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तमाम योजनाएं बनीं लेकिन नहीं रुकी पलायन की गति

09/11/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:
उत्तराखंड की अपनी अलग पहचान है। इसी पहचान के जरिये स्थानीय लोग ब्रिटिश शासनकाल से ही अलग क्षेत्र की मांग करते रहे। आजादी के बाद भी अलग राज्य की आवाज उठती रही, लेकिन यह संभव नहीं हो सका था। वर्ष 1994 में आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया था। \

दिल्ली तक गूंज उठने लगी। आंदोलन खून-खराबे में तब्दील हो गया था। 42 आंदोलनकारियों के शहीद होने के बाद वर्ष 2000 में आज ही के दिन उत्तराखंड राज्य का सपना साकार हो गया।एक सितंबर को खटीमा कांड हो या फिर दो सितंबर को मसूरी कांड और फिर दो अक्टूबर, 1994 का रामपुर तिराहा कांड। आंदोलनकारी जब आज भी इन भयावह घटनाओं को याद करते हैं, कांप उठते हैं। सिहरन होने लगती हैं। खटीमा कांड के गवाह रहे राज्य आंदोलनकारी बताते हैं, लोग सड़कों पर उतर आए थे। आंदोलन तेज होने लगा था।

तब अचानक पुलिस की बर्बरता सामने आ गई। सात लोग शहीद हो गए। किसी तरह लोगों ने जान बचाई। इसके बाद पुलिस का अमानवीय चेहरा सामने आता रहा। वरिष्ठ पत्रकार व राज्य आंदोलनकारी रहे बताते हैं, जब अंग्रेज पहाड़ के लोगों का हक मारने लगे। उनके जल, जंगल व जमीन छीनने लगे और लगान का बोझ डालने लगे। तभी से आक्रोश पनपने लगा था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उत्तराखंड आने से लोगों की भावनाओं का ज्वार फूट पड़ा। 1916 में कुमाऊं परिषद बनाई गई।

अगर देखें तो सालम, सल्ट व देघाट के आंदोलन भी इसी का परिणति है। हमेशा से दमन व उपेक्षा के विरुद्ध उठने वाली आवाज अलग राज्य को लेकर ही छटपटाहट थी। 1980 के बाद उक्रांद ने अच्छा माहौल बना दिया था। बाद में सभी आंदोलन में कूद पड़े।आंदोलन को लेकर दो सवाल थे। पहला यह कि राज्य कैसा होना चाहिए? दूसरा सवाल था, राज्य अभी दो। 1994 के आंदोलन की आग में राज्य तो मिल गया, लेकिन राज्य के स्वरूप का दूसरा सवाल गौण हो गया।

यही कारण कि 21 साल बाद भी मूलभूत सवाल ही गुम हो गए हैं। जिसमें जल, जंगल, जमीन के अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अपनी भाषा और लोकसंस्कृति व अस्मिता जैसे विषय हैं। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में औद्योगिक विकास की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन औद्योगिक विकास का ये मॉडल पहाड़ों से पलायन नहीं रोक पाया। प्रदेश का औद्योगिक विकास मैदानी जिलों तक सीमित रहा। अवस्थापना विकास, कनेक्टिविटी समस्या और आपदा जैसी चुनौती के आगे पहाड़ों में उद्योग स्थापित नहीं हो पाए।

राज्य बनने के बाद 21 साल में 49 हजार से अधिक लघु एवं सूक्ष्म उद्योग स्थापित हुए हैं। जिससे राज्य की जीडीपी में उद्योग क्षेत्र की हिस्सेदारी 19.2 प्रतिशत से बढ़ 49 प्रतिशत हो गई है। नौ नवंबर 2000 को राज्य गठन के समय उत्तराखंड में 14163 लघु एवं सूक्ष्म और 46 बड़े उद्योग ही स्थापित थे। पहले राज्य का यह भू-भाग शून्य उद्योग के लिए जाना जाता था। वर्ष 2003 में विशेष औद्योगिक प्रोत्साहन पैकेज के बाद राज्य में औद्योगिक विकास ने रफ्तार पकड़ी है।

21 साल में उत्तराखंड ने औद्योगिक विकास में तरक्की की है। जिससे राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उद्योग क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ी है। जहां पर जीडीपी में उद्योग क्षेत्र का अंश 19.2 प्रतिशत था। जो बढ़ कर 49 प्रतिशत से अधिक हो गया है। इसमें विनिर्माण क्षेत्र का योगदान लगभग 36 प्रतिशत है। राज्य के औद्योगिक विकास का मॉडल पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकने में सफल नहीं हो पाया है। राज्य गठन के बाद रोजगार के लिए पहाड़ों से तेजी से पलायन हुआ है।

अब सरकार का पहाड़ों में स्थानीय उत्पादों पर आधारित लघु व सूक्ष्म उद्योगों को बढ़ावा देने पर विशेष फोकस है। जिससे रोजगार के अवसर सृजित होने से पलायन को रोका जा सके। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में 49809 एमएसएमई उद्योग स्थापित हुए हैं। जिसमें 12778 करोड़ का निवेश हुआ है। इससे 2.82 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला। राज्य बनने से पहले उत्तराखंड में कुल 14163 लघु उद्योग स्थापित थे।

जिसमें 700 करोड़ का निवेश किया गया था। वहीं, 46 बड़े उद्योग स्थापित थे। वर्तमान में देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर जिले में 327 बड़े उद्योग स्थापित हैं। उत्तराखंड को एक नए आर्थिक विकास के मॉडल की जरूरत है। जिसमें औद्योगिक विकास भी शामिल है। इस मॉडल में बैकवर्ड और फारवर्ड लिंकेज दोनों ही शामिल है। राज्य बनने के बाद औद्योगिक विकास में तेजी आई है, लेकिन पहाड़ों में मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण औद्योगिक विकास नहीं हुआ है।

जो लघु उद्योग स्थापित हुए हैं, उन्हें नुकसान होने पर मदद नहीं मिली है। जिससे उनका मनोबल टूटा है। सरकार ने इन कारकों को दूर करने के लिए अपने स्तर पर कई योजनाएं शुरू कीं, लेकिन स्थितियां आज भी नहीं बदली हैं। राज्य में पलायन का दौर अब भी जारी है। गत वर्ष कोरोनाकाल में तमाम प्रवासी लौटकर अपने गांव पहुंचे। कहा जा रहा था कि अब इनमें से अधिकतर लोग वापस नहीं जाएंगे, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ।

राज्य के औद्योगिक विकास का मॉडल पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकने में सफल नहीं हो पाया है। राज्य गठन के बाद रोजगार के लिए पहाड़ों से तेजी से पलायन हुआ है। अब सरकार का पहाड़ों में स्थानीय उत्पादों पर आधारित लघु व सूक्ष्म उद्योगों को बढ़ावा देने पर विशेष फोकस है। जिससे रोजगार के अवसर सृजित होने से पलायन को रोका जा नहीं हुआ है शिक्षा के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का समन्वित प्रयासों से समाधान खोजना होगा।

विश्वविद्यालयों को आधुनिकीकरण, ट्रांसफोर्मेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटिलाइजेशन व नई टेक्नोलॉजी के लिए कार्य करना है। उन्होंने कहा कि राज्य के विकास एवं प्रगति में सरकार के साथ ही वॉलियंटर्स, सामाजिक संगठनों, गैर सरकारी संगठनों, समाज सेवकों एवं व्यक्तिगत प्रयासों की भी महत्वपूर्ण भागीदारी है। हमें राज्य की विकास प्रक्रिया में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करनी है। राज्यपाल ने कहा कि राज्य के प्रत्येक नागरिक का जो भी कर्तव्य एवं दायित्व हैं, वे पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन करने का प्रयास करें। राज्य की प्रगति का लाभ दूरस्थ गांवों में रहने वाले जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे, तब ही उत्तराखण्ड सच्चे अर्थों में प्रगतिशील राज्य कहलाएगा।

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