डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
रघु राय का जन्म 1942 में पंजाब के झंग (अब पाकिस्तान में) में हुआ था. साल 1965 में उन्होंने ‘द स्टेट्समैन’ अखबार में फोटो पत्रकार और 1982 में इंडिया टुडे के लिए दस साल तक बतौर फोटो संपादक काम किया.रघु राय का फोटोग्राफर बनने की कहानी कम दिलचस्प नहीं है. उनका फोटोग्राफी की दुनिया में प्रवेश किसी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि एक संयोग था. पेशे से सिविल इंजीनियर रहे रघु राय 1960 के दशक में दिल्ली में अपने भाई और प्रसिद्ध फोटोग्राफर एस पॉल से मिलने आए थे. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, यहीं से उनकी रुचि फोटोग्राफी की ओर बढ़ी. हरियाणा के एक गांव में ली गई उनकी शुरुआती तस्वीर (कैमरे की ओर सीधे देखता एक गधा) ने उनकी किस्मत बदल दी. यह तस्वीर लंदन के ‘द टाइम्स’ में प्रकाशित हुई और उन्हें न सिर्फ पुरस्कार राशि मिली, बल्कि एक नई पहचान भी मिली.फोटोग्राफी कॅरियर के दौरान रघु राय ने सिर्फ तस्वीरें नहीं लीं, बल्कि जीवन के विभिन्न रंगों को अपने फ्रेम में जीवंत किया. उनका मानना था कि फोटो जर्नलिज्म इतिहास का पहला दृश्य प्रमाण होता है. यही वजह रही कि उन्होंने अपने काम को महज सुंदर तस्वीरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि आम लोगों की भावनाओं और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से कैद किया.रघु राय का जन्म 1942 में पंजाब के झंग (अब पाकिस्तान में) में हुआ था. साल 1965 में उन्होंने ‘द स्टेट्समैन’ अखबार में फोटो पत्रकार और 1982 में इंडिया टुडे के लिए दस साल तक बतौर फोटो संपादक काम किया.रघु राय का फोटोग्राफर बनने की कहानी कम दिलचस्प नहीं है. उनका फोटोग्राफी की दुनिया में प्रवेश किसी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि एक संयोग था. पेशे से सिविल इंजीनियर रहे रघु राय 1960 के दशक में दिल्ली में अपने भाई और प्रसिद्ध फोटोग्राफर एस पॉल से मिलने आए थे. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, यहीं से उनकी रुचि फोटोग्राफी की ओर बढ़ी. हरियाणा के एक गांव में ली गई उनकी शुरुआती तस्वीर (कैमरे की ओर सीधे देखता एक गधा) ने उनकी किस्मत बदल दी. यह तस्वीर लंदन के ‘द टाइम्स’ में प्रकाशित हुई और उन्हें न सिर्फ पुरस्कार राशि मिली, बल्कि एक नई पहचान भी मिलीफोटोग्राफी कॅरियर के दौरान रघु राय ने सिर्फ तस्वीरें नहीं लीं, बल्कि जीवन के विभिन्न रंगों को अपने फ्रेम में जीवंत किया. उनका मानना था कि फोटो जर्नलिज्म इतिहास का पहला दृश्य प्रमाण होता है. यही वजह रही कि उन्होंने अपने काम को महज सुंदर तस्वीरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि आम लोगों की भावनाओं और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से कैद किया. 1972 में पद्मश्री से सम्मानित रघु राय ने भारत के कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षणों को अपने कैमरे में दर्ज किया. उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीरें लीं. इसके अलावा भोपाल गैस त्रासदी और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान शरणार्थियों की मार्मिक तस्वीरें उनके सबसे चर्चित कार्यों में शामिल हैं. आपातकाल (भारत) के दौरान भी उन्होंने सेंसरशिप के बावजूद अपनी रचनात्मकता से सच्चाई को सामने लाने के तरीके खोजे. प्रतीकों और संकेतों के माध्यम से उन्होंने उस दौर की वास्तविकता को दुनिया तक पहुंचाया. 1977 में रघु राय को प्रतिष्ठित मैग्नम फोटोज में शामिल होने का निमंत्रण मिला, जो उन्हें महान फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी कार्तिए ब्रेसों की सिफारिश पर मिला था. उनके काम में ब्रेसों की मानवीय दृष्टि की झलक साफ दिखाई देती है. फिर चाहे वह पुरानी दिल्ली की गलियां हों, गंगा के घाट या देश के विविध हिस्सों की तस्वीरें 1972 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान उनकी प्रभावशाली तस्वीरों के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 1992 में अमेरिका में उन्हें फोटोग्राफर ऑफ द ईयर चुना गया। 2019 में उन्हें अकादेमी दे बो-आर्ट्स फोटोग्राफी अवॉर्ड मिला। वहीं 2017 में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा था।. रघु राय ने कई महत्वपूर्ण किताबें भी लिखीं, जिनमें Delhi, Raghu Rai’s India, Picturing Time और Tibet in Exile शामिल हैं. उनकी पुस्तक Raghu Rai: People (2016) में उन्होंने कई प्रसिद्ध हस्तियों के साथ-साथ आम लोगों के जीवंत चित्र प्रस्तुत किए. इनमें इंदिरा गांधी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, दलाई लामा, मदर टेरेसा और सत्यजीत रे जैसी हस्तियां शामिल हैं. जीवन के अंतिम वर्षों में भी रघु राय की फोटोग्राफी के प्रति प्रतिबद्धता कम नहीं हुई. वह लगातार नए विषयों और दृष्टिकोणों के साथ काम करते रहे. उनके निधन के साथ एक युग का अंत हो गया, लेकिन उनके कैमरे में कैद भारत की कहानी हमेशा जीवित रहेगी. देश के फेमस फोटोग्राफर रघु राय के निधन से कला और पत्रकारिता की दुनिया में एक बड़ी क्षति हुई है। उनके निधन पर कई जाने-माने सितारों और शख्सियतों ने सोशल मीडिया पर उनकी याद में भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनके योगदान को सलाम किया। रघु राय हमारे देश के सबसे महानतम व्यक्तियों में से एक थे। उनका जाना एक युग के खत्म होने जैसा है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।” लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











