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उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा आस्था के जनसैलाब में पवित्रता!

26/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड की पवित्र चारधाम यात्रा हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र और आध्यात्मिक यात्राओं में से एक है। चारधाम यात्रा में गढ़वाल हिमालय में स्थित चार मंदिर शामिल हैं, जो 2,700 मीटर से अधिक ऊंचाई पर हैं। यह यात्रा इन चार पवित्र मंदिरों में आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए की जाती है। ये चारों हिमालयी मंदिर, यमुनात्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ, साल भर लगभग एक ही समय पर खुले रहते हैं ताकि लोग एक ही बार में यह यात्रा कर सकें। मंदिरों की बात करें तो, यमुनात्री और गंगोत्री मंदिर क्रमशः देवी यमुना और गंगा को समर्पित हैं। वहीं, केदारनाथ और बद्रीनाथ भगवान शिव और बद्रीनारायण को समर्पित हैं। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने कहा है कि उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले 47 प्रमुख मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक के प्रस्ताव में जैन, सिख और बौद्ध समुदायों को छूट दी जाएगी। समिति की तरफ से कहा गया है कि मामला किसी विशेष धर्म का नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक अनुशासन का है, जो भी सनातन धर्म में आस्था रखता है, उसके लिए बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के द्वार खुले हैं। उसके पवित्र स्थलों की मूल प्रकृति को बनाए रखने के लिए सख्त कदम जरूरी है। प्रस्ताव का यह प्रतिबंध केवल मुस्लिम और ईसाई समुदाय पर लागू होगा। जैन, सिख और बौद्ध समुदाय को छूट देने के पीछे तर्क दिया गया है कि अनुच्छेद 25 के तहत इन्हें हिन्दू परंपरा के अंतगर्त माना गया है। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने कहा है कि उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले 47 प्रमुख मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक के प्रस्ताव में जैन, सिख और बौद्ध समुदायों को छूट दी जाएगी। समिति की तरफ से कहा गया है कि मामला किसी विशेष धर्म का नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक अनुशासन का है, जो भी सनातन धर्म में आस्था रखता है, उसके लिए बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के द्वार खुले हैं। उसके पवित्र स्थलों की मूल प्रकृति को बनाए रखने के लिए सख्त कदम जरूरी है। प्रस्ताव का यह प्रतिबंध केवल मुस्लिम और ईसाई समुदाय पर लागू होगा। जैन, सिख और बौद्ध समुदाय को छूट देने के पीछे तर्क दिया गया है कि अनुच्छेद 25 के तहत इन्हें हिन्दू परंपरा के अंतगर्त माना गया है। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने कहा है कि उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले 47 प्रमुख मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक के प्रस्ताव में जैन, सिख और बौद्ध समुदायों को छूट दी जाएगी। समिति की तरफ से कहा गया है कि मामला किसी विशेष धर्म का नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक अनुशासन का है, जो भी सनातन धर्म में आस्था रखता है, उसके लिए बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के द्वार खुले हैं। उसके पवित्र स्थलों की मूल प्रकृति को बनाए रखने के लिए सख्त कदम जरूरी है। प्रस्ताव का यह प्रतिबंध केवल मुस्लिम और ईसाई समुदाय पर लागू होगा। जैन, सिख और बौद्ध समुदाय को छूट देने के पीछे तर्क दिया गया है कि अनुच्छेद 25 के तहत इन्हें हिन्दू परंपरा के अंतगर्त माना गया है। सवाल यही है कि सिर्फ मुस्लिम और ईसाइयों को बाहर रखने से ही क्या मंदिरों की पवित्रता बची रहेगी। क्या यही असली चुनौती है। चारो धाम पर जो पर्यावरण का खतरा सिर पर मंडरा रहा है, उससे पवित्रता खतरे में नहीं है। हिन्दुओ के चार वेद एवं 18 पुराणों में से एक प्रमुख स्कंद पुराण में की गई भविष्यवाणी के अनुसार कलियुग के हजारों वर्षों बाद और इसके अंत से पूर्व केदारनाथ धाम और बद्रीनाथ धाम जैसे प्रमुख तीर्थ स्थल अदृश्य हो जाएंगे या नष्ट हो जाएंगे। इस भविष्यवाणी का तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं है की कोई शक्ति जाकर इन मंदिरों को तोड़ देगी या नष्ट कर देगी। बल्कि स्कंद पुराण के अनुसार कलियुग के अंत में जब धर्म का पतन अपने चरम पर होगा, तब यह दिव्यस्थल अपनी आध्यात्मिक शक्ति को समेट लेंगे और अदृश्य या भक्तों की पहुंच से दूर हो जाएंगे। कलियुग में हमें धर्म का पालन करना चाहिए, ताकि कलयुग में पवित्र स्थल और उनकी कृपा हम पर बनी रहे। साल 2013 में केदारनाथ में भीषण आपदा को भी कुछ लोग इस भविष्यवाणी की झलक मानते हैं। 15 जून 2025 को रुद्र प्रयाग में एक हेलिकाप्टर दुर्घटना ग्रस्त हो गया है। जिसमें सवार सभी तीर्थ यात्रियों के मृत्यु हो गई। कुछ लोग इसे वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार आधुनिक दृष्टिकोण के रूप में प्रतीकात्मक मानते हैं कि अगर हम पर्यावरण का नाश करेंगे तो धर्म हमसे दूर होता चला जाएगा। मौजूदा दौर में प्राकृतिक आपदाएं या सामाजिक पतन की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। ये इस बात का संकेत है कि इस पूरे क्षेत्र में दशकों से चले आ रहे प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने हालात बिगाड़ दिए हैं। इसके बावजूद जितनी गंभीरता से पर्यावरण को बचाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, वे उूट के मुंह में जीरे के समान है।साल 2013 में केदारनाथ में भयंकर विनाशकारी आपदा आई थी। केदारनाथ आपदा में 4400 से अधिक लोग मारे गए। 7 फरवरी 2022 को धौली और ऋषि गंगा का ऐसा सैलाब आया, जिसमें सैकड़ों जिंदगियां दफ्न हो गई थी। इस आपदा ने न सिर्फ 204 लोगों की जान ले ली, बल्कि अपने रास्ते में आने वाले सभी बुनियादी ढांचों को नष्ट कर दिया। आपदा में करीब 1,625 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। उत्तराखंड चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या साल दर साल बढ़ती जा रही है। वर्ष 2025 में 51 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने चारों धामों के दर्शन किए, जो पिछले साल अर्थात 2024 की तुलना में 4 लाख 35 हजार अधिक है।केदारनाथ यात्रा के दौरान डेढ़ से 2 टन कचरा रोजाना उत्पन्न होता है। वर्ष 2025 की यात्रा के दौरान केदारनाथ धाम में रिकॉर्ड 17.68 लाख भक्तों ने लगभग कुल 2300 टन से अधिक कचरा फैलाया है, जिसमें 100 टन प्लास्टिक शामिल है। हिमालयी क्षेत्र में कूड़ा जलाने पर बैन होने के कारण, इस मलबे को खच्चरों द्वारा सोनप्रयाग नीचे लाने में ₹25 करोड़ से अधिक की लागत आ रही है। यह कचरा पिछले साल की तुलना में 325 टन अधिक है। जिसमें 2200 टन ठोस कचरा और लगभग 100 टन प्लास्टिक शामिल है। हर तीर्थयात्री ने औसतन 1.5 किलो से ज्यादा कचरा छोड़ा। भारी मात्रा में प्लास्टिक कचरा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। यह कचरा 23 अक्टूबर 2025 को कपाट बंद होने के बाद सफाई अभियान के दौरान गौरीकुंड से केदारनाथ के बीच मिला।एक रिपोर्ट के मुताबिक चारधाम में बढ़ती श्रद्धालुओं की भीड़ ग्रीष्मकालीन के साथ ही शीतकालीन गतिविधियों को भी प्रभावित कर रही है। ऐसे में ग्लेशियरों के पीछे खिसकने की वजह से भूस्खलन हिमस्खलन चट्टानों के गिरने समेत खतरों को बढ़ा रहा है। यही नहीं, ग्लेशियर के पीछे हटने से हैकिंग ट्रेल्स और पर्वतारोहण मार्गों में भी बदलाव आ रहे हैं। लिहाजा, चारधाम में बढ़ रही भक्तों की भीड़ की वजह से पर्वतीय पर्यटन पर प्रभाव पड़ रहा है। मुख्य रूप से, श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ाने की वजह से चारधाम यानी बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के समीप मौजूद ग्लेशियर न सिर्फ तेजी से पिघल रहे हैं बल्कि सालाना धामों के तापमान भी 0.02 से 0.05 डिग्री तक की बढ़ोतरी हो रही है।दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में हजारों एकड़ वन भूमि पर अतिक्रमण का स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा था कि राज्य तंत्र की विफलता के कारण “23 साल लग गए” और अधिकारी सब कुछ देखते हुए भी शांत बने रहे। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में वन भूमि पर अवैध अतिक्रमण और कॉर्बेट नेशनल पार्क में अवैध निर्माण/पेड़ों की कटाई पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को “मूकदर्शक” बने रहने के लिए कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने, जांच के लिए समिति गठित करने और पारिस्थितिक नुकसान की भरपाई करने के निर्देश दिए थे। उत्तराखंड में हज़ारों हेक्टेयर वन भूमि पर अवैध कब्जे़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य में कार्यकारी पद पर आसीन प्रत्येक व्यक्ति इस लापरवाही के लिए जवाबदेह है। सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा कि आपको अवैध कब्ज़े का पता लगाने में 23 साल का समय लग गया। सुप्रीम कोर्ट की इस तल्ख टिप्पणी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड सरकार को पर्यावरण बचाने की कितनी चिंता है, इसके विपरीत धार्मिक भावनाओं को भुनाने के लिए पवित्रता बचाने की कवायद की जा रही है।उत्तराखंड में मानवीय गतिविधयों के विस्फोट से ये भयावह हालात पैदा हुए हैं। व्यवसायिक गतिविधियों के लालच ने उत्तराखंड को विनाश के कगार पर धकेला है। इंसानों द्वारा प्रकृति को दिए गए घावों से उत्तराखंड कराह रहा है। हालात ये हैं कि पर्यटन और धार्मिक आस्था के नाम पर उत्तराखंड पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। देवताओं का निवास माने जाने वाला यह प्रदेश इस दबाव को सहन करने की शक्ति खोता चला रहा है। उत्तराखंड चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या साल दर साल बढ़ती जा रही है। उत्तराखंड के चारधामों में क्षमता से अधिक श्रद्धालुओं का आना हिमालय की पारिस्थितिकी और पर्यावरण के लिए भविष्य में खतरा बन सकते हैं। बड़ा सवाल यही है कि स्कंद पुराण की भविष्यवाणी के मुताबिक उत्तराखंड के तीर्थस्थल हीं नहीं रहेंगे तो पवित्रता का क्या होगा। पर्यावरण बर्बाद होने के कारण ऐसे हालात बनते दिखाई दे रहे हैं। चार धाम यात्रा के दौरान पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी इस बार सख्त कदम उठाए गए हैं। सरकार ने प्लास्टिक के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है और यात्रियों को पर्यावरण अनुकूल सामग्री इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। यात्रा मार्गों पर कूड़ा प्रबंधन के लिए विशेष व्यवस्था की गई है, जिसमें डस्टबिन, कचरा संग्रहण वाहन और सफाई कर्मियों की तैनाती शामिल है। इसके अलावा, “ग्रीन चार धाम” अभियान के तहत श्रद्धालुओं को जागरूक किया जा रहा है कि वे प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान न पहुंचाएं। ट्रेकिंग मार्गों पर भी सीमित संख्या में यात्रियों को अनुमति दी जा रही है, ताकि पर्यावरण पर दबाव कम हो। प्रशासन का मानना है कि इन प्रयासों से हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखा जा सकेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह धरोहर संरक्षित रहेगी। बेहतर यही है कि धर्म के आधार पर लोगों को बांटने की कोशिश के बजाए उत्तराखंड की वास्तविक चुनौतियों का समाधान ढूंढा जाए।अंततः, हिमालय की पवित्रता और सुरक्षा की रक्षा करना ही सबसे बड़ी सेवा है, क्योंकि प्रकृति के कोप के आगे मानवीय हठ और नीतियां दोनों ही असहाय सिद्ध होती हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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