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बहुमूल्य प्रकृति संसाधनों का संतुलन

29/07/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:

जल, जंगल और ज़मीन के बिना प्रकृति अधूरी  विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस प्रत्येक वर्ष 28 जुलाई को मनाया जाता है. वर्तमान परिपेक्ष्य में कई प्रजाति के जीव जंतु एवं वनस्पति विलुप्त हो रहे हैं. विलुप्त होते जीव जंतु और वनस्पति की रक्षा का विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर संकल्प लेना ही इसका उद्देश्य है.

जल, जंगल और जमीन, इन तीन तत्वों के बिना प्रकृति अधूरी है. विश्व में सबसे समृद्ध देश वही हुए हैं, जहाँ यह तीनों तत्व प्रचुर मात्रा में हों. भारत देश जंगल, वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध है. सम्पूर्ण विश्व में बड़े ही विचित्र तथा आकर्षक वन्य जीव पाए जाते हैं. हमारे देश में भी वन्य जीवों की विभिन्न और विचित्र प्रजातियाँ पाई जाती हैं.

इन सभी वन्य जीवों के विषय में ज्ञान प्राप्त करना केवल कौतूहल की दृष्टि से ही आवश्यक नहीं है, वरन यह काफी मनोरंजक भी है. भूमंडल पर सृष्टि की रचना कैसे हुई, सृष्टि का विकास कैसे हुआ और उस रचना में मनुष्य का क्या स्थान है ? प्राचीन युग के अनेक भीमकाय जीवों का लोप क्यों हो गया और उस दृष्टि से क्या अनेक वर्तमान वन्य जीवों के लोप होने की कोई आशंका है ? मानव समाज और वन्य जीवों का पारस्परिक संबंध क्या है ? यदि वन्य जीव भूमंडल पर न रहें, तो पर्यावरण पर तथा मनुष्य के आर्थिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

तेजी से बढ़ती हुई आबादी की प्रतिक्रिया वन्य जीवों पर क्या हो सकती है आदि प्रश्न गहन चिंतन और अध्ययन के हैं. इसलिए भारत के वन व वन्य जीवों के बारे में थोड़ी जानकारी आवश्यक है, ताकि लोग भलीभाँति समझ सकें कि वन्य जीवों का महत्व क्या है और वे पर्यावरण चक्र में किस प्रकार मनुष्य का साथ देते हैं. विज्ञान के क्षेत्र में असीमित प्रगति तथा नये आविष्कारों की स्पर्धा के कारण आज का मानव प्रकृति पर पूर्णतया विजय प्राप्त करना चाहता है।

इस कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है। वैज्ञानिक उपलब्धियों से मानव प्राकृतिक संतुलन को उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है। दूसरी ओर धरती पर जनसंख्या की निरंतर वृध्दि ,औद्योगीकरण एवं शहरीकरण की तीव्र गति से जहाँ प्रकृति के हरे भरे क्षेत्रों को समाप्त किया जा रहा है. पर्यावरण संरक्षण का समस्त प्राणियों के जीवन तथा इस धरती के समस्त प्राकृतिक परिवेश से घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रदूषण के कारण सारी पृथ्वी दूषित हो रही है और निकट भविष्य में मानव सभ्यता का अंत दिखाई दे रहा है।

इस स्थिति को ध्यान में रखकर सन् 1992 में ब्राजील में विश्व के 174 देशों का ‘पृथ्वी सम्मेलन’ आयोजित किया गया। इसके पश्चात सन् 2002 में जोहान्सबर्ग में पृथ्वी सम्मेलन आयोजित कर विश्व के सभी देशों को पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देने के लिए अनेक उपाय सुझाए गये। वस्तुतःपर्यावरण के संरक्षण से ही धरती पर जीवन का संरक्षण हो सकता है , अन्यथा मंगल ग्रह आदि ग्रहों की तरह धरती का जीवन-चक्र भी एक दिन समाप्त हो जायेगा।पर्यावरण प्रदूषण के कुछ दूरगामी दुष्प्रभाव हैं, जो अतीव घातक हैं जैसे आणविक विस्फोटों से रेडियोधर्मिता का आनुवांशिक प्रभाव , वायुमण्डल का तापमान बढ़ना , ओजोन परत की हानि , भूक्षरण आदि ऐसे घातक दुष्प्रभाव हैं। प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव के रूप में जल , वायु तथा परिवेश का दूषित होना एवं वनस्पतियों का विनष्ट होना , मानव का अनेक नये रोगों से आक्रान्त होना आदि देखे जा रहे हैं।

बड़े कारखानों से विषैला अपशिष्ट बाहर निकलने से तथा प्लास्टिक आदि के कचरे से प्रदूषण की मात्रा उत्तरोत्तर बढ़ रही है। पर्यावरण संरक्षण के प्रयास जंगलों को न काटे.कार्बन जैसी नशीली गैसों का उत्पादन बंद करे.उपयोग किए गए पानी का चक्रीकरण करें.ज़मीन के पानी को फिर से स्तर पर लाने के लिए वर्षा के पानी को सहेजने की व्यवस्था करें. ध्वनि प्रदूषण को सीमित करें.

प्लास्टिक के लिफाफे छोड़ें और रद्दी काग़ज़ के लिफाफे या कपड़े के थैले इस्तेमाल करें.जिस कमरे मे कोई ना हो उस कमरे का पंखा और लाईट बंद कर दें.पानी को फालतू ना बहने दें.आज के इंटरनेट के युग में, हम अपने सारे बिलों का भुगतान आनलाईन करें तो इससे ना सिर्फ हमारा समय बचेगा बल्कि काग़ज़ के साथ साथ पैट्रोल डीजल भी बचेगा.ज्यादा पैदल चलें और अधिक साइकिल चलाएं.प्रकृति से धनात्मक संबंध रखने वाली तकनीकों का उपयोग करें. जैसे- जैविक खाद का प्रयोग, डिब्बा-बंद पदार्थो का कम इस्तेमाल.जलवायु को बेहतर बनाने की तकनीकों को बढ़ावा दें. पहाड़ खत्म करने की साजिशों का विरोध करें दुनिया की प्रत्येक गतिविधि प्रकृति पर निर्भर करती है और उसका प्रभाव हमारी प्रकृति पर पड़ता है.

ऐसे में यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने आसपास के वातावरण और पर्यावरण को सुरक्षित व स्वच्छ रखें. हमारे मौजूदा हालात में कई ऐसी चीजें हैं जो प्रकृति के लिए खतरा साबित हो सकती हैं और पिछले उदाहरणों से यह साबित होता है कि हमने प्रकृति का संरक्षण करने के बजाय उसे अनदेखा कर दिया है. विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों, आवासों की रक्षा, रखरखाव और संरक्षण करना है.प्राकृतिक आपदाओं, ग्लोबल वार्मिंग, विभिन्न बीमारियों इत्यादि को दूर करने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करके प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ओर उनका ध्यान आकर्षिक करना है.

प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण ग्लोबल वार्मिंग, प्राकृतिक आपदाएं, बढ़ता हुआ तापमान आदि विभिन्न विनाशकारी समस्याओं का सामना हमें करना पड़ रहा है। आज स्थिति ऐसी हो गई है कि विश्व के कई ऐसी जगहों पर गर्मी पड़ रही है, जहां अमूमन ठंडा माहौल रहता था। इन संसाधनों का मनुष्यों के साथ-साथ बाकी जीवों के लिए भी महत्व है। हम इन संसाधनों का अपनी लालच के लिए अकेले ही दोहन नहीं कर सकते। हमें सह अस्तित्व पर जीना सीखना चाहिए।

इन संसाधनों का हमारे जीवन में काफी महत्व है। इनका उपयोग संतुलित ढंग से किया जाना चाहिए। . ग्लेशियर से बर्फ के विशाल टुकड़े गिरने से सैलानियों या स्थानीय लोगों की मौत की कई खबरें आती रहती हैं. ग्लेशियर में कई बार बड़ी-बड़ी दरारें होती हैं, जो ऊपर से बर्फ की पतली परत से ढंकी होती हैं. ये जमी हुई मजबूत बर्फ की चट्टान की तरह ही दिखती है. ऐसी चट्टान के पास जाने पर वजन पड़ते ही ग्लेशियर में मौजूद बर्फ की पतली परत टूट जाती है और व्यक्ति सीधे बर्फ की विशालकाय दरार में जा गिरता है.

कहना न होगा कि ये जानलेवा होताहै.हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर की स्थिति की लगातार निगरानी जरूरी है. हम समय रहते चेतावनी का सिस्टम विकसित करना चाहते हैं. इससे आबादी वाले निचले इलाकों को संभावित नुकसान से बचाया जा सकता है.  राज्य सरकार द्वारा कराये अध्ययन में पाया गया है कि 50 से अधिक ग्लेशियर तेजी से आकार बदल रहे हैं, मगर इसके बाद भी सरकार द्वारा कदम नहीं उठाए जा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि यदि सरकार व सरकारी तंत्र नहीं जागा तो यह स्थिति और खराब होगी. उत्तराखंड के ग्लेशियरों से गंगा, यमुना जैसी कई बड़ी नदियां निकलती हैं. इनसे पूरे उत्तर और पूर्वोत्तर भारत की प्यास बुझती है, लेकिन ये ग्लेशियर पर्यावरणीय लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं. पर्यावरणविदों का मानना है कि उत्तराखंड की नदियों पर बड़े बांध बनाना काफी खतरनाक है.

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