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उत्तराखंड चार धाम यात्रा पर मंडराया संकट

31/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
पश्चिम एशिया में ईरान और इस्राइल के बीच बढ़ता युद्ध केवल क्षेत्रीय तनाव का विषय नहीं रह गया है। इसके प्रभाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और आम जनजीवन तक स्पष्ट रूप से महसूस किए जा रहे हैं। इस संघर्ष की आंच सुदूर हिमालय स्थित करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था के केंद्र, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री तक पहुंच रही है। आगामी 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया से शुरू होने जा रही इस वर्ष की चारधाम यात्रा न केवल महंगी होने जा रही है, अपितु इस संघर्ष का असर विदेशी श्रद्धालुओं के आगमन पर भी पड़ने की आशंका है।इस साल की चारधाम यात्रा के लिए गंगोत्री एवं यमुनोत्री के कपाट अक्षय तृतीया पर 19 अप्रैल को, केदारनाथ के 22 अप्रैल को तथा बद्रीनाथ के कपाट 23 अप्रैल को खुल रहे हैं। इसलिये ऋषिकेश में यात्रा का उद्घाटन 14-15 अप्रैल को होने की संभावना है। चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हर वर्ष काफी संख्या में श्रद्धालु देश-विदेश से इन पवित्र धामों के दर्शन के लिए आते हैं। इस बार युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल आया है, जिसका सीधा असर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश पर पड़ रहा है। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि का असर पहाड़ी क्षेत्रों तक भी कई गुना बढ़कर पहुंचता है। इसलिये चारधाम यात्रा की पूरी लागत संरचना प्रभावित होना स्वाभाविक है। मिडिल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी तनाव का असर अब भारत में भी दिखाई देने लगा है। इस अंतरराष्ट्रीय स्थिति का सीधा प्रभाव एलपीजी गैस की सप्लाई पर पड़ रहा है, जिससे उत्तराखंड की आगामी चार धाम यात्रा 2026 को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। यात्रा शुरू होने में अब महज कुछ ही दिन शेष हैं, लेकिन गैस और ईंधन की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित हो रही है। सरकार ने घरेलू सिलेंडरों की सप्लाई को बनाए रखने के लिए व्यवस्था जरूर की है, लेकिन कमर्शियल गैस सिलेंडरों की उपलब्धता पहले जैसी नहीं रह गई है। इसका असर होटल, ढाबा, रेस्टोरेंट और धर्मशालाओं पर साफ दिखाई दे रहा है। यदि यह स्थिति बनी रही तो यात्रा के दौरान खाने-पीने की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। चार धाम यात्रा 2026 की शुरुआत जल्द होने जा रही है। 19 अप्रैल को गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलेंगे, 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम और 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम व हेमकुंड साहिब के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे। ऐसे में लाखों श्रद्धालुओं के आगमन की तैयारी जोरों पर है, लेकिन संसाधनों की उपलब्धता को लेकर चिंता बनी हुई है।इस वर्ष चार धाम यात्रा के दौरान एलपीजी सिलेंडरों की मांग एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। पिछले साल लगभग 16.4 लाख सिलेंडरों का उपयोग हुआ था, जबकि इस बार करीब 20 लाख सिलेंडरों की जरूरत का अनुमान लगाया गया है। यह बढ़ती मांग सरकार के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी बन गई है, जिसे समय रहते पूरा करना आवश्यक है। चार धाम यात्रा 2026 में इस बार रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद जताई जा रही है। इससे गैस, ईंधन और अन्य संसाधनों की मांग और बढ़ेगी। होटल, धर्मशाला और भोजनालयों में भीड़ बढ़ने के साथ ही गैस की खपत कई गुना बढ़ सकती है।एलपीजी संकट के साथ-साथ ट्रांसपोर्टरों को पेट्रोल और डीजल की संभावित कमी की भी चिंता सता रही है। फिलहाल देश में ईंधन की स्थिति सामान्य है, लेकिन यदि मिडिल ईस्ट में युद्ध लंबा खिंचता है तो तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसका असर चार धाम यात्रा के दौरान वाहनों के संचालन और आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई पर पड़ सकता है। चार धाम यात्रा केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखती, बल्कि यह उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। चार धाम यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में वाहन श्रद्धालुओं को धामों तक पहुंचाते हैं। ऋषिकेश से करीब 1400 बसें, हरिद्वार से 800 बसें, 1000 जीप/मैक्सी, 800 टेंपो ट्रैवलर और 1000 से 1500 टैक्सियां इस यात्रा में शामिल होती हैं। इस हिमालयी तीर्थ यात्रा का अधिकांश हिस्सा सड़क मार्ग से तय किया जाता है, जहां टैक्सी, बस और निजी वाहनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ईंधन महंगा होने से इन सेवाओं के किराए बढ़ना स्वाभाविक है। इसके साथ ही, पहाड़ों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति मैदानी क्षेत्रों से होती है। जब परिवहन महंगा होता है, तो खाद्य सामग्री, होटल सेवाएं और अन्य जरूरी सुविधाएं भी महंगी हो जाती हैं, जो सीधे श्रद्धालुओं की जेब पर बोझ डालता है।ऋषिकेश से लेकर चारों धामों तक लगभग 1300 किमी लंबे यात्रा मार्ग में होटल, रेस्तरां और ढाबे स्थाई और सीजनल आधार पर चलते हैं। भोजन और चाय-नाश्ते के केन्द्र प्रायः एलपीजी से चलते हैं। इन दिनों रसोई गैस की किल्लत के चलते इसका असर चारधाम यात्रा पर भी पड़ना स्वाभाविक है। इस किल्लत के चलते भोजन आदि की कीमतों में उछाल आने की संभावना है।चारधाम यात्रा में परिवहन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी निभाने वाली ऋषिकेश स्थित टीजीएमओयू ट्रांसपोर्ट कंपनी के अध्यक्ष के अनुसार अगर युद्ध के हालात नहीं सुधरे और रसोई गैस की स्थिति नहीं सुधरी तो इस साल की चारधाम यात्रा प्रभावित हो सकती है। इस बार चारधाम यात्रा के लिए तीन हजार बसों की बुकिंग शुरू हो गई है। देश के विभिन्न कोनों से बसों की बुकिंग करने वाले तीर्थ यात्री अपना किचन भी साथ लाते हैं और उन्हें यात्रा के दौरान रसोई गैस उपलब्ध करानी होती है। इस सबके चलते यात्रियों के कुछ दल बसों की बुकिंग रद्द कर रहे हैं।चारधाम यात्रा केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक तंत्र है। उत्तराखंड के लाखों परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इस यात्रा से जुड़ी हुई है। होटल व्यवसायी, ढाबा संचालक, टूर ऑपरेटर, गाइड, घोड़ा-खच्चर मालिक, फूल-प्रसाद विक्रेता सभी की आय का बड़ा हिस्सा इसी यात्रा से आता है। जब यात्रा महंगी होती है तो विशेषकर मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग अपनी यात्रा स्थगित या सीमित कर सकते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इन वाहनों के जरिए ही लाखों श्रद्धालु यात्रा पूरी करते हैं, ऐसे में ईंधन की कमी पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकती है।सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह समय पर एलपीजी और ईंधन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करे। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो चार धाम यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं और व्यापारियों दोनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। उत्तराखंड के सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में स्थित ये धाम भौगोलिक रूप से दूर हैं, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव से अछूते नहीं हैं। एक क्षेत्र में युद्ध का प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों के जीवन पर पड़ता है। इस स्थिति में स्थानीय स्तर पर भी नवाचार की आवश्यकता है। पर्यटन से जुड़े लोगों को अपनी सेवाओं की गुणवत्ता और विविधता बढ़ानी होगी, ताकि कम संख्या में आने वाले यात्रियों से भी बेहतर आय प्राप्त की जा सके।चारधाम यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। इसे वैश्विक अस्थिरता के दौर में भी सुचारु और सुरक्षित बनाए रखना एक सामूहिक जिम्मेदारी है। सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर इस दिशा में प्रयास करने होंगे, ताकि आस्था की यह यात्रा आर्थिक संकट का शिकार न बने। प्रशासन और संबंधित विभागों को इस दिशा में जल्द ठोस कदम उठाने होंगे। गैस सिलेंडरों की किल्लत की स्थिति में होटल और ढाबा संचालकों को राहत देने के लिए सरकार जलौनी लकड़ी को विकल्प के रूप में पेश कर रही है। इसके लिए उत्तराखंड वन विकास निगम यात्रा मार्गों के प्रमुख पड़ावों पर अस्थायी डिपो खोलने की योजना बना रहा है।लकड़ी की उपलब्धता को बनाए रखने के लिए वन विभाग ने कई रणनीतियां बनाई हैं। वन विकास निगम के पास वर्तमान में पर्याप्त मात्रा में जलौनी लकड़ी उपलब्ध है, जिसे पहाड़ी क्षेत्रों के डिपो में ही खपाने की तैयारी है। होप्लो कीट से प्रभावित और सूख रहे पेड़ों के कटान की संभावना तलाशी जा रही है, ताकि उन्हें ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। वनाग्नि को रोकने के लिए बनाई जाने वाली ‘फायर लाइनों’ से हटाए जाने वाले पेड़ों का उपयोग भी इस कमी को पूरा करने के लिए किया जाएगा। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, और तेल-गैस की बड़ी खेप इसी रास्ते से होकर आती है। अगर इस मार्ग पर किसी तरह की रुकावट या तनाव पैदा होता है, तो ईंधन की सप्लाई में देरी हो सकती है, आयात महंगा हो सकता है और इसका सीधा असर उद्योगों, परिवहन लागत और आम लोगों के खर्च पर पड़ सकता है। इसके अलावा, यूरोप के साथ भारत का व्यापार भी काफी हद तक इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर करता है। यह मार्ग एशिया और यूरोप के बीच कनेक्टिविटी का अहम हिस्सा है, इसलिए इसमें किसी भी तरह की बाधा वैश्विक सप्लाई चेन और व्यापार को प्रभावित कर सकती है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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