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सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत उत्सव है जगन्नाथ रथ यात्रा

25/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
प्राचीन इतिहास को देखें तो भारतीय उपमहाद्वीप में ईश्वर की उपासना मंदिरों से बहुत पहले से होती थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता (लगभग 2600 से 1900 ईसा पूर्व) में संगठित मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं, हालांकि पूजा और धार्मिक प्रतीकों के साक्ष्य अवश्य मिले हैं। वैदिक काल (1500–600 ईसा पूर्व) में पूजा का मुख्य केंद्र यज्ञ था। उस समय स्थायी मंदिरों की परंपरा नहीं थी। देवताओं की आराधना यज्ञ वेदियों पर होती थी। लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच मूर्ति-पूजा और देवालयों का विकास प्रारंभ हुआ।गुप्त काल (चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी) को भारत में पत्थर के स्थायी हिन्दू मंदिरों का स्वर्णकाल माना जाता है। इसी समय देवगढ़, भितरगाँव, उदयगिरि आदि के मंदिर बने। इसके बाद दक्षिण भारत में पल्लव, चोल, चालुक्य, राष्ट्रकूट और होयसाल शासकों ने विशाल मंदिरों का निर्माण कराया। मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं थे। वे समाज के बहुआयामी केंद्र थे। मुख्य रूप से ईश्वर की उपासना, शिक्षा (गुरुकुल एवं वेद पाठ), कला, संगीत और नृत्य का संरक्षण, सामाजिक सभाएँ, दान एवं अन्नक्षेत्र, यात्रियों के विश्राम स्थल तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र माने जाते थे।कई बड़े मंदिरों के पास गाँव, कृषि भूमि, गौशालाएँ और शिल्पकारों का संरक्षण भी होता था। दक्षिण भारत के अनेक मंदिर अपने समय के सबसे बड़े आर्थिक संस्थानों में गिने जाते थे। राजा मंदिर बनवाता था, भूमि दान देता था और सुरक्षा देता था। दूसरी ओर, धार्मिक अनुष्ठान पुरोहितों या मठों के अधीन होते थे। इससे दो प्रकार के अधिकार विकसित हुए—धार्मिक अधिकार: पूजा कौन कराएगा, परंपरा क्या होगी, महंत या पुजारी कौन होगा; तथा प्रशासनिक एवं आर्थिक अधिकार: दान, भूमि, आय और प्रबंधन किसके नियंत्रण में होगा। जब मंदिरों की संपत्ति बढ़ी, तब इन अधिकारों को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे।प्राचीन भारत में भी विवाद होते थे। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों से पता चलता है कि विभिन्न मठों और संप्रदायों के बीच पूजा-अधिकार को लेकर मतभेद होते थे। राजाओं को कभी-कभी मंदिर प्रशासन में हस्तक्षेप करना पड़ता था। मंदिरों की दान-भूमि और आय के प्रबंधन पर शाही आदेश जारी किए जाते थे। कई शिलालेखों में मंदिर अधिकारियों को हटाने या नए प्रबंधक नियुक्त करने का उल्लेख मिलता है।हालाँकि आधुनिक अर्थों में अदालतें नहीं थीं, इसलिए अधिकांश विवाद राजा, स्थानीय सभा (सभा/महासभा), ग्राम परिषद या धार्मिक परिषद द्वारा सुलझाए जाते थे। मध्यकाल में बड़े मठों और मंदिरों के पास विशाल संपत्ति हो गई। इससे महंत पद के उत्तराधिकार पर विवाद बढ़े। अलग-अलग धार्मिक संप्रदायों में नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा हुई। कुछ स्थानों पर हिंसक संघर्ष भी हुए।स्थानीय शासकों और धार्मिक संस्थाओं के बीच शक्ति-संतुलन का प्रश्न उत्पन्न हुआ। ब्रिटिश शासन के दौरान सरकार ने देखा कि अनेक मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के पास बड़ी संपत्ति है। 19वीं शताब्दी में विभिन्न प्रांतों में धार्मिक बंदोबस्त और ट्रस्ट संबंधी कानून बनाए गए। धीरे-धीरे सरकार ने प्रत्यक्ष नियंत्रण कम किया और धार्मिक न्यासों तथा ट्रस्टों की व्यवस्था विकसित हुई।स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राज्यों ने मंदिर प्रबंधन के लिए कानून बनाए। इसके बाद विवादों का स्वरूप बदल गया-पारंपरिक पुजारी बनाम सरकारी ट्रस्ट, वंशानुगत अधिकार बनाम आधुनिक प्रशासन, मंदिर की आय और संपत्ति का प्रबंधन तथा श्रद्धालुओं के अधिकार बनाम धार्मिक परंपरा। इसी प्रकार गुरुद्वारों में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और स्थानीय प्रबंधन, मस्जिदों में वक्फ बोर्ड और मुतवल्ली, चर्चों में डायोसीज़ और ट्रस्ट तथा कई मठों में महंत के उत्तराधिकार को लेकर भी विवाद हुए।इतिहासकारों का सामान्य मत है कि मंदिर मूलतः आध्यात्मिक और सामाजिक संस्थाएँ थे, लेकिन जैसे-जैसे उनके पास भूमि, दान, आर्थिक संसाधन और सामाजिक प्रभाव बढ़ा, वैसे-वैसे प्रबंधन, उत्तराधिकार और स्वामित्व के विवाद भी बढ़े। यह प्रवृत्ति केवल हिन्दू मंदिरों तक सीमित नहीं रही; भारत और विश्व के लगभग सभी बड़े धार्मिक संस्थानों में किसी-न-किसी रूप में ऐसे विवाद देखने को मिलते हैं। उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध चारधामों में शामिल बदरीनाथ और केदारनाथ इन दिनों धार्मिक महत्व के बजाय वित्तीय अनियमितताओं और दान से जुड़े विवादों के कारण चर्चाओं में हैं. एक ओर बदरीनाथ धाम के चढ़ावा चोरी प्रकरण में पुलिस ने मुख्य आरोपी को गिरफ्तार कर जांच को निर्णायक मोड़ पर पहुंचा दिया है. वहीं, दूसरी ओर केदारनाथ धाम में मंदिर समिति के कोष से वीआईपी मेहमानों के आवास और भोजन पर खर्च किए जाने के मामले में जांच रिपोर्ट ने वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि कर दी है. दोनों घटनाओं ने नय केवल मंदिर प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए हैं बल्कि देशभर से चारधाम पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के बीच भी चिंता पैदा कर दी है कि आखिर आस्था से जुड़े संस्थानों में जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी? केदारनाथ धाम में विशिष्ट अतिथियों के आवास और भोजन पर मंदिर समिति की ओर से खर्च किए जाने के आरोपों की जांच अब पूरी हो चुकी है. बदरी-केदार मंदिर समिति द्वारा गठित चार सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है. समिति की रिपोर्ट में वित्तीय प्रक्रियाओं में अनियमितताओं की पुष्टि की गई है. बीकेटीसी अध्यक्ष ने खुद बताया जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है. अब शासन के निर्देशों के के आदेश पर कार्रवाई की जाएगी. उनके अनुसार समिति ने पूरे प्रकरण से जुड़े अभिलेखों भुगतान प्रक्रिया और बिलों की विस्तार से जांच की जिसमें कई बिंदुओं पर वित्तीय नियमों का पालन नहीं पाए जाने की बात सामने आई. मामले को केवल मंदिर समिति तक सीमित नहीं रखा गया. जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद उत्तराखंड शासन ने भी इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता माना. शासन ने संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद् नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश जारी किये. 25 जून 2026 को उप सचिव की ओर से बीकेटीसी के मुख्य कार्याधिकारी को भेजे गए पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि मंदिर कोष से अग्रिम धनराशि बिना सक्षम स्तर की स्वीकृति के जारी करना प्रथम दृष्टया वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है. पत्र में तत्कालीन व्यवस्थापक केदारनाथ तत्कालीन मुख्य प्रभारी अधिकारी तथा तत्कालीन मुख्य कार्याधिकारी की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई गई है. शासन ने बीकेटीसी अधिनियम 1939 और उसके अंतर्गत लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है. पूरा विवाद उस समय सामने आया जब आरटीआई के माध्यम से कुछ दस्तावेज सार्वजनिक हुए. इन दस्तावेजों में आरोप लगाया गया कि केदारनाथ धाम पहुंचे कुछ वीआईपी व्यक्तियों के भोजन और आवास का खर्च मंदिर समिति के खाते से वहन किया गया. दस्तावेजों में भाजपा प्रदेश सचिव नाम पर लगभग 60 हजार रुपये तथा केदारनाथ विधायक के नाम पर लगभग 37 हजार रुपये से अधिक खर्च का उल्लेख किया गया. दस्तावेज सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे श्रद्धालुओं की दान और चढ़ावा राशि के दुरुपयोग का मामला बताया. हालांकि जिन नेताओं के नाम सामने आए, उन्होंने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने अपने निजी खर्च का भुगतान स्वयं किया था. केदारनाथ और बदरीनाथ जैसे धामों में हर वर्ष लाखों श्रद्धालु श्रद्धा के साथ दान और चढ़ावा अर्पित करते हैं. ऐसे में यदि मंदिर कोष की राशि का उपयोग निर्धारित नियमों से हटकर किया जाता है तो यह केवल वित्तीय विषय नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था का प्रश्न बन जाता है. यही कारण है कि जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद धार्मिक संगठनों और आम श्रद्धालुओं के बीच भी इस विषय पर चर्चा तेज हो गई है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सहित विपक्ष ने पूरे मामले में पारदर्शी जांच और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है. बीकेटीसी अध्यक्ष का कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाएगी. भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो इसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे. कुल मिलाकर कहें तो इन दिनों उत्तराखंड चारधाम यात्रा से अधिक इन धामों में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर चर्चाओं में है. जिसके कारण धामों की साख पर सवाल उठने लगे हैं. बदरीनाथ और केदारनाथ, इन दोनों धामों में ही सबसे अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं. जिसके कारण हर किसी की नजर इस पर है. यदि सनातन समाज को अपनी इन पावन संस्थाओं की साख और पवित्रता को अक्षुण्ण रखना है, तो अब केवल आत्मग्लानि से काम नहीं चलेगा। इसके लिए कुछ बेहद कड़े और क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे।सबसे पहले, देश के हर छोटे-बड़े सरकारी या निजी मंदिर ट्रस्ट का सालाना कैग की तर्ज पर एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी ऑडिट होना अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिसकी रिपोर्ट आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध हो।दूसरा, जो लोग धर्म की आड़ में, ईश्वर के कोष से चोरी या हेराफेरी करते हैं, उनके इस कृत्य को साधारण चोरी न मानकर ‘महापाप और राष्ट्रद्रोह’ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और इसके लिए त्वरित अदालत के माध्यम से कठोरतम दंड का प्रावधान हो।मंदिर की आय का एक बड़ा और निश्चित हिस्सा अनिवार्य रूप से विश्वस्तरीय गुरुकुलों की स्थापना, निशुल्क चिकित्सालयों, अनाथालयों, आधुनिक शोध संस्थानों और प्राकृतिक आपदा प्रबंधन कोष में जाना चाहिए।तभी ‘मानव सेवा ही माधव सेवा’ का मूल संकल्प सार्थक हो सकेगा। समय आ गया है कि समाज इस धार्मिक डकैती के खिलाफ मुखर हो, अन्यथा भव्य पत्थरों के ऊंचे मंदिर तो खड़े रहेंगे, लेकिन जिस आस्था की नींव पर वे टिके हैं, वह भीतर से पूरी तरह खोखली हो जाएगी।। रथ यात्रा का मुख्य विषय भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा की गुंडिचा मंदिर की यात्रा है। वे जगन्नाथ पुरी से अपनी मौसी के घर आते हैं और भक्तों पर आशीर्वाद बरसाते हैं। यह त्योहार भक्ति, संस्कृति और सामुदायिक भावना का प्रदर्शन है। सभी जातियों और व्यवसायों के लोग सच्ची सेवा और करुणा दिखाने के लिए एक साथ आते हैं। यह लोगों के बीच विनम्रता, सेवा और एकता के महत्व पर भी बल देता है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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