डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आज 25 जुलाई है. यह एक ऐसा दिन, जो उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के वन्यजीव प्रेमियों के लिए बेहद खास है. आज महान शिकारी प्रकृति प्रेमी और वन्यजीव संरक्षण के अग्रदूत एडवर्ड जेम्स जिम कॉर्बेट की 151वीं जयंती है. जिम कॉर्बेट जिनका नाम कभी आदमखोर बाघों और तेंदुओं के खात्मे से जुड़ा था, लेकिन समय के साथ यही शिकारी वन्यजीव संरक्षण का ऐसा चेहरा बन गया, जिसकी सोच आज भी जंगल और इंसान के बीच संतुलन बनाने की प्रेरणा देती है. जिम कार्बेट जंगल और जीवन के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए जिद्दी थे. उनकी कोशिशें इसी दिशा में किये गये प्रयास हैं.जिम कॉर्बेट की जयंती पर कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और कालाढूंगी की छोटी हल्द्वानी में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इस जयंती पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस सोच के साथ जिम कॉर्बेट ने जंगल, वन्यजीव और स्थानीय समाज के बीच संबंधों को समझा था क्या आज हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?क्योंकि एक तरफ कॉर्बेट लैंडस्केप बाघ संरक्षण की सफलता की दुनिया में मिसाल बन चुका है. दूसरी तरफ बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष, जंगलों पर बढ़ता दबाव और तेजी से बढ़ता मास टूरिज्म संरक्षण के सामने नई चुनौती बनकर खड़ा है. ऐसे में जिम कॉर्बेट की 151वीं जयंती सिर्फ उत्सव मनाने का मौका नहीं बल्कि उनकी सोच को समझने और आज के दौर में उसे लागू करने पर मंथन करने का भी समय है. नैनीताल की पहाड़ियों में जन्मे जिम कॉर्बेट ने जंगल और पहाड़ के जीवन को बेहद करीब से देखा और समझा. उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों की समस्याओं को जाना. उनकी भाषा, संस्कृति और भावनाओं को समझा. यही वजह है कि जिम कॉर्बेट की कहानी सिर्फ एक शिकारी की कहानी नहीं है बल्कि यह उस व्यक्ति की कहानी है, जिसने इंसान और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को समझने और उसे कम करने का प्रयास किया.आज जब उत्तराखंड के पहाड़ों से लेकर मैदानी इलाकों तक गुलदार, हाथी, भालू और बाघ के साथ इंसानों के संघर्ष की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं तब जिम कॉर्बेट की कार्यशैली को याद करना और उससे सीख लेना बेहद जरूरी हो जाता है इस मामले में वन्यजीव प्रेमी एवं पक्षी विशेषज्ञ सुमंता घोष कहते हैं सबसे पहले तो हम सभी के लिए यह गर्व की बात है कि भारत ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया का पहला नेशनल पार्क कॉर्बेट लैंडस्केप में स्थापित हुआ. बाद में इसका नाम जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रखा गया. जिम कॉर्बेट नैनीताल में जन्मे थे. स्थानीय लोगों तथा पहाड़ की संस्कृति को बहुत करीब से समझते थे. यही वजह है कि कॉर्बेट हमारे लिए आज भी बेहद महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने कहा आज मानव और वन्यजीव संघर्ष अपने चरम पर है. कॉर्बेट के समय भी यह संघर्ष काफी गंभीर था. कई आदमखोर बाघ और तेंदुए लोगों की जान ले रहे थे. ऐसे समय में जिम कॉर्बेट स्थानीय लोगों के बीच गए. उनकी समस्याओं को समझा. मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. शिकारी और महान व्यक्तित्व के धनी जेम्स एडवर्ड जिम कॉर्बेट की आज जयंती है. जिम कॉर्बेट एक महान शिकारी थे. उन्होंने 1907 से 1938 के बीच कुमाऊं और गढ़वाल दोनों जगह नरभक्षी बाघों और तेंदुओं के आतंक से छुटकारा दिलाया था. बताते हैं जिम ने 31 साल में 19 आदमखोर बाघ और 14 तेंदुओं को ढेर किया था. मानते हैं कि जिम कॉर्बेट की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने स्थानीय समुदाय को संरक्षण की प्रक्रिया से अलग नहीं किया. वह ग्रामीणों के साथ बैठते थे. उनकी बात सुनते थे. जंगल तथा वन्यजीवों के संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका को समझते थे.आज जब मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं. ऐसे में यही सवाल उठता है कि क्या संरक्षण की रणनीति बनाने से पहले हम उन लोगों के बीच जा रहे हैं, जो सीधे जंगल के किनारे रहते हैं? कहते हैं कॉर्बेट स्थानीय लोगों के साथ काम करते थे. ग्रामीणों की भाषा, उनकी संस्कृति, उनके देवी-देवताओं और उनकी भावनाओं को समझते थे. लोगों के साथ उनका उठना-बैठना था. आज जब हम मानव-वन्यजीव संघर्ष की बात करते हैं, तो हमें भी ग्रामीणों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना होगा उन्होंने कहा आज संरक्षण के सामने सिर्फ मानव-वन्यजीव संघर्ष ही चुनौती नहीं है. पर्यटन भी एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है. कॉर्बेट लैंडस्केप में हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं. पर्यटन से हजारों लोगों की आजीविका जुड़ी है. स्थानीय होटल, रिसॉर्ट, होमस्टे, जिप्सी चालक, नेचर गाइड और छोटे कारोबारी इससे रोजगार पाते हैं. लेकिन सवाल यह है कि पर्यटन कितना हो? और किस तरीके से हो?सुमंता घोष कहते हैं क्योंकि जब पर्यटन संरक्षण से ऊपर हो जाए, जंगल में वाहनों की संख्या बढ़ जाए, जब तेज आवाज, डीजे और अनियंत्रित गतिविधियां वन्यजीवों के प्राकृतिक जीवन में दखल देने लगें, तो यही पर्यटन जंगल के लिए खतरा भी बन सकता है. वहीं, वन्यजीव प्रेमी और जानकार संजय छिम्वाल का मानना है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए आज वन विभाग को जिम कॉर्बेट की कार्यशैली से सीख लेने की जरूरत है. 25 जुलाई का दिन वन्यजीव प्रेमियों और कॉर्बेट से जुड़े लोगों के लिए बेहद खास और हर्ष का दिन है. जिम कॉर्बेट ने वर्ष 1930 के दशक में ही यह सोच विकसित कर ली थी कि बाघ और अन्य वन्यजीवों का संरक्षण बेहद जरूरी है. खुद शिकारी होने के बावजूद उन्होंने बाद में शिकार छोड़कर वन्यजीव संरक्षण का संकल्प लिया.आज कॉर्बेट सहित पूरे उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी चुनौती बन चुका है. पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक गुलदार, भालू, हाथी और बाघ के साथ इंसानों के संघर्ष की घटनाएं सामने आ रही हैं. जिम कॉर्बेट ने साल 1915 में स्थानीय व्यक्ति से कालाढूंगी क्षेत्र के छोटी हल्द्वानी में जमीन खरीदी. सर्दियों में यहां रहने के लिए जिम कॉर्बेट ने एक घर बना लिया और 1922 में यहां रहना शुरू कर दिया. गर्मियों में वो नैनीताल में गर्नी हाउस में रहने के लिए चले जाया करते थे. उन्होंने अपने सहयोगियों के लिए अपनी 221 एकड़ जमीन को खेती और रहने के लिए दे दिया, जिसे आज कॉर्बेट का गांव छोटी हल्द्वानी के नाम से जाना जाता है.उस दौर में छोटी हल्द्वानी में चौपाल लगा करती थी. आज भी देश-विदेश से सैलानी कॉर्बेट के गांव छोटी हल्द्वानी घूमने के लिए आते हैं. साल 1947 में जिम कॉर्बेट देश छोड़ कर विदेश चले गए और कालाढूंगी स्थित घर को अपने मित्र चिरंजी लाल शाह को दे गए.1965 में चौधरी चरण सिंह वन मंत्री बने तो उन्होंने इस ऐतिहासिक बंगले को आने वाली नस्लों को जिम कॉर्बेट के महान व्यक्तित्व को बताने के लिए चिरंजी लाल शाह से 20 हजार रुपए देकर खरीद लिया और एक धरोहर के रूप में वन विभाग के सुपुर्द कर दिया. तब से लेकर आज तक यह बंगला वन विभाग के पास है. वन विभाग ने जिम कॉर्बेट की अमूल्य धरोहर को आज एक संग्राहलय में तब्दील कर दिया है. हजारों की तादाद में देश-विदेश से सैलानी जिम कॉर्बेट से जुड़ी यादों को देखने के लिए आते हैं. जिम कॉर्बेट का नाम महान शिकारियों में जाना जाने लगा. कई आदमखोरों का शिकार करने के बाद जिम के मन में जीवों के प्रति प्रेम बढ़ गया. हृदय परिवर्तन होने के कारण जिम कॉर्बेट ने बाघों के संरक्षण के लिए काम करना शुरू कर दिया. फिर उसके बाद जिम कॉर्बेट ने कभी बाघ या अन्य जानवरों को मारने के लिए बंदूक नहीं उठाई. इसके अलावा उन्होंने सामजिक कार्यों से लोगों की मदद की. जिस कारण उनके सम्मान में भारत सरकार ने 1955 में राष्ट्रीय उद्यान राम गंगा नेशनल पार्क का नाम बदल कर कॉर्बेट नेशनल पार्क रख दिया. ये आज भी विश्व में बाघों की राजधानी के रूप में जाना जाता है, जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में सैलानी देश-विदेश से आते हैं. आज भी व्यवसाय करने वाले कहते हैं कि जिम कॉर्बेट पार्क रामनगर में अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं. इसलिए आज भी वे जिंदा हैं. आज भी व्यवसाय करने वाले कहते हैं कि जिम कॉर्बेट पार्क रामनगर में अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं. इसलिए आज भी वे जिंदा हैं.।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











