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भारत के लिए अवसर या चुनौती?

24/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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‘डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दुनिया के ऑटोमोबाइल बाजार में बड़ा बदलाव धीमे-धीमे आकार ले रहा है। पेट्रोल और डीजल से चलने वाली पारंपरिक गाड़ियां जो पिछले सौ वर्षों से आधुनिक परिवहन व्यवस्था की पहचान रही हैं, अब धीरे-धीरे अपनी पकड़ खो रही हैं। उनकी जगह इलेक्ट्रिक वाहन ले रहे हैं। हाल में प्रकाशित एक अध्ययन ने यह दावा किया है कि यूरोप और चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है, बाजार स्वयं इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में आगे बढ़ रहा है और पारंपरिक ईंधन आधारित वाहनों की वापसी मुश्किल होती जा रही है। यह केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि ऊर्जा, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और वैश्विक राजनीति तक असर डालने वाला बदलाव है। सवाल यह है कि इस वैश्विक परिवर्तन के बीच भारत कहां खड़ा है?यूरोप और चीन के संदर्भ में किए गए अध्ययन का सार है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री तेजी से कई गुना बढ़ रही है, यानी हर कुछ वर्षों में इनकी संख्या लगभग दोगुनी हो रही है और इन देशों में यह बाजार अब अपने बल पर आगे बढ़ने लगा है। शोधकर्ताओं के अनुसार इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती बिक्री, पेट्रोल-डीजल कारों की घटती मांग, बाजार में इलेक्ट्रिक वाहन के बढ़ते विकल्प और कीमतों में कम होता अंतर इस बात के संकेत हैं कि अब बाजार तेजी से बदलाव की दिशा में बढ़ चुका है, जहां से पुराने ढर्रे पर लौटना आसान नहीं होगा। चीन और यूरोप में यह परिवर्तन केवल बाजार की ताकत से नहीं आया, बल्कि वर्षों की नीति, सब्सिडी, सरकारी निवेश और उद्योग की तैयारी ने मिलकर इसे संभव बनाया है।आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है और तेजी से शहरीकरण, बढ़ती आय, ऊर्जा आयात और प्रदूषण जैसी चुनौतियों के बीच परिवहन का भविष्य तय करने की स्थिति में है। भारत की सड़कों पर आज भी पेट्रोल और डीजल वाहन हावी हैं, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहनों की उपस्थिति अब केवल प्रयोगात्मक नहीं रही। दोपहिया और तिपहिया वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहन की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। शहरी परिवहन में इलेक्ट्रिक बसें भी धीरे-धीरे जगह बना रही हैं। लेकिन चारपहिया निजी वाहनों के मामले में भारत अभी शुरुआती चरण में है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत भी उसी “निर्णायक मोड़” की ओर बढ़ रहा है, जिसकी चर्चा यूरोप और चीन के संदर्भ में हो रही है?भारत के सामने इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में बढ़ने का सबसे बड़ा तर्क आर्थिक है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। तेल की कीमतों में वैश्विक उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने पर महंगाई बढ़ती है, परिवहन लागत बढ़ती है और विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है। ऐसे में अगर परिवहन का बड़ा हिस्सा बिजली आधारित हो जाए, तो तेल आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। अध्ययन भी बताता है कि तेल आयात करने वाले देशों को इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर संक्रमण से आर्थिक लाभ हो सकता है, क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और व्यापार संतुलन बेहतर हो सकता है।पर्यावरणीय नजरिये से भी भारत के लिए इलेक्ट्रिक वाहन बदलाव केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बनता जा रहा है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में वायु प्रदूषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। परिवहन क्षेत्र इसका बड़ा कारण है। पेट्रोल और डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं कार्बन उत्सर्जन के साथ-साथ नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कणों के रूप में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबद्धताएं जताई हैं। ऐसे में अगर परिवहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार होता है, तो कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह भी सच है कि इलेक्ट्रिक वाहन तभी वास्तव में हरित विकल्प होंगे, जब बिजली उत्पादन में भी स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़े।लेकिन भारत की चुनौतियां यूरोप और चीन से अलग हैं। चीन ने इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को बड़े पैमाने पर सरकारी सब्सिडी, बैटरी उत्पादन, सार्वजनिक खरीद और विनिर्माण क्षमता के सहारे विकसित किया। यूरोप ने भी कठोर उत्सर्जन नियमों और प्रोत्साहनों के जरिए बाजार को दिशा दी। भारत में नीति-स्तर पर फेम जैसी योजनाएं और राज्य सरकारों की इलेक्ट्रिक वाहन नीतियां आई हैं, लेकिन अभी भी बुनियादी ढांचे की कमी बड़ी बाधा है। चार्जिंग स्टेशन सीमित हैं, बैटरियों की लागत अधिक है और उपभोक्ताओं के मन में अब भी यह आशंका बनी हुई है कि लंबी दूरी की यात्रा के दौरान बैटरी खत्म होने पर चार्जिंग सुविधा समय पर मिलेगी या नहीं। ग्रामीण और छोटे शहरों में यह चुनौती और अधिक जटिल है। इसलिए भारत में इलेक्ट्रिक वाहन परिवर्तन केवल बाजार के भरोसे नहीं हो सकता, इसके लिए नीति और निवेश दोनों की निरंतर जरूरत होगी।अध्ययन में यह भी कहा गया है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की सफलता केवल सब्सिडी से नहीं आती, बल्कि सब्सिडी, अनिवार्य नीतियां, सार्वजनिक खरीद और बाजार उपलब्धता के संयुक्त प्रभाव से इलेक्ट्रिक वाहनों की स्वीकार्यता अपने आप तेजी से बढ़ने लगती है। यह बात भारत के संदर्भ में बहुत प्रासंगिक है। अगर केवल उपभोक्ताओं से अपेक्षा की जाए कि वे महंगे इलेक्ट्रिक वाहन खरीद लें, तो बदलाव धीमा रहेगा। लेकिन अगर सरकार सार्वजनिक परिवहन, टैक्सी सेवाओं, डिलीवरी नेटवर्क और सरकारी वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहनों को अनिवार्य रूप से बढ़ाए, तो मांग और बाजार दोनों तेजी से बदल सकते हैं। भारत में दोपहिया और तिपहिया क्षेत्र में यही शुरुआती संकेत दिखाई भी दे रहे हैं।यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या भारत इलेक्ट्रिक वाहन  केवल आयातित तकनीक का बाजार बनेगा या इस परिवर्तन को औद्योगिक अवसर में बदल पाएगा? बैटरी निर्माण, लीथियम आपूर्ति, सेमीकंडक्टर, चार्जिंग तकनीक और स्थानीय विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भारत के पास असीमित अवसर है। अगर भारत ने समय रहते उत्पादन क्षमता विकसित की तो वह न केवल घरेलू मांग पूरी कर सकता है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा भी बन सकता है। लेकिन अगर  नीति में स्पष्टता और निवेश में निरंतरता नहीं रही, तो भारत केवल उपभोक्ता बाजार बनकर रह जाएगा।यह भी गौरतलब है कि इलेक्ट्रिक वाहनों का परिवर्तन केवल तकनीकी बदलाव नहीं, सामाजिक बदलाव भी है। लाखों लोग ऑटोमोबाइल सर्विसिंग, ईंधन आपूर्ति, इंजन पार्ट्स और पारंपरिक वाहन उद्योग से जुड़े हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों में इंजन की जटिलता कम होती है, रखरखाव की प्रकृति बदलती है और रोजगार का ढांचा भी बदल सकता है। इसलिए यह संक्रमण केवल पर्यावरण नीति नहीं, रोजगार और कौशल विकास की नीति भी है। भारत को इस बदलाव के लिए कार्यबल को तैयार करना होगा।अध्ययन के अनुसार अगर दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार इसी गति से जारी रहा तो 2030 के आसपास तेल की मांग अपने चरम पर पहुंच सकती है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह अवसर हो सकता है, लेकिन तेल निर्यातक देशों की वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में इससे अस्थिरता भी पैदा हो सकती है। इसलिए भारत को ऊर्जा सुरक्षा की नई रणनीति बनानी होगी।असल प्रश्न यह है कि भारत इस बदलाव में क्‍या अग्रणी बनेगा। दुनिया के बड़े बाजारों ने संकेत दे दिए हैं कि भविष्य इलेक्ट्रिक परिवहन की दिशा में बढ़ रहा है। भारत के पास भी अवसर है कि वह इसे केवल पर्यावरणीय मजबूरी के रूप में न देखे, बल्कि आर्थिक, औद्योगिक और ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति के रूप में अपनाएं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नई दिल्ली में आयोजित ‘सेव इंटरनेशनल 2025 वैल्यू समिट’ में भारत को ऑटोमोबाइल विनिर्माण, हरित गतिशीलता और बुनियादी ढांचे नवाचार में दुनिया में अग्रणी केंद्र के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षी भविष्‍य योजना व्‍यक्‍त की।इस दौरान, गडकरी ने कहा कि भारत अब जापान को पीछे छोड़कर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाज़ार बन गया है और सरकार अगले 5 वर्षों में इसे पहले स्थान पर लाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है। उन्‍होंने कहा कि सभी प्रमुख वैश्विक ऑटोमोबाइल ब्रांड अब भारत में मौजूद हैं, जिनका ध्यान केवल असेंबलिंग करने से हटकर भारत से पूरे विश्‍व में वाहन निर्यात पर केंद्रित हो गया है। उन्होंने कहा कि भारत का दोपहिया क्षेत्र ही अपने उत्पादन का 50 प्रतिशत से अधिक निर्यात करता है, जो वैश्विक स्‍तर पर देश की बढ़ती वाहन उपस्थिति दर्ज कर रहा है।केंद्रीय परिवहन मंत्री ने स्वच्छ परिवहन के मुद्दे पर इलेक्ट्रिक वाहनों, हाइड्रोजन ईंधन और वैकल्पिक ईंधनों में भारत की अग्रणी भूमिका का उल्‍लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत ने पहले ही हाइड्रोजन ट्रक लॉन्च कर दिए हैं और दस मार्गों पर पायलट परियोजनाएं चल रही हैं। उन्‍होंने कहा कि हमारा लक्ष्य हरित परिवहन में वैश्विक नेतृत्व स्‍थापित करना है।उन्होंने आगे कहा कि टाटा मोटर्स, अशोक लीलैंड, रिलायंस और इंडियन ऑयल जैसी कंपनियों के सहयोग से, सरकार ने हाइड्रोजन बुनियादी ढांचे को तीव्रता से आगे बढ़ाने के लिए 600 करोड़ रुपये का अनुदान दिया है। उन्होंने आइसोब्यूटानॉल और बायो-बिटुमेन जैसे नए ईंधन विकल्पों की प्रगति का भी उल्लेख किया, जिनका अभी सक्रिय परीक्षण चल रहा है।भारत के सड़क बुनियादी ढांचे में भी परिवर्तनकारी बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि भारत में अब विश्‍व का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क मौजूद है। इससे यात्रा समय में काफ़ी कमी आई है। उदाहरण के लिए पानीपत से दिल्ली हवाई अड्डे तक पहुंचने में अब तीन घंटे की बजाय सिर्फ़ 35 मिनट लगते हैं। उन्‍होंने कहा कि चेन्नई-बेंगलुरु एक्सप्रेसवे और 23,000 करोड़ रुपये की लागत से बेंगलुरु रिंग रोड जैसी प्रमुख परियोजनाएं सड़क सम्‍पर्क को पुन: परिभाषित करेंगी और शहरी भीड़भाड़ को काफी कम कर देंगी। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री ने कहा कि हम कचरे को संपदा में बदल रहे हैं और इस सिलसिले में गाजीपुर लैंडफिल से 80 लाख टन से अधिक मात्रा में कचरे का इस्तेमाल सड़क निर्माण में किया गया है। उन्‍होंने कहा कि इससे कूड़े के पहाड़ की ऊंचाई पहले ही सात मीटर कम हो गई है। केंद्रीय मंत्री गडकरी ने चावल के भूसे से बने बायो-बिटुमेन के सफल परीक्षणों का उल्‍लेख किया, जिसने पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन से बेहतर परिणाम मिले है और पराली (फसल अवशेष) जलाने की घटनाएं सीमित करने में सहायता मिली है।इसके अलावा, कारखाने में निर्मित कंक्रीट हिस्से के सड़क निर्माण में इस्‍तेमाल (प्रीकास्‍ट रोड़ कनस्‍ट्रक्‍शन), सुरंग निर्माण इंजीनियरिंग, हाइड्रोजन परिवहन प्रणाली और चक्रीय अर्थव्यवस्था (उत्पादों और सामग्रियों का लंबे समय तक उपयोग, दोबारा इस्तेमाल, मरम्मत और नवीनीकृत तथा पुनर्चक्रण) समाधानों सहित प्रमुख नवाचार क्षेत्रों में वैश्विक साझेदारी का भी आह्वान किया। उत्तराखंड सरकार ने साल 2027 तक सभी डीजल आधारित और पुरानी तकनीक वाले शहरी सार्वजनिक परिवहन वाहनों को चलन से बाहर करने का निर्णय लिया है. जिसके तहत परिवहन विभाग की ओर से तैयार की गई ‘उत्तराखंड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति 2024’ को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है. इसके बाद 15 मार्च को परिवहन सचिव ने इसे लागू करने को लेकर शासनादेश जारी कर दिया है. ऐसे में ये नीति पहले चरण के तहत देहरादून शहर में लागू हो गई है. अभी फिलहाल यह नीति अगले एक साल के लिए लागू की गई है. ऐसे में राज्य स्तरीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति के निर्णय पर समय सीमा बढ़ाया जा सकता है.इस नीति के तहत, संचालन के लिए अनुपयुक्त और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले वाहनों को चरणबद्ध तरीके से बदलने या फिर उच्चीकृत करने का काम किया जायेगा. नीति के जरिए उत्तराखंड शासन ने पुरानी डीजल चालित बसों और विक्रम को बाहर करते हुए सीएनजी, इलेक्ट्रिक प्रौद्योगिकी और अन्य वैकल्पिक ईंधन आधारित वाहनों को लाने के लिए अगले एक साल तक पूंजीगत अनुदान देने को लेकर इस योजना लागू किया है. इस योजना के तहत, सीमित संख्या में शहरी परिवहन संचालकों को ‘पहले आओ पहले पाओ, के आधार पर एकमुश्त पूंजीगत अनुदान के साथ पुरानी डीज़ल चालित बसों और विक्रम को स्वच्छ ईंधन आधारित वाहनों से बदलने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा उत्तराखंड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति को बेहतर ढंग से लागू करने और निगरानी के लिए राज्य स्तरीय उच्च अधिकार प्राप्त समिति और एक कार्यकारी समिति का गठन किया गया है. राज्य स्तरीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति में मुख्य सचिव को अध्यक्ष, परिवहन प्रमुख सचिव/सचिव को संयोजक, वित्त प्रमुख सचिव/सचिव को सदस्य, शहरी विकास प्रमुख सचिव/सचिव को सदस्य, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को सदस्य, परिवहन आयुक्त/अपर/संयुक्त/उप परिवहन को सदस्य नामित किया है. अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पालन करने के लिए मानकों और प्रमाणपत्रों के अनुसार नीति तैयार करना इस समिति का काम होगा.स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति को बेहतर ढंग से लागू करने के लिए एक कार्यकारी समिति का गठन किया गया है. जिसमें परिवहन आयुक्त को अध्यक्ष, वित्त विभाग के अपर सचिव को सदस्य, शहरी विकास के निदेशक को सदस्य, अपर/संयुक्त/उप परिवहन आयुक्त को संयोजक और देहरादून सम्भागीय परिवहन अधिकारी (प्रशासन) को सदस्य नामित किया गया है. इस कार्यकारी समिति का काम भारत सरकार के मानकों और प्रमाणन मानदंडों के अनुसार नीति लागू करना, स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति का कार्यान्वयन करना, स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति के क्रियान्वयन के दौरान प्रकाश में आने वाली कठिनाईयों के समाधान के लिए प्रस्ताव तैयार करना, स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति के तहत पूंजीगत अनुदान की समय पर स्वीकृति और वितरण होगा, उत्तराखंड स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति के तहत आवेदन प्रक्रिया और पूंजीगत अनुदान के वितरण को ऑनलाईन पोर्टल तैयार करना है.उत्तराखंड के लिए स्वच्छ गतिशीलता परिवर्तन नीति के तहत प्रस्तावित पूंजीगत अनुदान को परिवहन विभाग द्वारा वित्त पोषित किया जायेगा. नीति के तहत दिए जाने वाले तमाम प्रोत्साहनों के लिए धन विभिन्न अनुमन्य स्रोतों से प्राप्त किया जाएगा. साथ ही एक गैर व्यपगत फंड के रूप में ‘उत्तराखंड क्लीन मोबिलिटी ट्रांजिशन फंड के नाम से एक एस्क्रो खाते में जमा किया जायेगा. जिसका उपयोग प्रोत्साहन राशि वितरित करने के लिए किया जायेगा. ग्रीन सैस और ग्रीन एंट्री सैस को उत्तराखंड क्लीन मोबिलिटी ट्रांजिशन फंड में जमा किया जायेगा. इस नीति के तहत पूंजीगत अनुदान का भुगतान पहले ग्रीन सैस / ग्रीन एंट्री सेस एकत्र कर किया जायेगा.
इस नीति को पहले चरण के तहत देहरादून शहर में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया है. इसके बाद राज्य स्तरीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति की अनुमति के बाद चरणबद्ध तरीके से अन्य शहरों में भी लागू किया जा सकता है. साल 2027 तक उत्तराखंड के सिटी ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क से सभी पुराने डीज़ल चालित और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को सीएनजी या फिर अन्य स्वच्छ ईंधन आधारित वाहनों से बदलने का लक्ष्य रखा गया है. इस नीति के तहत प्रोत्साहन राशि प्राप्त करने के लिए वाहन संचालकों की ओर से उत्तराखंड राज्य से ही वाहन खरीदना अनिवार्य होगा. उत्तराखंड राज्य में वाहन खरीदने और पंजीकरण के बाद ही संचालकों को पूंजीगत अनुदान दी जायेगी. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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