डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जहा खूबसूरती के साथ साथ प्रकृति ने प्रदेश को जड़ी बूटियों का प्राकृतिक भंडार भी भेंट स्वरूप दिया हैलिंगड़ा, लिंगुड़ा, लिंगुड़ या ल्यूड़ का वानस्पतिक नाम डिप्लाजियम ऐस्कुलेंटम है. यह एथाइरिएसी कुल का खाने योग्य फर्न है. यह समूचे एशिया, ओसियानिया के पर्वतीय इलाकों में नमी वाली जगहों पर पाया जाता है. मलेशिया में इसे पुचुक पाकू और पाकू तांजुंग कहा जाता है तो फिलिपीन्स में ढेकिया थाईलैंड में इसे फाक खुट कहते हैं. असम में धेंकिर शाक, सिक्किम में निंगरु, हिमाचल में लिंगरी, बंगाली में पलोई साग और उत्तर भारत में लिंगुड़ा कहा जाता है.जंगल में उगने वाली सब्जी लिंगुड़े दिखने में जितने सुन्दर होते हैं खाने में उतने ही स्वादिष्ट और पौष्टिक होते हैं। दरअसल, लिंगड़ा गाड़-गधेरों के आस-पास या फिर घने जंगलों में पाए जाते हैं।लिंगड़े का वैज्ञानिक नाम डिप्लाजियम एसकुलेंटम है तथा एथाइरिएसी फैमिली से संम्बन्धित है। इसे परम्परागत रूप से विभिन्न बीमारियों के निवारण के लिये भी घरेलू उपचार में भी प्रयोग किया है।पहाड़ी लोगों की यह फेवरिट सब्जी है आजकल तो देश-विदेश में भी इसकी काफी मांग बढ़ गई है। साथ ही अब लिंगड़े का अचार और सलाद खूब पसंद किया जा रहा है।बता दें कि लिंगडे मे कैल्शियम, पोटेशियम तथा आयरन प्रचुर मात्रा होने के कारण एक अच्छा प्राकृतिक स्त्रोत भी माना जाता है। अब विश्व में कई देशो में लिगड़ा की खेती वैज्ञानिक एवं व्यवसायिक रूप से भी की जा रही है।उत्तरकाशी जिले के टीकाराम पंवार दुबई में शेफ की नौकरी कर चुके हैं, लॉक डाउन में वापस गांव आने के बाद उन्होंने लिंगुड़े के अचार की रेसिपी तैयार की देखते ही देखते उनके पास लिंगड़ा अचार लेने वालों की लाइन लग गई उन्होंने घर में ही एक महीने में 50 किलो से अधिक लिंगुड़ा का अचार बनाकर 250 रुपये प्रति किलो के हिसाब बेचा।देखा-देखि जहां अन्य लोग भी लिंगुड़े को सुखाकर अचार तैयार कर रहे हैं। यह वाकई में बहुत अच्छी बात है यह टेस्टी और हेल्दी भी है। ऐसा भी नहीं है कि लिंगुडे का अचार पहले नहीं बनता जरूर बनता था लेकिन इस बार मांग बढ़ी है जोकि अच्छा संकेत है आने वाले समय में व्यावसायिक रूप से भी लिंगुड़ा की खेती करने पर विचार करने की जरूरत है। यह न सिर्फ स्वास्थ्य के हिसाब से अच्छी पहल होगी बल्कि लिंगुड़ा से रोजगार पाने का एक अवसर भी होगा।जो लगभग सभी पहाड़ी लोगो की पहली पसंद है. जिसके सामने अच्छी से अच्छी सब्जी भी स्वाद में कम है। और साथ ही साथ यह कई औषधीय गुणों से भरपूर हैं. लिंगड़ सब्जी के कई लाभ हैं और ये मात्र सब्जी ही नहीं बल्कि एक आयूर्वेदिक दवाई भी है।डॉक्टरो का भी मानना है की लिंगुड़ा शूगर, हार्ट, के मरीजों के लिए रामबांण है. लिंगुड़ा में फेट्स और वसा बिलकुल नहीं लेकिन पलायन के कारण नई जनरेशन इस सब्जी को भूलती जा रही है। शायद वो ये नहीं जानते की हम प्रकृति के दिए हुए इस अनमोल उपहार जो की कई रोगो में लाभदायक है उसे खुद से दूर करते जा रहे है “साथ ही हमे अपने उत्तराखंड की इस तरह की औषधीय गुणों को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए ।होता और न ही कोलेस्ट्रॉल होता है इसलिए यह हार्ट के मरीजों के लिए बहुत लाभदायक होता है.आज लिंगुड़ा जंगल से बाहर निकलकर कस्बों-शहरों में अपनी जगह बना चुका है. उत्तराखण्ड के मैदानी हाट-बाजारों में यह अच्छे दामों में बिका करता है. लेकिन इसका उत्पादन अभी प्राकृतिक ही है. लिंगुड़ा की पत्तियों का पाउडर औद्योगिक रूप से बायोसेन्थेसिस ऑफ सिल्वर नैनो पार्टीकल्स के लिए प्रयुक्त किया जाता है क्योंकि लिंगुड़ा की पत्तियां स्टेबलाइजर का कार्य करती हैं। राज्य के परिप्रेक्ष्य में अगर लिंगुड़ा की खेती वैज्ञानिक तरीके और व्यवसायिक रूप में की जाए तो यह राज्य की आर्थिकी का एक बेहतर पर्याय बन सकता है।विदेशों की तर्ज पर उत्तराखण्ड में भी लिंगुड़ा की खेती कर इसका व्यावसायिक उत्पादन किया जा सकता है. पलायन रोकने के लिए सबसे बड़ा जरिया बन सकता है। सरकार को इस ओर सोचने की जरूरत है। समय रहते इन पेडों का सरंक्षण उच्च स्तर पर नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में वैज्ञानिक और इतिहासकार इसे इतिहास के पन्नों में ढूंढते रह जाएंगे। काश्तकारों की सरकारी स्तर से भी मदद की जायेगी, तो जिससे लिंगुड़ा जैसे लाभकारी फर्न का संरक्षण किया जा सके। इसे वक्त की मजबूरी कहें या अपने को जिंदा रखने की जदोजहद की कभी पिजा,बर्गर , खाने वाले प्रवासियों को इन दिनों जंगलों में उगने वाला “लिंगुड़ा”की सब्जी का स्वाद कुछ ज्यादा ही भा रहा हैं।तभी तो स्थानी लोगो के साथ लंबे समय बाद अपने मूल गांवो, घरों को लौटे प्रवासी लिंगुड़ा को खोजने के लिए जंगल-जंगल भटक रहे हैं। कोरोना वायरस के पूरे विश्व को अपनी गिरफ्त में लेने के बाद दर्जनों देशो के साथ ही भारत में भी लॉक डाउन जारी हैं। जिस कारण आम नागरिकों को तमाम जरूरी दैनिक उपभोग की वस्तुऐं अपेक्षित रूप से नही मिल पा रही हैं। इसी क्रम में लोगो को ताजी व पौष्टिक सब्जीयों के लिए भटकने पर मजबूर होना पड़ रहा हैं। ऊपर से सब्जीयों के दामो में अस्थिरता व रोजगार के साधन लगभग समाप्त हो जाने के कारण लोगो को सब्जीयों के लिए खाशी मशक्त करनी पड़ रही हैं। किंतु इस समस्या से दूर उत्तराखंड़ के समुद्र तल से करीब तीन हजार फिट से अधिक की ऊचांई पर स्थित पहाड़ी जिलों के वासिंदो को थोड़ी मेहनत के बाद औषधीय गुणों से भरपूर, पौष्टिक व स्वादिष्ट लिगुडें लोगो को इन दिनों खूब भा रहे हैं। आम तौर पर बंसत ऋतु में पहाड़ी क्षेत्रों के गद्देरों,नालो,व अधिक नमी युक्त स्थानों पर लिंगुड़ा बहुतायत मात्रा में प्राकृतिक रूप से उंगते व स्वत: नष्ट होने वाला एक पौधा हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक लिंगुड़े से बनने वाली लजीज सब्जी के प्रति यहां के वासिंदे बहुत अधिक आकृष्ति नही होते थे।किंतु हाल के कुछ वर्षो में लिगुडे के औषधीय गुणों,पौष्टिकता व स्वाद के चलते यहां के वासिंदे इस की सब्जी को पसंद करने लगे।यही नही अब क्षेत्र के बाजारों में भी सीजनल सब्जी के रूप में ग्रामीण इसे बेचने लाने लगे हैं।जिसे लोग हाथो हाथ लेते भी है। वर्तमान में जबकि करोना संक्रमण के चलते ताजी सब्जीयों का पहाड़ी बाजारो में अकाल सा हो गया हैं। तो गांव के साथ ही बाजारों के निवासी भी लिगुडा लेने के लिए जंगलों में घूम रहे हैं। आलम यह हैं। कि इन दिनों गांवो के ग्रामीण अपने मवेशियों को जंगलों में हांकने जाने पर बिना लिगुड़ा लिये वापस नही लौट रहे हैं। यही नही बाजारों में बसें रिश्तदार भी अन्य वस्तुओं के स्थान पर लिगुडे लाने का ही निवेदन कर रहे हैं। बिना प्याज,टमाटर के सहयोग से ही बनने वाले लिंगुड़ा के प्रति कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण लंबे समय बाद अपने घरो को लौटे प्रवासियों को तो कुछ ज्यादा ही भा रहे हैं। यही कारण हैं। कि पिजा,चौमिन,बर्गर के शौकीन लोग भी लिंगुड़ा की तलाश में जंगलों में आम देखे जा सकते हैं। उत्तराखण्ड में वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए ष्मिट्टी से बाजार तकष् की रणनीति पर काम किया जा रहा है।उत्तराखंड के किसानों के लिए बाज़ार तक पहुंचना ही बड़ी समस्या है। खेती से मुंह मोड़ रहे युवाओं को यदि उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिले, तभी वे खेतों की ओर लौटेंगेण्वृक्षावरण में वृद्धि कर भूमि एवं जल संरक्षण व पर्यावरण संतुलन स्थापित करने के साथ ग्रामीण आंचल में उद्यमियों को प्रोत्साहन तथा वन आधारित लघु व कुटीर उद्योग की अर्थव्यवस्था को सशक्त किया जा सकता है।
लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय है.











