‘डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जून का महीना विदाई पर है, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ अब भी मानसून की पहली जोरदार बारिश का इंतजार कर रहे हैं. आमतौर पर जून के तीसरे हफ्ते तक प्रदेश में मानसून की सक्रिय मौजूदगी महसूस होने लगती थी, लेकिन इस बार मौसम का मिजाज कुछ अलग है. इस बार तय समय पर मानसून नहीं पहुंच पाया है.पहाड़ों की वादियां जो हर साल जून में बादलों की गड़गड़ाहट और झमाझम बारिश की गवाह बनती थी, वो इस बार सूने आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठी हैं. खेतों में नमी की कमी महसूस होने लगी है, तो जंगलों में भी बारिश का इंतजार बढ़ गया है.मौसम विभाग का कहना है कि उत्तराखंड में मानसून के आगमन में इस बार सामान्य से 7 से 10 दिन तक की देरी हो सकती है. मौसम विभाग की मानें तो बंगाल की खाड़ी में कमजोर सिस्टम मानसून की बौछार में देरी की वजह बना है. मौसम वैज्ञानिक ने इसकी वजह बताई है. “मानसून की धीमी रफ्तार के पीछे सबसे बड़ी वजह बंगाल की खाड़ी में अनुकूल मौसमी तंत्र का विकसित न होना है. सामान्य परिस्थितियों में कम दबाव का क्षेत्र बनने से मानसूनी हवाओं को गति मिलती है और वे तेजी से उत्तर भारत की ओर बढ़ती हैं. इस बार ऐसा सिस्टम समय पर विकसित नहीं हो सका, जिससे मानसून की गति धीमी पड़ गईमौसम वैज्ञानिक की मानें तो अभी उत्तराखंड में मानसून की बारिश के लिए इंतजार करना पड़ सकता है.”उत्तराखंड में मानसून आमतौर पर 25 जून के आसपास पूरी तरह सक्रिय हो जाता है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इसके आगमन में कुछ और दिनों का इंतजार करना पड़ सकता है पिछले कुछ सालों का रिकॉर्ड देखें तो जून का महीना उत्तराखंड के लिए कई बार आपदा लेकर आया है. केदारनाथ से लेकर चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी तक कई जिलों में जून के दौरान ही बादल फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं. वैसे ये हाल हर साल जून में होता ही है. चारधाम यात्रा के दौरान भी अक्सर बारिश और भूस्खलन बड़ी चुनौती बनते रहे हैं, लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आ रही है. पर्वतीय क्षेत्रों में कहीं-कहीं हल्की बारिश हुई है, लेकिन वो मानसूनी बारिश जैसी नहीं रही. नदियों और गदेरों का जलस्तर सामान्य बना हुआ है. कई इलाकों में लोग अच्छी बारिश के इंतजार में हैं. मानसून भले ही देरी से पहुंच रहा हो, लेकिन प्री-मानसून की हल्की बारिश और बादलों की आवाजाही ने लोगों को गर्मी से काफी हद तक राहत दी है. प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में तापमान सामान्य के आसपास बना हुआ है.देहरादून में अधिकतम तापमान 34.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से केवल एक डिग्री ज्यादा रहा. इससे पहले तापमान 36 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया था. बादलों की मौजूदगी और बीच-बीच में होने वाली हल्की बारिश ने मैदानी इलाकों में भी मौसम को अपेक्षाकृत सुहावना बनाए रखा है.यही वजह है कि इस बार गर्मी ने पिछले सालों जैसी तीव्रता नहीं दिखाई, लेकिन हरिद्वार के हालात बिल्कुल उलट हैं. हरिद्वार, रुड़की में मौजूदा समय में 40 डिग्री सेल्सियस तक तापमान जा रहा है. अगर बारिश होती तो तापमान में गिरावट देखने को मिलती. उत्तराखंड में मानसून केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि खेती, पेयजल, पर्यटन और चारधाम यात्रा से जुड़ी गतिविधियों का भी आधार है. ऐसे में मानसून की देरी जहां किसानों की चिंता बढ़ा रही है, तो वहीं लोगों को ये राहत भी है कि फिलहाल भारी बारिश से होने वाली संभावित तबाही का खतरा टला हुआ है. मानसून देर से जरूर आ रहा है, लेकिन इसके कमजोर रहने की संभावना नहीं है. ऐसे में प्रदेश को जल्द ही बादलों की वो सौगात मिल सकती है, जिसका इंतजार पहाड़ों से लेकर मैदानों तक हर कोई कर रहा है. भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून देश की कृषि और जल सुरक्षा की असली जीवन रेखा है. लेकिन साल 2026 के सीजन की शुरुआत में ही इसके कदम बुरी तरह लड़खड़ा गए हैं. मानसून की इस धीमी रफ्तार ने मौसम विज्ञानियों, किसानों और नीति निर्माताओं (की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. मानसून की इस कमजोर शुरुआत की तुलना भारत के सबसे मुश्किल वर्षों से की जा रही है. विशेषज्ञ इसकी तुलना साल 1987, 2009 और 2015 के हालातों से कर रहे हैं. भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इस सीजन में ‘दीर्घकालिक औसत’) के लगभग 90% बारिश होने का पूर्वानुमान जताया है.यदि मानसून इसी अनुमान के आसपास समाप्त होता है, तो 2026 का मानसून साल 2015 के बाद से भारत का सबसे सूखा साल बन जाएगा. इतना ही नहीं, यह पिछले एक दशक से अधिक समय में देश का सबसे कमजोर मानसून भी साबित होगा. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे ज्यादा मौसम पर पड़ता है। गर्म मौसम होने से वर्षा का चक्र प्रभावित होता है और इससे बाढ़ या सूखे का खतरा पैदा हो जाता है। इसके अलावा ध्रुवीय ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र के स्तर में भी वृद्धि हो जाती है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे ज्यादा मौसम पर पड़ता है। गर्म मौसम होने से वर्षा का चक्र प्रभावित होता है और इससे बाढ़ या सूखे का खतरा पैदा हो जाता है। इसके अलावा ध्रुवीय ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र के स्तर में भी वृद्धि हो जाती है। पहाड़ों और घाटियों में निर्मित और निर्माणाधीन बड़े बांध, नदियों के जलस्तर में बदलाव, अंधाधुंध खनन, जंगलों की आग, सूखा, बाढ़, बेहिसाब औद्योगिकीकरण, शहरी क्षेत्रों में लगातार चल रहा निर्माण, कम होती खेती की जमीनें, सड़कों पर बढ़ती वाहनों की भीड़ और बढ़ती जनसंख्या मौसम में बदलाव का सबसे बड़ा कारण है। नदियां, तालाब, पोखरों पर आबादी बढ़ रही है। भूजल स्तर दिन-प्रतिदिन नीचे जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार भूमिगत जलस्तर में इस साल तक 54 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक जून में 90 रिजर्वायरों में 20 फीसदी से भी कम पानी पाया गया है।भारत के पास भूमि का ढाई फीसदी और दुनिया भर के पानी का चार फीसदी हिस्सा है, जबकि दुनिया की 17 फीसदी आबादी यहां रहती है। इसलिए चुनौतियां आने वाले दिनों में बढ़ने वाली हैं। जलवायु परिवर्तन पर बनी संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी ने कहा है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग को नहीं रोका गया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। संस्थान की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर के देशों को इस पर तुरंत लगाम लगाने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं होता है तो 2030 तक धरती के कई हिस्से रहने लायक नहीं होंगे। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.










