए तीन मरीज हमेशा रहते हैं। बेड की उपलब्धता के लिए राज्य और केंद्र सरकार दोनों के सहयोग की आवश्यकता है, जिससे 200 एकड़ भूमि प्राप्त होने के बाद एम्स का विस्तार किया जा सके। राज्य में प्राथमिक केंद्र व द्वितीयक केंद्रों की कमी के चलते भी एम्स में बेड की समस्या बनी रहती है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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