डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चन्द्र सिंह राही उन्हें ‘उत्तराखंड के लोक संगीत का भीष्म पितामह’ कहा जाता है। वे केवल लोकगायक ही नहीं, बल्कि कवि, गीतकार, संगीतकार, लोककथाकार, शोधकर्ता और लोक संस्कृति के संरक्षणकर्ता भी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन उत्तराखंड की लोक धरोहर को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में समर्पित कर दिया।
चन्द्र सिंह राही (मूल नाम चन्द्र सिंह नेगी) का जन्म 28 मार्च 1942 को गिंवाली (गिवाली) गांव, पौड़ी गढ़वाल में हुआ। संगीत उन्हें विरासत में अपने पिता दिलबर सिंह नेगी से मिला, जो स्वयं पारंपरिक लोकगायक थे। बचपन से ही उन्होंने ढोल, दमाऊं, हुड़का जैसे लोक वाद्य सीख लिए थे।
राही जी ने अपने जीवन में 2,500 से अधिक पारंपरिक लोकगीतों का संग्रह, संरक्षण और दस्तावेजीकरण किया। उन्होंने 500 से अधिक गढ़वाली और कुमाऊँनी गीतों को अपनी आवाज़ दी। उनके प्रयासों से कई विलुप्त होती लोक विधाएं फिर से लोगों तक पहुंचीं।
वे आकाशवाणी और बाद में दूरदर्शन पर गढ़वाली लोकगीतों को पहचान दिलाने वाले शुरुआती कलाकारों में शामिल थे। उनकी आवाज़ ने पहली बार गढ़वाली संगीत को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
राही जी केवल गीत नहीं गाते थे, बल्कि उत्तराखंड की भाषा, लोक परंपराओं और संस्कृति के संरक्षण के लिए लगातार आवाज़ उठाते रहे। उन्होंने आधुनिकता के बीच लोक संगीत की मौलिकता बनाए रखने पर हमेशा ज़ोर दिया और युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया।
उनके कई गीत आज भी उत्तराखंड के हर घर में गूंजते हैं, जिनमें—
फ्योंलड़िया
चैता की चैतवाली
फ्वा बगारे
सारग तारा
भना है रंगीली भना
सौली घुरा घुर जैसे गीत आज भी बेहद लोकप्रिय हैं।
लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी सहित उत्तराखंड के अनेक कलाकारों ने चन्द्र सिंह राही को अपनी प्रेरणा बताया है। उनके निधन (10 जनवरी 2016) के बाद भी उनकी संगीत परंपरा ‘राही घराना’ के माध्यम से आगे बढ़ रही है और हर वर्ष उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
चन्द्र सिंह राही केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति की जीवित विरासत थे। उनकी आवाज़ आने वाली पीढ़ियों को हमेशा अपनी मिट्टी, भाषा और संस्कृति से जोड़े रखेगी।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











