डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत में खेती हमेशा जुए के खेल जैसा ही रहा है। कभी सूखे की मार तो कभी बाढ़ का खतरा। अन्नदाता के लिए अन्न उगाना कभी आसान नहीं रहा। मानूसन पर निर्भर होने के कारण खेती हर बार लाभ का सौदा भी नहीं रही। पहाड़ों के किसानों के लिए तो ये बिल्कुल भी नहीं। पहले सूखा और अब तीन दिनों की जोरदार बारिश ने किसानों के माथे पर बल ला दिया है। पहाड़ों में मौसम की मार ने एक बार फिर किसानों और बागवानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है. जनपद के चिन्यालीसौड़ विकासखंड में हुई तेज ओलावृष्टि और बारिश ने खेती-बागवानी को भारी नुकसान पहुंचाया है. बनगांव, काथला, ग्वालथा, अठाणगांव और आसपास के क्षेत्रों में अचानक आसमान से गिरे बड़े-बड़े ओलों ने खेतों और बागों को तहस-नहस कर दिया. इस आपदा से सबसे बड़ा झटका बागवानों को लगा है, क्योंकि सेब और नासपाती के पेड़ों पर लगे फूल झड़ गए, जिससे इस सीजन की फसल की उम्मीद लगभग खत्म हो गई है. वहीं दूसरी ओर, मटर, बीन, राजमा और टमाटर जैसी नगदी फसलों के पौधे भी ओलावृष्टि की मार नहीं झेल पाए और बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है. किसानों का कहना है कि एक ही झटके में उनकी महीनों की मेहनत बर्बाद हो गई. स्थानीय काश्तकारों ने जिला प्रशासन से तुरंत सर्वे कराने और नुकसान का आकलन कर उचित मुआवजा देने की मांग की है. उनका कहना है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो उनकी आर्थिक स्थिति और ज्यादा खराब हो सकती है. पहाड़ों में मौसम की मार ने एक बार फिर किसानों और बागवानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है. जनपद के चिन्यालीसौड़ विकासखंड में हुई तेज ओलावृष्टि और बारिश ने खेती-बागवानी को भारी नुकसान पहुंचाया है. बनगांव, काथला, ग्वालथा, अठाणगांव और आसपास के क्षेत्रों में अचानक आसमान से गिरे बड़े-बड़े ओलों ने खेतों और बागों को तहस-नहस कर दिया. इस आपदा से सबसे बड़ा झटका बागवानों को लगा है, क्योंकि सेब और नासपाती के पेड़ों पर लगे फूल झड़ गए, जिससे इस सीजन की फसल की उम्मीद लगभग खत्म हो गई है. वहीं दूसरी ओर, मटर, बीन, राजमा और टमाटर जैसी नगदी फसलों के पौधे भी ओलावृष्टि की मार नहीं झेल पाए और बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है. किसानों का कहना है कि एक ही झटके में उनकी महीनों की मेहनत बर्बाद हो गई. स्थानीय काश्तकारों ने जिला प्रशासन से तुरंत सर्वे कराने और नुकसान का आकलन कर उचित मुआवजा देने की मांग की है. उनका कहना है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो उनकी आर्थिक स्थिति और ज्यादा खराब हो सकती है. भले ही यह दैवीय प्रकोप न सही और जलवायु परिवर्तन का नतीजा ही हो लेकिन यह परिवर्तन मनुष्योंं द्वारा प्रकृति से की जाने वाली अनावश्यक और अत्यधिक छेड़छाड़ तथा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की अति के कारण ही हो रहा है विकास की अंधी दौड़ ने ही इस तरह के हालात पैदा किए हैं। पहाड़ पर हो रहे अनियोजित विकास को अगर नहीं रोका गया तो पहाड़ के अस्तित्व को कोई नहीं बचा सकेगा अभी भी अगर सरकारों और स्थानीय लोगों की समझ में यह बात नहीं आ रही है तो उसे पहाड़ का मिटता अस्तित्व देखने को तैयार रहना चाहिए। भले ही यह दैवीय प्रकोप न सही और जलवायु परिवर्तन का नतीजा ही हो लेकिन यह परिवर्तन मनुष्योंं द्वारा प्रकृति से की जाने वाली अनावश्यक और अत्यधिक छेड़छाड़ तथा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की अति के कारण ही हो रहा है विकास की अंधी दौड़ ने ही इस तरह के हालात पैदा किए हैं। पहाड़ पर हो रहे अनियोजित विकास को अगर नहीं रोका गया तो पहाड़ के अस्तित्व को कोई नहीं बचा सकेगा अभी भी अगर सरकारों और स्थानीय लोगों की समझ में यह बात नहीं आ रही है तो उसे पहाड़ का मिटता अस्तित्व देखने को तैयार रहना चाहिए। अध्ययन के मुताबिक गर्म होता मौसम फलों की कई प्रजातियों के उत्पादन में आती गिरावट की वजह बन रहा है। इसकी वजह से बागवान उष्णकटिबंधीय फलों की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि ये फल बदलती जलवायु परिस्थितियों का सामना करने में कहीं ज्यादा सक्षम हैं।देखा जाए तो यह उदाहरण इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि पहाड़ों पर भी पेड़ पौधे जलवायु में आते बदलावों की मार से सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में यदि समय रहते इनपर ध्यान न दिया गया तो भविष्य में पहाड़ी पौधों की कई प्रजातियां दुनिया से ओझल हो जाएंगी। फसलों को नुकसान के अलावा, जलवायु परिवर्तन और असमय हुई भारी बारिश ने भी फसलों में रोग पैदा कर दिए हैं। “आलू, पत्तागोभी, फूलगोभी और मटर जैसी सब्जियों में झुलसा रोग के कारण फसलें बेकार हो गई हैं, जबकि गेहूं फूलकर काला पड़ गया है। सेब, बेर और आड़ू जैसी बागवानी फसलों पर भी दाग पड़ गए हैं। ऐसी फसलों को या तो कोई खरीदार नहीं मिलेगा या नाममात्र की कीमत मिलेगी।” उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों को मुफ्त कीटनाशक उपलब्ध कराना चाहिए और उनसे लिए गए ऋण और सब्सिडी माफ कर देनी चाहिए, क्योंकि इस साल किसानों के लिए फसलों में किए गए निवेश की भरपाई करना मुश्किल होगा। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











