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समय के साथ उधड़ने लगी हथकरघे से बुनी विरासत

09/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के शानदार और रंग-बिरंगी शिल्प कलाओं के साथ उत्तराखंड की घाटियों की दिलकश ख़ूबसूरती और भी ज़्यादा निखर उठती है। बुनाई, पहाड़ के उन पारंपरिक शिल्पों में से एक है जो यहाँ के पहाड़ी लोगों के जीवन और उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ी हुई है। मुख्य रूप से अपने ऊनी कपड़ों के लिए मशहूर, उत्तराखंड की हिमालयी बुनाई परंपरा में सुंदर सूती और रेशमी वस्त्र भी तैयार किए जाते हैं। लंबे समय से उत्तराखंड के बुनाई उद्योग पर भोटिया हिमालयी बुनकर समुदाय का दबदबा रहा है। भोटिया समुदाय के अलावा, इस क्षेत्र में रोमपा और कोली जैसे अन्य बुनकर समुदाय भी सक्रिय हैं। यह उद्योग विभिन्न प्रकार के वस्त्र उत्पाद बनाता है। इनमें रोज़मर्रा की चीज़ें जैसे मोज़े, टोपी, स्कार्फ, स्वेटर, मफलर आदि से लेकर शॉल या कालीन जैसे विशेष उत्पाद भी शामिल हैं।हिमालय की शांति और शालीनता, पारंपरिक वस्त्र डिज़ाइनों में बखूबी झलकती है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही हैं। कभी-कभी, उत्तराखंड के पारंपरिक बुनकरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रूपांकनों में पड़ोसी तिब्बत, नेपाल और चीन का दिलचस्प प्रभाव भी दिखाई देता है। लेकिन, इन प्रभावों के बावजूद, उत्तराखंड के पारंपरिक वस्त्र हमेशा अपनी एक अनूठी जातीय पहचान को बनाए रखते हैं।उत्तराखंड की हिमालयी जलवायु और स्थानीय भेड़ पालन की प्रथाओं ने इस क्षेत्र में ऊनी उद्योग के स्वाभाविक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यहाँ की बुनकर अधिकतर पहाड़ी जनजातियों की ग्रामीण महिलाएं हैं। वे आश्चर्यजनक रूप से साधारण औज़ारों और तकनीकों की मदद से हाथ से बुने खूबसूरत उत्पाद तैयार करती हैं। यह देखना वाकई अद्भुत है कि कैसे इन हिमालयी गांवों के लोगों ने अपनी सदियों पुरानी कुछ शिल्प तकनीकों और विधियों को सफलतापूर्वक जीवित रखा है।हर साल, घुमंतू भोटिया बुनकर सर्दियों के महीने डुंडा में अपने कपड़े बुनने में बिताते हैं। गर्मियों में वे इन कपड़ों को उत्तराखंड के विभिन्न मौसमी मेलों और पर्यटन स्थलों पर बेचते हैं, या हरसिल में खेतों की कटाई करते हैं। उत्तरकाशी जिले के डुंडा में, वे चरखे से काते गए ऊन का उपयोग करके अपने साधारण खड़े या गड्ढे वाले करघों पर शानदार पारंपरिक डिज़ाइन बुनते हैं। परंपरागत रूप से, भोटिया बुनकर हरसिल के चरागाहों में ऊन के लिए अपनी भेड़ें पालते हैं। सर्दियों में, जब भेड़ें हृष्ट-पुष्ट हो जाती हैं और उनके बाल पूरी तरह उग आते हैं, तो भोटिया लोग अपनी बुनाई का काम शुरू करने के लिए डुंडा आ जाते हैं। उत्तराखंड में डुंडा बुनाई क्लस्टर भोटिया बुनकरों द्वारा बनाए गए कालीनों और पश्मीना शॉलों के लिए मशहूर है।मुनस्यारी के दरीचेऔर पश्मीना शॉल भी बहुत प्रशंसित हैं। डुंडा की तरह, यह भी पारंपरिक भोटिया बुनाई का एक और महत्वपूर्ण केंद्र है। मुनस्यारी में दुनिया के कुछ बेहतरीन कश्मीरी ऊन का उत्पादन होता है। इस छोटे से उत्तराखंडी कस्बे के भोटिया बुनकरों द्वारा बनाया गया ‘दन’ (एक प्रकार की दरी) और ‘थुलमा’ (एक अनोखा ओढ़ना) अपनी अद्भुत सुंदरता के लिए विशेष प्रशंसा के पात्र हैं।कौसानी की शॉल फैक्ट्री में भी स्थानीय बुनकरों द्वारा शानदार पश्मीना शॉल तैयार किए जाते हैं। कौसानी के शॉल और स्टोल दुनिया भर के पर्यटकों और शिल्प-प्रेमियों के बीच बहुत प्रसिद्ध हो चुके हैं। स्थानीय ग्रामीण कारीगर इन वस्त्रों को बनाने के लिए अपने पारंपरिक लकड़ी के हथकरघों पर काफी समय और मेहनत लगाते हैं। ये शॉल बेहतरीन अंगोरा खरगोश के ऊन से बने होते हैं और इनमें साधारण रंगीन पैटर्न से लेकर उत्कृष्ट कढ़ाई वाले डिज़ाइन्स तक, अनेक किस्में देखने को मिलती हैं।उत्तराखंड की बुनाई परंपरा का ऐतिहासिक विकास, सदियों पुरानी कारीगरी और सांस्कृतिक विरासत का जीता-जागता प्रमाण है। यहाँ पर बुनाई का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है। तब शुरुआती निवासियों ने स्थानीय प्राकृतिक रेशों को कपड़ों और अन्य पारंपरिक उत्सवों-अनुष्ठानों के लिए काफी उपयोगी पाया था। समय के साथ, उत्तराखंड पड़ोसी क्षेत्रों की समृद्ध बुनाई तकनीकों और कलात्मक प्रभावों का एक संगम स्थल बन गया। मध्यकाल में, स्थानीय शासकों और शाही दरबारों से मिले भरपूर संरक्षण के तहत, वस्त्र उद्योग अपने चरम पर पहुंचा। इससे बुनाई की कला और भी निखर गई। उत्तराखंड के अद्वितीय पारंपरिक मोटिफ़, पैटर्न और डिज़ाइन उभरकर सामने आए। ये डिज़ाइनें इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और आम लोगों की कलात्मक संवेदनाओं की गहरी छाप छोड़ती थीं।औपनिवेशिक काल ने इस क्षेत्र में और भी बदलाव लाए। ब्रिटिश प्रशासकों ने आधुनिक मशीनरी और उत्पादन के नए तरीके पेश किए। साथ ही, उन्होंने बुनाई के लिए कार्यशालाएं और प्रशिक्षण स्कूल भी शुरू किए। स्वतंत्रता के बाद के दौर में, उत्तराखंड की वस्त्र परंपरा ने निरंतरता के साथ-साथ बदलाव भी देखे हैं। पारंपरिक बुनाई की प्रथाएं आधुनिकीकरण और आर्थिक विकास की मांगों और दबावों के साथ खुद को ढाल रही हैं! बाजार में मशीन से तैयार कपड़ों और बड़े ब्राडों की भरमार के बावजूद हथकरघा से बने उत्पाद आज भी अलग पहचान बनाए हुए हैं। बेहतर गुणवत्ता, प्राकृतिक रेशों, आरामदायक और लंबे समय तक टिकाऊ होने के कारण खादी एवं हैंडलूम उत्पादों की मांग बनी हुई है। यही वजह है कि आधुनिक दौर में भी बड़ी संख्या में ग्राहक हथकरघा से तैयार उत्पादों को पसंद कर रहे हैं। हर वर्ष सात अगस्त को मनाए जाने वाले राष्ट्रीय हथकरघा दिवस इसी परंपरा और बुनकरों के योगदान को सम्मान देने का अवसर है। खादी ग्रामोद्योग से जुड़ी संस्थाओं द्वारा तैयार उत्पादों की मांग पूरे वर्ष बनी रहती है। खासकर खादी की बेडशीट, रजाई, कंबल, तौलिया, कॉटन कपड़ा, कुर्ता-पायजामा, साड़ी, दुपट्टा और गमछा खरीदने के लिए लोग गांधी आश्रम पहुंचते हैं। ये उत्पाद गर्मियों में आरामदायक और लंबे समय तक उपयोगी रहते हैं। ग्राहकों का रुझान अब केवल कपड़ों तक सीमित नहीं है। घरों में उपयोग होने वाली खादी की बेडशीट, कंबल, रजाई और तौलियों की भी अच्छी मांग रहती है। उनका कहना है कि टिकाऊपन, बेहतर फिनिश और पारंपरिक डिजाइन के कारण लोग आज भी हथकरघा उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं। सरकार से पर्याप्त तरल पूंजी नहीं मिलने के कारण संस्थान कच्चा माल खरीदने में सक्षम नहीं है। परिणामस्वरूप उत्पादन लगभग ठप है। दूसरी ओर बुनकरों और कत्तिनों की मजदूरी भी इतनी कम है कि नई पीढ़ी इस पेशे से जुड़ना ही नहीं चाहती।  लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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