डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मानसून सीजन शुरू होते ही पहाड़ की सड़कों ने वाहन चालकों सहित स्थानीय लोगों और चारधाम यात्रियों की परीक्षा लेना शुरू कर दिया है। बीती रविवार देर रात्रि हुई बारिश के कारण नेताला के समीप मलबा आने के कारण सड़क कीचड़ में तब्दील हो गई। इस कारण वहां पर छोटे चोपहिया और दोपहिया फंसने के कारण करीब एक घंटे वाहन फंसे रहे।किसी प्रकार वाहनों को निकालकर आवाजाही शुरू करवाई गई। वहीं, अभी भी वहां पर आवाजाही जोखिमभरी बनी हुई है। दूसरी ओर सोमवार सुबह डबरानी के समीप मलबा बोल्डर आने के कारण आवाजाही आधे घंटे बंद रही। मानसून सीजन को लेकर शासन प्रशासन की ओर से भूस्खलन जोन पर मशीनरी और पुलिस सहित होमगार्ड जवान तैनात करने के दावे किए गए थे। लेकिन धरातल पर मानसून की तैयारियां अभी भी आधी अधूरी है। नेताला के समीप एक भी मशीन व सुरक्षा व्यवस्था नहीं देखने को मिली। दूसरी ओर यमुनोत्री हाईवे पर भी पिछले कुछ दिनों से हाईवे बंद और खुलने का सिलसिला जारी है। राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र से जारी बुलेटिन के अनुसार प्रदेश में भूस्खलन के चलते 38 मार्ग बंद हैं, जिनमें स्टेट हाईवे से लेकर मुख्य जिला मार्ग और ग्रामीण सड़कें शामिल हैं। सबसे अधिक प्रभावित पिथौरागढ़ जिका है। यहां पर13 सड़कें बंद हैं। यमुनोत्री हाईवे पर चौड़ीकरण कार्य के दौरान निर्माण एजेंसी की लापरवाही पर स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अनियंत्रित कटिंग और निर्माण कार्य के कारण हाईवे आए दिन बंद हो रहा है, जिससे स्थानीय निवासियों के साथ ही यमुनोत्री धाम जाने वाले श्रद्धालुओं को घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है। साथ ही आपदा प्रभावित स्याना चट्टी कस्बे पर भी अनियंत्रित कटिंग के कारण नया खतरा मंडराने लगा है। लेकिन धरातल पर मानसून की तैयारियां अभी भी आधी अधूरी है। नेताला के समीप एक भी मशीन व सुरक्षा व्यवस्था नहीं देखने को मिली। दूसरी ओर यमुनोत्री हाईवे पर भी पिछले कुछ दिनों से हाईवे बंद और खुलने का सिलसिला जारी है। राज्य सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल आपदा आने के बाद राहत कार्य चलाना नहीं, बल्कि पहले से मजबूत तैयारी के जरिए संभावित नुकसान को न्यूनतम स्तर तक सीमित रखना है. इसी सोच के तहत आपदा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक आधुनिक, सशक्त और त्वरित प्रतिक्रिया देने वाला बनाया गया है. प्रशासन का मानना है कि नियमित मॉक ड्रिल, आधुनिक तकनीक, बेहतर समन्वय और लगातार समीक्षा के कारण राज्य की आपदा से निपटने की क्षमता पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है. मानसून के इस मौसम में सरकार की सक्रियता और व्यापक तैयारियां यह संकेत देती हैं कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन पूरी तरह तैयार रहने की कोशिश कर रहा है राज्य सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल आपदा आने के बाद राहत कार्य चलाना नहीं, बल्कि पहले से मजबूत तैयारी के जरिए संभावित नुकसान को न्यूनतम स्तर तक सीमित रखना है. इसी सोच के तहत आपदा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक आधुनिक, सशक्त और त्वरित प्रतिक्रिया देने वाला बनाया गया है. प्रशासन का मानना है कि नियमित मॉक ड्रिल, आधुनिक तकनीक, बेहतर समन्वय और लगातार समीक्षा के कारण राज्य की आपदा से निपटने की क्षमता पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है. मानसून के इस मौसम में सरकार की सक्रियता और व्यापक तैयारियां यह संकेत देती हैं कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन पूरी तरह तैयार रहने की कोशिश कर रहा है राज्य सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल आपदा आने के बाद राहत कार्य चलाना नहीं, बल्कि पहले से मजबूत तैयारी के जरिए संभावित नुकसान को न्यूनतम स्तर तक सीमित रखना है. इसी सोच के तहत आपदा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक आधुनिक, सशक्त और त्वरित प्रतिक्रिया देने वाला बनाया गया है. प्रशासन का मानना है कि नियमित मॉक ड्रिल, आधुनिक तकनीक, बेहतर समन्वय और लगातार समीक्षा के कारण राज्य की आपदा से निपटने की क्षमता पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है. मानसून के इस मौसम में सरकार की सक्रियता और व्यापक तैयारियां यह संकेत देती हैं कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन पूरी तरह तैयार रहने की कोशिश कर रहा है पिछले 24 घंटों के आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान सामान्य बना रहा, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में भारी वर्षा और बादलों के डेरे के कारण अधिकतम तापमान सामान्य से काफी कम दर्ज किया गया है. राज्य में सबसे कम न्यूनतम तापमान टिहरी में 15.1 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया. मौसम केंद्र देहरादून ने मुक्तेश्वर और पंतनगर जैसी जगहों पर 33 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली तेज हवाओं को दर्ज किया है. सरकार और राज्य आपदा प्रतिवादन बल ने पर्यटकों और स्थानीय जनता से अपील की है बारिश के दौरान इन हादसों की संख्या इसीलिए ज्यादा हो गई है, क्योंकि पानी की निकासी के रास्तों पर अंधाधुंध निर्माण हो गए हैं. नदियों के किनारों पर बेतहाशा निर्माण हो चुका है. सड़कों को फोर लेन करने की कोशिशों में पहाड़ों को कई जगह बेतरतीब और लापरवाही से काटा गया है. सड़कों को चौड़ा करने पर ध्यान ज़्यादा है. सड़कों की मजबूती पर फोकस कम हो गया है. इसीलिए इस तरह के हादसे हो रहे हैं. मौसम के बदले हुए स्वरूप को लेकर विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बता रहे हैं. पर्यावरण विशेषज्ञ का कहना है कि यह परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का सीधा असर है. उन्होंने बताया कि अब सर्दियों में होने वाली बर्फबारी दिसंबरजनवरी के बजाय फरवरीमार्च में हो रही है.प्रोफेसर सती के अनुसार, गर्मियों का मौसम लंबा होता जा रहा है और मानसून की बारिश का पैटर्न भी असामान्य हो गया है. कभी अचानक अत्यधिक बारिश हो जाती है, तो कभी लंबे समय तक बारिश नहीं होती. जिस तरीके और समय पर मानसून में बारिश होनी चाहिए थी, वह संतुलन अब पूरी तरह बिगड़ चुका है, जो आने वाले समय में और गंभीर प्रभाव डाल सकता है. मूसलाधार बारिश के बीच अलकनंदा नदी विकराल रूप धारण करती जा रही है. नदी का जलस्तर लगातार बढ़ने से हालात चिंताजनक बने हुए हैं. स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बेलनी पुल के नीचे स्थापित भगवान शिव की विशाल प्रतिमा छाती तक उफनती अलकनंदा में समा गई है. यह दृश्य लोगों के लिए कौतूहल के साथ-साथ चिंता का विषय भी बन गया है. बीते 24 घंटों से जारी बारिश के कारण अलकनंदा अपने पूरे वेग से बह रही है. नदी का जलस्तर लगातार बढ़ने से तटवर्ती क्षेत्रों में खतरा मंडराने लगा है. बेलनी पुल के नीचे स्थित शिव प्रतिमा, जो सामान्य दिनों में पूरी तरह दिखाई देती है, अब आधी जलधारा में डूब चुकी है. तेज बहाव और गर्जना करती नदी का दृश्य मानसून की भयावहता का एहसास करा रहा है. नदी के बढ़ते जलस्तर को देखते हुए जिला प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया है. आपदा प्रबंधन, पुलिस और राजस्व विभाग की टीमें संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार निगरानी बनाए हुए हैं. अधिकारियों ने नदी किनारे रहने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए सभी संबंधित विभागों को अलर्ट पर रखा गया है. लगातार हो रही बारिश के बीच श्रीनगर-रुद्रप्रयाग के बीच सिरोबगड़ स्लाइड जोन में पहाड़ी से भारी मात्रा में मलबा और पत्थर गिरने के कारण बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग एक बार फिर बंद हो गया है. लगातार हो रहे भूस्खलन से मार्ग पर आवागमन पूरी तरह ठप हो गया है और दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गई हैं. सिरोबगड़ स्लाइड जोन पिछले करीब तीन दशकों से राष्ट्रीय राजमार्ग का सबसे बड़ा जख्म बना हुआ है. हर मानसून में यह क्षेत्र चारधाम यात्रा, स्थानीय लोगों और आवश्यक आपूर्ति के लिए गंभीर चुनौती बन जाता है. करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद इस स्लाइड जोन का स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका है. । लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











