डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की आज पुण्यतिथि है। हरियाणा के अम्बाला कैंट में 14 फरवरी 1952 को जन्मीं सुषमा स्वराज का निधन हार्ट अटैक से हुआ था। उन्होंने 67 साल की उम्र में 6 अगस्त 2019 को इस दुनिया से अलविदा कह दिया। बीजेपी की सबसे कद्दावर नेताओं में एक सुषमा स्वराज को आज भी देश याद कर रहा है। आइये जानते हैं कैसा रहा सुषमा स्वराज का विद्यार्थी परिषद के नेता से विदेश मंत्री बनने तक का सफर… सुषमा स्वराज ने चंडीगढ़ से कानून की डिग्री ली थी। अपने पिता की तरह वे भी आपराधिक मामलों की वकील थी और दिल्ली हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती थी। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील स्वराज कौशल से उन्होंने शादी की थी। सुषमा स्वराज भाजपा की एकमात्र नेता थीं, जिन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत, दोनों क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। उन्हें एक प्रखर वक्ता के रूप में जाना जाता था। यही वजह थी कि जब सुषमा स्वराज संसद में भाषण देती तो सत्ता से लेकर विपक्ष तक सब उन्हें ध्यान से सुनते थे। 25 साल की उम्र में वह कैबिनेट मंत्री बन गई थीं। 67 साल की उम्र में (6 अगस्त 2019) को उनका निधन हो गया था।भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की आज पुण्यतिथि है। हरियाणा के अम्बाला कैंट में 14 फरवरी 1952 को जन्मीं सुषमा स्वराज का निधन हार्ट अटैक से हुआ था। उन्होंने 67 साल की उम्र में 6 अगस्त 2019 को इस दुनिया से अलविदा कह दिया। बीजेपी की सबसे कद्दावर नेताओं में एक सुषमा स्वराज को आज भी देश याद कर रहा है। आइये जानते हैं कैसा रहा सुषमा स्वराज का विद्यार्थी परिषद के नेता से विदेश मंत्री बनने तक का सफर… सुषमा स्वराज ने चंडीगढ़ से कानून की डिग्री ली थी। अपने पिता की तरह वे भी आपराधिक मामलों की वकील थी और दिल्ली हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती थी। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील स्वराज कौशल से उन्होंने शादी की थी। सुषमा स्वराज भाजपा की एकमात्र नेता थीं, जिन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत, दोनों क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। उन्हें एक प्रखर वक्ता के रूप में जाना जाता था। यही वजह थी कि जब सुषमा स्वराज संसद में भाषण देती तो सत्ता से लेकर विपक्ष तक सब उन्हें ध्यान से सुनते थे। 25 साल की उम्र में वह कैबिनेट मंत्री बन गई थीं। 67 साल की उम्र में (6 अगस्त 2019) को उनका निधन हो गया था।भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की आज पुण्यतिथि है। हरियाणा के अम्बाला कैंट में 14 फरवरी 1952 को जन्मीं सुषमा स्वराज का निधन हार्ट अटैक से हुआ था। उन्होंने 67 साल की उम्र में 6 अगस्त 2019 को इस दुनिया से अलविदा कह दिया। बीजेपी की सबसे कद्दावर नेताओं में एक सुषमा स्वराज को आज भी देश याद कर रहा है। आइये जानते हैं कैसा रहा सुषमा स्वराज का विद्यार्थी परिषद के नेता से विदेश मंत्री बनने तक का सफर. सुषमा स्वराज ने चंडीगढ़ से कानून की डिग्री ली थी। अपने पिता की तरह वे भी आपराधिक मामलों की वकील थी और दिल्ली हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती थी। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील स्वराज कौशल से उन्होंने शादी की थी। सुषमा स्वराज भाजपा की एकमात्र नेता थीं, जिन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत, दोनों क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। उन्हें एक प्रखर वक्ता के रूप में जाना जाता था। यही वजह थी कि जब सुषमा स्वराज संसद में भाषण देती तो सत्ता से लेकर विपक्ष तक सब उन्हें ध्यान से सुनते थे। 25 साल की उम्र में वह कैबिनेट मंत्री बन गई थीं। 67 साल की उम्र में (6 अगस्त 2019) को उनका निधन हो गया था। भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की आज पुण्यतिथि है। हरियाणा के अम्बाला कैंट में 14 फरवरी 1952 को जन्मीं सुषमा स्वराज का निधन हार्ट अटैक से हुआ था। उन्होंने 67 साल की उम्र में 6 अगस्त 2019 को इस दुनिया से अलविदा कह दिया। बीजेपी की सबसे कद्दावर नेताओं में एक सुषमा स्वराज को आज भी देश याद कर रहा है। आइये जानते हैं कैसा रहा सुषमा स्वराज का विद्यार्थी परिषद के नेता से विदेश मंत्री बनने तक का सफर… सुषमा स्वराज ने चंडीगढ़ से कानून की डिग्री ली थी। अपने पिता की तरह वे भी आपराधिक मामलों की वकील थी और दिल्ली हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती थी। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील स्वराज कौशल से उन्होंने शादी की थी। सुषमा स्वराज भाजपा की एकमात्र नेता थीं, जिन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत, दोनों क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। उन्हें एक प्रखर वक्ता के रूप में जाना जाता था। यही वजह थी कि जब सुषमा स्वराज संसद में भाषण देती तो सत्ता से लेकर विपक्ष तक सब उन्हें ध्यान से सुनते थे। 25 साल की उम्र में वह कैबिनेट मंत्री बन गई थीं। 67 साल की उम्र में (6 अगस्त 2019) को उनका निधन हो गया था। सुषमा स्वराज ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ की थी। सुषमा स्वराज 7 बार सांसद, 3 बार विधायक और 15वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहीं। 25 साल की उम्र में साल 1977 में वह भारत की सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री बन गई थीं। चौधरी देवीलाल की कैबिनेट में उन्हें मंत्री बनाया गया था। 27 साल की उम्र में उन्हें हरियाणा राज्य में भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख बना दिया गया। वह 1987 से 1990 तक हरियाणा की शिक्षा मंत्री भी रहीं।सुषमा स्वराज ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ की थी। सुषमा स्वराज 7 बार सांसद, 3 बार विधायक और 15वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहीं। 25 साल की उम्र में साल 1977 में वह भारत की सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री बन गई थीं। चौधरी देवीलाल की कैबिनेट में उन्हें मंत्री बनाया गया था। 27 साल की उम्र में उन्हें हरियाणा राज्य में भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख बना दिया गया। वह 1987 से 1990 तक हरियाणा की शिक्षा मंत्री भी रहीं। सुषमा स्वराज की राष्ट्रीय राजनीति में एंट्री 1990 में हुई जब वह राज्यसभा सांसद चुनी गई थी। उन्होंने अपना 6 साल का कार्यकाल पूरा किया और फिर 1996 में वे 11वीं लोकसभा के लिए चुनी गई। उन्हें अटलबिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया था। इसके बाद 12वीं लोकसभा में वह दक्षिण दिल्ली से चुनी गईं थी। केंद्रीय कैबिनेट में उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रालय के अलावा दूरसंचार मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था। हालांकि उन्होंने 1998 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था और उन्हें दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया गया था। विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद दोबारा वह केंद्रीय राजनीति में लौट गई। कर्नाटक के बेल्लारी से 1999 में उन्होंने सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन वह 7 प्रतिशत वोटों से हार गई। सिर्फ 12 दिन के चुनाव प्रचार में उन्हें 3 लाख 58 हजार वोट मिले थे। सुषमा स्वराज 2000 में फिर से वह राज्यसभा सांसद चुनी गई और उन्हें एक बार फिर सूचना प्रसारण मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। मई 2004 तक उन्होंने सरकार के रहने तक ये पद संभाला। 2009 में भी मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद चुनी गई थी। इस दौरान वह राज्यसभा में प्रतिपक्ष की उपनेता थी। बाद में विदिशा से लोकसभा के लिए चुनी गईं और उन्हें लालकृष्ण आडवाणी के स्थान पर नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। सुषमा स्वराज को 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में विदेश मंत्री बनाया गया था। पीएम मोदी की विदेश नीति को लागू कराने में उनकी अहम भूमिका रही। संयुक्त राष्ट्र में उनके भाषण की काफी तारीफ हुई थी, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को जमकर खरी-खरी सुनाई थी। वह दुनिया भर में मदद देने के लिए जानी जाती थी। विदेशों में रह रहे भारतीयों को जब कभी भी परेशानी हुई तब-तब सुषमा स्वराज ने मदद का हाथ बढ़ाया। सुषमा स्वराज बेहतरीन वक्ता थीं और अपने भाषणों में ऐतिहासिक प्रसंग, कविताओं और व्यंग्य का जबरदस्त समावेश करती थीं। 1996 में जब वाजपेयी सरकार सिर्फ 13 दिन बाद गिर गई तो सदन में सुषमा ने बेहद प्रभावशाली भाषण दिया था। उत्तराखंड में उन्हें ऋषिकेश एम्स की सौगात देने के लिए याद किया जाएगा। सुषमा स्वराज उत्तराखंड में भी अत्यंत लोकप्रिय रहीं। लोकसभा चुनाव हों या फिर विधानसभा चुनाव। भाजपा के स्टार प्रचारकों में उनकी सबसे ज्यादा डिमांड रहती थी। उत्तराखंड के लोगों को उनका सादगी भरा व्यक्तित्व तो भाता ही था, साथ ही ओजस्वी वक्ता के रूप में भी लोग उन्हें सम्मान देते थे।उत्तराखंड से सुषमा स्वराज का खासा नजदीकी रिश्ता भी रहा। राज्य गठन के वक्त जब उत्तराखंड को राज्यसभा की तीन सीटें मिलीं, उनमे से एक सीट का प्रतिनिधित्व उन्होंने किया। स्व अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहते हुए उत्तराखंड का राज्यसभा में नुमाइंदगी कर रही थीं। इस भाषण में उन्होंने रामायण और महाभारत के प्रसंगों को याद करते हुए सरकार गिरानेवाली पार्टियों को जमकर सुनाया था। इसी भाषण में उन्होंने कहा था कि आज भारत में रामराज्य की नींव पड़ गई है।
सुषमा स्वराज ने बतौर विदेश मंत्री ट्विटर का प्रयोग हर वक्त लोगों के लिए उपलब्ध रहने के लिए भी किया था। विदेश में फंसे भारतीयों की मदद सिर्फ एक ट्विटर के जरिए करती थीं। सुषमा के इस व्यवहार ने विरोधियों को भी उनका मुरीद बना दिया था। सुषमा स्वराज अपनी तेज-तर्रार भाषण शैली के साथ ही आत्मीय व्यवहार के लिए भी जानी जाती थीं। धुर-विरोधी पार्टी के सांसदों को भी वह भाई कहकर बुलाती थीं। कांग्रेस के युवा सांसदों की खिंचाई करने के लिए अक्सर वह बेटा शब्द का भी प्रयोग करती थीं। सुषमा स्वराज अपनी तेज-तर्रार भाषण शैली के साथ ही आत्मीय व्यवहार के लिए भी जानी जाती थीं। धुर-विरोधी पार्टी के सांसदों को भी वह भाई कहकर बुलाती थीं। कांग्रेस के युवा सांसदों की खिंचाई करने के लिए अक्सर वह बेटा शब्द का भी प्रयोग करती थीं। बतौर सूचना प्रसारण मंत्री भी सुषमा का कार्यकाल खासा उल्लेखनीय था। फिल्म जगत को उन्होंने ही केंद्रीय मंत्री रहने के दौरान उद्योग जगत का दर्जा दिया था। उद्योग जगत का दर्जा मिलने के कारण फिल्म से जुड़े कामों के लिए भी बैंक से ऋण लेने में सक्षम हो सके। खास तौर पर उन्होंने फिल्म जगत के जूनियर कलाकार और तकनीशयनों के लिए अपनी चिंता जाहिर की थी। बतौर सूचना प्रसारण मंत्री भी सुषमा का कार्यकाल खासा उल्लेखनीय था। फिल्म जगत को उन्होंने ही केंद्रीय मंत्री रहने के दौरान उद्योग जगत का दर्जा दिया था। उद्योग जगत का दर्जा मिलने के कारण फिल्म से जुड़े कामों के लिए भी बैंक से ऋण लेने में सक्षम हो सके। खास तौर पर उन्होंने फिल्म जगत के जूनियर कलाकार और तकनीशयनों के लिए अपनी चिंता जाहिर की थी। भारतीय राजनीति की वास्तविकता है कि इसमें आने वाले लोग घुमावदार रास्ते से लोगों के जीवन में आते हैं वरना आसान रास्ता है- दिल तक पहुंचने का। हां, पर उस रास्ते पर नंगे पांव चलना पड़ता है। सुषमाजी इसी तरह नंगे पांव चलने वाली एवं लोगों के दिलों पर राज करने वाली राजनेता थीं, उनके दिलो-दिमाग में दिल्ली ही नहीं समूचे देश की जनता हर समय बसी रहती थी। काश ! सत्ता के मद, करप्शन के कद, व अहंकार के जद्द में जकड़े-अकड़े रहने वाले राजनेता उनसे एवं उनके निधन से बोधपाठ लें। निराशा, अकर्मण्यता, असफलता और उदासीनता के अंधकार को उन्होंने अपने आत्मविश्वास, साहसिकता, कर्मठता और जीवन के आशा भरे दीपों से पराजित किया। सुषमा स्वराज भाजपा की एक नारीरत्न थीं। वह भारतीय संस्कृति की प्रतीक आदर्श महिला थीं और यह भारतीय संस्कृति उनमें बसी थी। उनका सम्पूर्ण जीवन अभ्यास की प्रयोगशाला थी। उनके मन में यह बात घर कर गयी थी कि अभ्यास, प्रयोग एवं संवेदना के बिना किसी भी काम में सफलता नहीं मिलेगी। उन्होंने अभ्यास किया, दृष्टि साफ होती गयी और विवेक जाग गया। उन्होंने हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम किया, तारीफ पाने के लिए नहीं। खुद को जाहिर करने के लिए जीवन जीया, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं। उनके जीवन की कोशिश रही कि लोग उनके होने को महसूस ना करें। बल्कि उन्होंने काम इस तरह किया कि लोग तब याद करें, जब वह उनके बीच में ना हों। इस तरह उन्होंने अपने जीवन को एक नया आयाम दिया और जनता के दिलों पर अमिट छाप छोड़ते हुए निरन्तर आगे बढ़ीं। वह भारतीय राजनीति का एक अमिट आलेख हैं। सुषमा स्वराज एक ऐसा आदर्श राजनीतिक व्यक्तित्व हैं जिन्हें सेवा और सुधारवाद का अक्षय कोश कहा जा सकता है। उनका आम व्यक्ति से सीधा संपर्क रहा। यही कारण है कि आपके जीवन की दिशाएं विविध एवं बहुआयामी रही हैं। आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया। यही कारण है कि कोई भी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र आपके जीवन से अछूता रहा हो, संभव नहीं लगता। आपके जीवन की खिड़कियां राष्ट्र एवं समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रहीं। इन्हीं खुली खिड़कियों से आती ताजी हवा के झोंकों का अहसास भारत की जनता सुदीर्घ काल तक करती रहेगी।सुषमाजी को अलविदा नहीं कहा जा सकता, उन्हें खुदा हाफिज़ भी नहीं कहा जा सकता, उन्हें श्रद्धांजलि भी नहीं दी जा सकती क्योंकि ऐसे व्यक्ति मरते नहीं। वह हमें अनेक मोड़ों पर राजनीति में नैतिकता का संदेश देते रहेंगे कि घाल-मेल से अलग रहकर भी जीवन जिया जा सकता है। निडरता से, शुद्धता से, स्वाभिमान से। वे चित्रता में मित्रता की प्रतीक थीं तो गहन मानवीय चेतना की चितेरी जुझारु, निडर, साहसिक एवं प्रखर व्यक्तित्व थीं। कोटिशः नमन।। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











