डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में मौजूद सैकड़ों ऐसे ग्लेशियर, जो खड़ी चट्टानों से लटके हुए हैं (हैंगिंग ग्लेशियर), भविष्य में हिमस्खलन और बर्फ-चट्टान टूटने की बड़ी घटनाओं का कारण बन सकते हैं। पहली बार न सिर्फ हैंगिंग ग्लेशियर की पूरी तस्वीर सामने आई है, बल्कि इनकी स्थिति को लेकर चेतावनी भी जारी की गई है।विज्ञनियों के समूह ने विस्तृत अध्ययन करते हुए अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग (लटकते) ग्लेशियर चिह्नित किए हैं। अध्ययन के अनुसार इनमें से कई ग्लेशियरों के नीचे बदरीनाथ, माणा, जोशीमठ, तपोवन, हेमकुंड साहिब, प्रमुख सड़कें और जलविद्युत परियोजनाएं स्थित हैं, शोधकर्ताओं ने सेंटिनल-2 उपग्रह चित्रों, डिजिटल एलिवेशन माडल और ग्लैबटाप-2 माडल की मदद से पूरे अलकनंदा बेसिन का विश्लेषण किया। जिसमें पाए गए 219 हैंगिंग ग्लेशियर का कुल क्षेत्रफल करीब 71.7 वर्ग किमी पाया गया।वहीं, कुल अनुमानित बर्फ आयतन 2.39 घन किमी से अधिक मिला। इनमें से भी 0.74 घन किमी बर्फ सबसे अस्थिर (हैंगिंग मास) के रूप में चिन्हित की गई। ये ग्लेशियर औसतन 33 डिग्री ढलान पर स्थित हैं और लगभग 4,018 से 6,759 मीटर की ऊंचाई के बीच पाए गए।अलकनंदा बेसिन में कुल अस्थिर बर्फ का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। बदरीनाथ-माणा क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील पाया गया। कंप्यूटर आधारित माडल से किए गए सिमुलेशन में अनुमान लगाया गया कि यदि बड़े हिमखंड टूटते हैं, तो कुछ स्थानों पर बर्फ और मलबे की धारा की ऊंचाई 50 मीटर से अधिक हो सकती है। इससे नीचे स्थित सड़क, पुल, तीर्थस्थल और अन्य ढांचों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।विज्ञनियों ने यह भी स्पष्ट किया कि करीब 55 प्रतिशत हैंगिंग ग्लेशियर बड़े मुख्य ग्लेशियरों के ऊपर लटके हैं। यदि इनका कुछ हिस्सा टूटता भी है, तो वह पहले मुख्य ग्लेशियर पर गिरता है, इसलिए उनसे सीधे आबादी को अपेक्षाकृत कम खतरा है। लेकिन जो ग्लेशियर सीधे घाटियों या मानव गतिविधियों वाले क्षेत्रों के ऊपर हैं, उनकी अलग से निगरानी की जरूरत है।खतरा केवल ग्लेशियरों से नहीं, बल्कि उनके नीचे बढ़ती मानव गतिविधियों से भी बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2000 में संभावित जोखिम क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र लगभग 8,000 वर्ग मीटर था, जो 2030 तक बढ़कर लगभग 1.52 लाख वर्ग मीटर हो सकता है। इसी अवधि में संभावित रूप से प्रभावित आबादी करीब 380 से बढ़कर 8,500 तक पहुंचने का अनुमान है। इसका मतलब है कि यदि भविष्य में कोई बड़ी बर्फ-टूटने की घटना होती है, तो उसका प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक लोगों पर पड़ सकता है।पूरी दुनिया में जब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर के पिघलने और सिकुड़ने की खबरें आ रही हैं, वहीं वैज्ञानिकों ने एक बिल्कुल अलग और बेहद डरावनी चेतावनी दी है. ‘यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ’ के नेतृत्व में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में 3,100 ऐसे ‘सर्जिंग ग्लेशियर’ की पहचान की गई है, जो शांत रहने के बजाय अचानक ‘पागल’ हो जाते हैं. ये ग्लेशियर सालों तक बर्फ जमा करते हैं और फिर अचानक उसे तेजी से आगे की ओर धकेल देते हैं. इनकी यह रफ्तार तबाही का वो मंजर ला सकती है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अब पुराने नियम काम नहीं कर रहे हैं. जिस तरह मौसम बदल रहा है, उसे देखते हुए इन 3,100 ग्लेशियरों पर सैटेलाइट और ग्राउंड लेवल से 24 घंटे नजर रखना जरूरी हो गया है. हिमालय में बर्फ, ग्लेशियर की गतिशीलता की स्पष्ट समझ सीमित है। सामाजिक-राजनीतिक रूप से, यह क्षेत्र सीमा विवादों से घिरा हुआ है। क्षेत्रीय अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता की आवश्यकता है। क्षेत्र में स्थिरता के लिए अनुसंधान और प्रबंधन दोनों परिणामों में सीमा-पार सहयोग को लागू किया जाना चाहिए।हिमालय में राजनीतिक और प्राकृतिक संसाधन स्थिरता दोनों को प्राप्त करने में जलवायु परिवर्तन की गतिशीलता, प्रवृत्तियों और प्रभावों और इसके महत्व के अध्ययन और निगरानी के दृष्टिकोण को रेखांकित किया जाना चाहिए। हिमालय के आठ देशों को इस दिशा में समन्वयक के साथ प्रोग्राम बनाकर अध्ययन की सख्त जरूरत है।हिमालयी पारिस्थितिकीय तंत्र के लिए संसाधनों का अत्यधिक दोहन गंभीर चिंता बन रहा है। मसलन ईंधन की लकड़ी, वाणिज्यिक इमारती लकड़ी के लिए झाड़ियों व जंगलों का दोहन, गैर इमारती वन उत्पादों का अत्यधिक दोहन या अत्यधिक खनन, औषधीय पौधों की अवैध कटाई से खतरा लगातार बढ़ रहा है।वन्य जीवों के शिकार से हिमालयी पारिस्थितिकीय तंत्र को खतरा है। हिमालयी क्षेत्र में बाघ, गैंडा, कस्तूरी मृग, लाल पांडा का अवैध शिकार पूरे हिमालयी क्षेत्र में व्यापक रूप से फैला हुआ है अकेले उत्तराखण्ड में कुल 900 ग्लेशियर हैं जो गंगा, यमुना, मन्दाकिनी, अलकनन्दा सहित तकरीब हमारी डेढ़ सौ जीवनदायिनी नदियों के जन्मदाता हैं। ये ग्लेशियर तकरीब 3500 से 4000 मीटर की ऊँचाई से शुरू हो जाते हैं। गंगोत्री के अलावा चोराबाड़ी, सतोपंथ, नीति, मिलाम और नंदादेवी ग्लेशियर भी ऐसे ग्लेशियर हैं जिनके पिघलने की रफ्तार प्रति वर्ष की तुलना में गंगोत्री से कम नहीं है। कम ऊँचाई वाले ग्लेशियरों जिनमें गंगोत्री, नेवला, मिलाम, चीपा और सुंदरढूंगा आदि ग्लेशियरों पर इस साल की जंगल की आग से ब्लैक कार्बन की हल्की परत जम चुकी है।धुएँ का कार्बन ग्लेशियरों के ऊपर जमने से ग्लेशियर के उपर बर्फ नहीं टिक पाएगी, इससे चोटियों पर जमी बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया में जहाँ तेजी आएगी, वहीं ऊँची चोटियों पर बने कमजोर ग्लेशियर गर्मी की वजह से तेजी से पिघलने लगेंगे। इसमें दो राय नहीं कि ग्लेशियरों का पिघलना सदियों से जारी है। लेकिन इनके पिघलने की गति में जिस तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है, वह चिन्तनीय है। इसमें जलवायु परिवर्तन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसलिये जलवायु परिवर्तन से लड़ना हमारे लिये अहम हो गया है।सबसे पहले हमें हिमालयी ग्लेशियर क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों पर पूरी तरह अंकुश लगाना होगा। यह काम प्राथमिकता के आधार पर करना होगा जो बेहद जरूरी है। मौसम में बदलाव और हिमालयी क्षेत्र में बर्फ के पिघलने की गति जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे का संकेत है कि अब बहुत हो गया, अब तो कुछ करना होगा। अन्यथा बहुत देर हो जाएगी।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











