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जानलेवा हमले के बाद काटने पड़े दोनों पैर, सी सदानंदन मास्टर

14/07/25
in उत्तराखंड, दुनिया, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
कभी सोचा है, कोई इंसान अपने दोनों पैर गंवाने के बाद भी ज़िंदगी की दौड़ में इतनी तेज़ी से भागे कि सीधा संसद तक पहुंच जाए? ये कोई फ़िल्मी कहानी नहीं, बल्कि केरल के सदानंदन मास्टर की सच्ची और दिल छू लेने वाली दास्तान है, जिन्हें हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है. 25 जनवरी, 1994 की है. सदानंदन मास्टर अपनी बहन की शादी का न्योता देकर घर लौट रहे थे. घर में जश्न का माहौल था, क्योंकि कुछ दिनों बाद ही उनकी बहन की सगाई थी. लेकिन किसे पता था कि ये ख़ुशियां मातम में बदलने वाली हैं. जैसे ही वो कार से उतरे, कम्युनिस्ट पार्टी  कार्यकर्ताओं के एक गुट ने उन पर बेरहमी से हमला कर दिया. हमलावरों ने उन्हें घसीटा और फिर उनके दोनों पैर काट दिए. इतना ही नहीं, उन्होंने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उनके कटे हुए पैरों को सड़क पर रगड़ा ताकि भविष्य में उनकी सर्जरी न हो सके. उस वक़्त सदानंदन मास्टर की उम्र महज़ 30 साल थी. शारीरिक विकलांगता उनके हौसले को नहीं तोड़ पाई. कृत्रिम पैर लगवाकर उन्होंने एक नई शुरुआत की. 1999 में उन्होंने त्रिशूर ज़िले के एक माध्यमिक विद्यालय में सामाजिक विज्ञान के शिक्षक के रूप में नौकरी की. अगले 25 सालों तक उन्होंने पूरी लगन से बच्चों को पढ़ाया और 2020 में रिटायर हुए.शिक्षक के तौर पर सेवा देने के बाद भी उनका सामाजिक और राजनीतिक कार्यों के प्रति जुनून कम नहीं हुआ. वह और अधिक सक्रिय हो गए. बीजेपी ने उन्हें 2016 और फिर 2021 में विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार भी बनाया था. और अब, जुलाई 2025 में राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत कर एक नया सम्मान दिया है. इस पर सदानंदन मास्टर ने कहा कि यह उनके लिए गर्व का क्षण है और पार्टी ने उन पर जो विश्वास दिखाया है, उसके लिए वे आभारी हैं. उन्होंने कहा कि उनका कर्तव्य है कि वे ‘विकसित केरल और विकसित भारत’ के पार्टी के नारे को बुलंद करें और कन्नूर ज़िले के पार्टी कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ाएं, जिन्होंने पार्टी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है.पीएम ने भी सदानंदन मास्टर की सराहना करते हुए कहा कि उनका जीवन साहस और अन्याय के आगे न झुकने की भावना का प्रतीक है. पीएम ने कहा कि हिंसा और धमकियां राष्ट्र के विकास के प्रति उनके जज़्बे को रोक नहीं पाईं. एक शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी उनके प्रयास सराहनीय हैं और वे युवा सशक्तीकरण में गहरी आस्था रखते हैं.सदानंदन मास्टर की कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं, अगर हौसला बुलंद हो तो हर बाधा को पार किया जा सकता है. यह सिर्फ़ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति और संघर्ष की एक मिसाल है. सदानंदन केरल के कुछ हिस्सों में राजनीतिक हिंसा से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहे हैं। सदानंदन का विवाह वनिता रानी से हुआ है, जो स्वयं भी एक शिक्षिका हैं। उनकी बेटी यमुना भारती बी.टेक की छात्रा है। उनका परिवार केरल में शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय रहा हैउनका पूरा परिवार शिक्षा और समाजसेवा के मूल्यों को अपनाकर जीवन जी रहा है।शिक्षाविद सी. सदानंदन मास्टर ​61 साल के हैं. वे केरल के कन्नूर में जन्मे. पेशे से वे शिक्षाविद और राजनेता रहे हैं. उन्‍होंने ग्रामीण शिक्षा, आदिवासी विकास और सामाजिक समरसता पर काम किया है. उनका केरल के पश्चिम इलाकों में शिक्षा के प्रसार के लिए सक्रिय योगदान रहा.
केरल में वे विभिन्न सामाजिक संगठनों और शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े रहे. राजनैतिक कैरियर की बात करें तो सी. सदानंदन मास्टर केरल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उपाध्यक्ष रह चुके हैं. इसके अलावा वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ प्रचारक भी रहे हैं. 2016 और 2021 में उन्‍होंने विधानसभा चुनाव भी लड़ा था. प्रधानमंत्री ने 13 जुलाई को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में सदानंदन की प्रशंसा करते हुए कहा, “श्री सी सदानंदन मास्टर का जीवन साहस और अन्याय के आगे न झुकने की भावना का प्रतीक है वे युवा सशक्तिकरण के प्रति बेहद समर्पित हैं। राज्यसभा के लिए मनोनीत होने पर उन्हें बधाई।”प्रभावित लोगों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे हैं. उनकी यह प्रतिबद्धता उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में विशिष्ट पहचान देती है.। पैर काटे जाने के चलते मास्टर सदानंदन चलने-फिरने में सक्षम नहीं रहे थे। उनका कई दिनों तक अस्पताल में इलाज चला। सदानंदन मास्टर को इसके बाद प्रोस्थेटिक लेग्स यानी नकली पैर लगाए गए। उन्होंने इनसे चलना 6 महीने में सीख लिया और वापस संघ के काम में लग गए। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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