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भैरों सिंह शेखावत राजनीति के अजातशत्रु थे

15/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
राजस्थान के सीकर जिले के खाचरियावास में पैदा हुए देश के उपराष्ट्रपति और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व। भैरोसिंह शेखावत ऐसे राजनेता थे, जो आज की राजनीति में बिरले ही मिलते है। ‘बाबोसा’ के नाम से विख्यात रहे शेखावत के राजनीतिक जीवन से हर कोई प्रेरणा ले सकता है। जो 60 वर्ष से अधिक की यात्रा रही है। इस काल में शेखावत ने ऐसे-ऐसे उदाहरण समाज के सामने रखें जो नजीर बन गये। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन काल में वह सब काम किया जो आज किसी नेता के लिए करना आसान नहीं है। जानकारी के मुताबिक, भैरों सिंह के एक भाई बिशन सिंह जनसंघ से जुड़े हुए थे और अध्यापक काम करते थे. उस समय राजस्थान में जनसंघ का काम देखने वाले लालकृष्ण आडवाणी एक दिन उनके घर पर आए. वह बिशन सिंह से दाता-रामगढ़ सीट से चुनाव लड़ने को कहा, लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया और अपने भाई भैरों सिंह को लड़ने के लिए कहा. जब भैरों सिंह का चुनाव मैदान में उतरना तय हो गया तो वह अपनी पत्नी सूरज कंवर से 10 रुपये लेकर राजनीतिक सफर वह निकले. राजस्थान में लोकतंत्र की यात्रा की शुरुआत से वे इसके मुसाफिर बन गये थे। 1954 में जब वे प्रथम राजस्थान विधानसभा में जनसंघ के नेता थे। तब से ही उनके सामने अग्नि परीक्षा की शुरुआत हो गई थी, ऐसी परीक्षा उन्होंने जीवनकाल में अनेक बार दी और हर दफा सफल भी रहे। भूमि उन्मूलन के प्रस्ताव को पारित करने का सवाल हो या फिर सती रूप कंवर प्रकरण में अपने ही समाज की दकियानूसी का खुलकर विरोध करने का साहस हो, उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ दिखाया। उन्हें समाज के तथाकथित ठेकेदारों के उजुल-फिजूल फैसलों का मुंह तोड़ जवाब दिया तो ऐसा वातावरण बनाया गया मानो शेखावत ही राजपूत समाज के सबसे बड़े शत्रु हों। लेकिन कभी भी जात-पात, धर्म और सिद्धांत की राजनीति से राजनीति के चाणक्य ने समझौता नहीं किया और अपने उसूलों पर सियासत करते रहे। शेखावत की राजनीतिक यात्रा के हजारों किस्से हैं जिनको हम सुनकर आज अचंभित भी हो सकते हैं। बाबोसा ने बदले की भावना से राजनीति से सदैव परहेज रखा। वे अपने विरोधियों को भी सुनते समझते थे। शेखावत का पार्टी पॉलिटिक्स से ऊपर उठकर की जाने वाली सियासत का इतना महत्व था कि देश के अन्य राजनीतिक दलों में भी उनका हस्तक्षेप रहता था। भारत में कांग्रेस के युग पर ब्रेक लगाने के लिए बनी जनता पार्टी में उनके रोल को सदैव याद किया जाता रहेगा । पुलिस की नौकरी छूटने के बाद भैरोंसिंह शेखावत खेती करने लगे. 10 भाई-बहनों में एक भाई बिशन सिंह संघ से जुड़े थे. साल 1951 में बिशन सिंह स्कूल टीचर बन गए 1975 में जब वे रोहतक जेल में मीसा में बंद थे तो उस समय उनके साथ देश के बड़े नामी गरामी नेता भी थे। उसी वक्त जनता पार्टी की कल्पना को साकार रूप दिया जा रहा था, जिसका मूर्त रूप वर्ष- 1977 में जनता लहर के रूप में सामने आया। राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री के अलावा देश के 11वें उपराष्ट्रपति बने शेखावत का जीवन सदैव संघर्ष के साथ रहा। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन काल में ऐसे हजारों नेता तैयार किये जो आज की राजनीति में उदयमान है। उनकी कार्यशैली का हर कोई मुरीद होता था। जब भी कोई राजनीतिक संकट पैदा होता था तो उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी। चाहे जनसंघ हो या जनता पार्टी और बाद में भाजपा हर बड़े फैसलों में शेखावत की दखल रहती थी। इसके बाद भैरोंसिंह शेखावात ने 15 जुलाई, 1980-30 दिसम्बर, 1989 राजस्थान विधान सभा में विपक्ष के नेता के रूप में भी काम किया था. फिर 4 मार्च, 1990 को दूसरी बार सीएम बने और 15 दिसम्बर, 1992 रहे. इसके बाद भैरोंसिंह ने 4 दिसम्बर, 1993 तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 1 दिसम्बर, 1998 तक मुख्यमंत्री रहे.  19 अगस्त, 2002 को भैरोंसिंह शेखावत भारत के उपराष्ट्रपति बने और  21 जुलाई, 2007 तक इस पद रहे. 15 मई, 2010 को भैरों सिंह शेखावत का निधन हो गया था. राजनीति के नक्षत्र पर सदैव ‘धूमकेतु’ की तरह छाये रहने वाले शेखावत का सियासी जीवनकाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में हरदम अमित रहेगा। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुंचना, शेखावत की ईमानदारी, समर्पण और सादगी को दर्शाता है।उन्होंने कहा कि शेखावत, जिन्हें प्यार से ‘धरती पुत्र’ कहा जाता था, ग्रामीण जीवन से हमेशा गहराई से जुड़े रहे; अपनी जमीन से जुड़ी शख्सियत और जनसेवा की भावना के जरिए उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को लगातार प्रेरित किया। भैरोसिंह ने अपने राजनीतिक जीवन में कई उपलब्धियां हासिल की। उनके विलक्षण गुणों को देखते हुए भैरोसिंह शेखावत को महात्मागांधी काशी विद्यापीठ, आंध्रा विश्वविद्यालय, मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय ने डीलिट की उपाधि से सम्मानित किया था। इसके अलावा उनको एशियाटिक सोसायटी ऑफ मुंबई द्वारा फैलोशिप से सम्मानित किया गया था। वहीं येरेवन स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी अर्मेनिया से उनको गोल्ड मेडल और मेडिसिन डिग्री की डॉक्टरेट उपाधि से सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि एक किसान परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुंचना, शेखावत की ईमानदारी, समर्पण और सादगी को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि शेखावत, जिन्हें प्यार से ‘धरती पुत्र’ कहा जाता था, ग्रामीण जीवन से हमेशा गहराई से जुड़े रहे; अपनी जमीन से जुड़ी शख्सियत और जनसेवा की भावना के जरिए उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को लगातार प्रेरित किया। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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