
कमल बिष्ट/उत्तराखण्ड समाचार।
कोटद्वार। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन आशीर्वाद से संत निरंकारी मिशन कोटद्वार ब्रांच में संयोजक स्तरीय बाल संत समागम श्रद्धा, उल्लास एवं आध्यात्मिक वातावरण के मध्य सम्पन्न हुआ।
जिसमें सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का पावन संदेश देते हुए महात्मा धर्मेंद्र पायल जी ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा और भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मा, मानवता एवं ब्रह्मज्ञान से जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बाल समागम का उद्देश्य बच्चों के भीतर प्रेम, सेवा, विनम्रता, अनुशासन, करुणा एवं मानवता जैसे दिव्य संस्कारों का विकास करना है, जिससे वे केवल सफल ही नहीं, बल्कि श्रेष्ठ इंसान भी बन सकें।
उन्होंने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर अथवा अन्य सफल पेशेवर बनाने के लिए लाखों रुपये व्यय करते हैं, जो सराहनीय है।लेकिन यदि जीवन में प्रेम, करुणा और इंसानियत का अभाव हो, तो बड़ी से बड़ी उपलब्धियाँ भी अपना महत्व खो देती हैं। विज्ञान मनुष्य को चाँद तक पहुँचा सकता है, किन्तु मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का कार्य केवल मानवता और ब्रह्मज्ञान ही कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि बाल समागम जैसे आध्यात्मिक आयोजनों में बच्चों को मात्र दो घंटे के सत्संग के माध्यम से जीवन के ऐसे अनमोल संस्कार प्राप्त होते हैं, जो उन्हें सेवा, सद्भाव, आज्ञाकारिता, सम्मान एवं आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ते हैं। करोड़ों रुपये की शिक्षा किसी बच्चे को योग्य पेशेवर बना सकती है, किन्तु ब्रह्मज्ञान ही उसे सच्चे अर्थों में संवेदनशील, संस्कारी और श्रेष्ठ इंसान बनाता है।
अपने संदेश में उन्होंने अभिभावकों का आह्वान करते हुए कहा कि जिस प्रकार वे बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य के प्रति सजग रहते हैं, उसी प्रकार उन्हें नियमित रूप से सत्संग एवं बाल समागम से भी जोड़ें। यदि माता-पिता स्वयं आध्यात्मिक जीवन से जुड़े हैं, तो उनका यह नैतिक दायित्व है कि वे अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को भी परमात्मा की अनुभूति एवं ब्रह्मज्ञान से जोड़ने का प्रयास करें, जिससे परिवार में प्रेम, सौहार्द और आध्यात्मिक आनंद का वातावरण विकसित हो सके।
समागम का समापन समस्त मानव जाति की सुख-शांति, विश्व बंधुत्व एवं विश्व कल्याण की मंगलकामना के साथ हुआ। इस अवसर पर यह संदेश भी दिया गया कि शिक्षा जीवन को सफल बना सकती है, किन्तु ब्रह्मज्ञान जीवन को सार्थक बनाता है। जब बच्चों के भीतर बचपन से ही मानवता, सेवा और प्रेम के संस्कार विकसित होंगे, तभी एक श्रेष्ठ परिवार, सशक्त समाज और आदर्श राष्ट्र का निर्माण संभव होगा।











