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चीड़ की छाल से कला रचते जीवन जोशी, पोलियो भी नहीं तोड़ सका हौंसला

01/05/25
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड के हल्द्वानी में रहने वाले बुजुर्ग जीवन चंद्र जोशी अपने नाम को पूरा
सार्थक कर रहे हैं. जीवन जोशी ने अपनी लाइफ में सूखे चीड़ की छाल से
बेहतरीन कलाकृतियां बनाई हैं. जिसे वे 'बैगेट' कहते हैं. उत्तराखंड के मंदिरों की
प्रतिकृतियों से लेकर पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्रों तक, जोशी की कृतियां इस क्षेत्र
की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं. जोशी कहते हैं कि चीड़ की छाल
को उसके लचीलेपन के कारण किसी भी प्रतिकृति में ढाला जा सकता है. उनका
कहना है कि चीड़ के कई पर्यावरणीय लाभ भी हैं. जीवन जोशी बचपन से ही
पोलियो से पीड़ित हैं, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी शारीरिक अक्षमता को
अपने काम के आड़े नहीं आने दिया. स्थानीय निवासी उनकी दृढ़ता और उनके
काम के प्रति समर्पण की तारीफ करते हैं. लोगों का कहना है कि अगर उनके काम
को सरकार से समर्थन मिलता है, तो यह स्थानीय स्तर पर बेरोजगारी को काफी
हद तक दूर कर सकता है. जीवन चंद्र जोशी ने जानकारी देते हुए कहा, “इसमें
हर तरीके की चीज बन सकती है। ये एक ऐसी चीज है जिसमें एक तो पर्यावरण
का सबसे ये हैं की पर्यावरण को नुकसान नहीं करती। जब हम इसको जंगल से
निकालकर के बाहर ले आते हैं। तो हम पर्यावरण की रक्षा करते हैं क्योंकि जब
अग्नि जलती है, तो ये बैगेट भी वहां पड़ा हुआ जलता है और इसकी बैगेट की एक
खासियत है की एक बार जलने के बाद ये बुझ जाता है। तो दौबारा ये कोयले के
रूप में इकट्ठा हो जाता है। दौबारा, तीबारा, तीसरी बार, चौथी बार, पांचवी
बार तक जल जाते हैं। तो सबसे बड़ी चीज हम खड़े बैगेट पर काम नहीं करते।
पेड़ के बैगेट पर काम नहीं करते। जो पेड़ काट दिए जाते हैं, जो पेड़ सूख जाते हैं,
सफाई कर के जो बैगेट जंगल में पड़े होते हैं। हम उन बैगेट पर काम करते हैं या

पानी में बहे हुए बैगेट हैं उन पर काम करते हैं।”सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा,
“जोशी जी ने जो अपना जो है काष्ठ कला को आगे बढ़ाया है। ये अपने आप में
बहुत बड़ा हमारे लिए जो है रोजगार के क्षेत्र में जो है, जब हमारे यहां से जब
पलायन हो रहा है। तो उनके द्वारा जो है कला को आगे बढ़ाया जा रहा है। वो
अपने आप में रोजगार अर्जित करने के लिए उत्तराखंड के पलायन को रोकने के
लिए सार्थक सिद्ध हो सकती है। इन चीजों पर उत्तराखंड की सरकार को ऐसे
कलावृत काष्ठ कला को आगे बढ़ाने के लिए अपना सरकार की ओर से भी
सहयोग देना चाहिए।”सामाजिक कार्यकर्ता का कहना था, “जोशी जी ने इतनी
सुंदर कलाकृतियां प्रस्तुत की हैं कि उन कलाकृतियां को पर्यटक भी अपने साथ
सहेज कर ले जा सकते हैं और साथ ही इनको अगर और प्रोत्साहन दे सरकार
और अन्य संस्थाएं तो ये और भी बेहतरीन कलाकृतियां बना सकते हैं और जिससे
यहां की अनमोल धरोहरों को हम लोग जो वेस्टेज है उसको भी हम इस्तेमाल
कर सकेंगे। सैलानियों को भी एक ऐसे मोमेंटो या अपना स्मृति चिन्ह दे सकेंगे।
वहीं जो है नए बच्चों को भी जो है इस कला से रूबरू कराएं जोशी जी के द्वारा।
तो मैं समझता हूं अपने आप में ही कला का नया नमूना और नया आयाम होगा।”
जीवन जोशी को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से सूखे चीड़ की छाल से
कलाकृतियां बनाने के लिए सीनियर फ़ेलोशिप भी मिल चुकी है। जीवन जोशी
बताते हैं कि इस कला में उनकी रुचि उनके पिता की वजह से बढ़ी। अब 65 साल
के हो चुके जीवन जोशी बताते हैं कि वे स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देना जारी
रखेंगे और साथ ही युवा पीढ़ी को इसे अपनाने के लिए प्रशिक्षित भी करेंगे।
काष्ठकला के नायाब कलाकृतियों की खासी मांग रहती है जीवन का कहना है कि
उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, नहीं तो वे युवाओं को मुफ्त प्रशिक्षण
देते हलांकि गुजर बसर के लिए काफी कम फीस लेकर कुछ लोगों को सीखा भी
रहे हैं। प्रशासन के आला अधिकारियों को अपनी कलाकृतियों से कई आर अवगत
करा चुके जीवन अब थक गए हैं उनका कहना है कि आर्थिक मदद तो दूर उन्होंने

प्रशासन से मदद मांगी थी कि कहीं दुकान खुलवा दें या कोई जगह उपलब्ध
करवा दें ताकि वह अपने उत्पादों को डिस्पले कर सकें और युवाओं को कार्यशाला
के माध्यम से इस कला से रूबरू करवा सकें।बहरहाल जीवन अब अपनी
कलाकृति के माध्यम से आजादी के 75वें अमृत महोत्सव के मस प्रवेश करने के
अवसर पर देशभक्ति का संदेश लोगों को दे रहे हैं। उनके द्वारा अपने काष्ठ शिल्प
के हुनर के माध्यम से 75 कलाकृतियां बनाई जा रही हैं जो कि 15 अगस्त को
स्टॉल लगाकर प्रदर्शित की जाएंगी। अभी तक वे चीड़ के पेड़ की छाल (बगेट) से
भारत का मानचित्र, तिरंगा झंडा,शंख,नाव,मूर्ति, भारत का नक्शा व आजादी
का 75 अमृत महोत्सव बनाकर तैयार कर चुके हैं और बाकी कलाकृतियां भी 15
अगस्त तक पूरी करने का दावा कर रहे हैं। जीवन संस्कृति मंत्रालय भारत
सरकार से फैलोशिप होल्डर भी हैं और विगत 20 वर्षों से भी अधिक सालों से
काष्ठ शिल्प के क्षेत्र में सक्रिय हैं। 65 साल उम्र हो गयी है, जिंदगी एकदम
बढ़िया कट रही है अब इस उम्र में क्या शादी करें, कभी इस बारे में सोचा
ही नहीं बस एक सपना है वो पूरा हो जाए तो जिंदगी सफल हो जाए। यह
कहना है हुनरमंद चाचू का, जिनका असल नाम जीवन चंद्र जोशी है वो बात
अलग है कि पूरा मोहल्ला,नाते-रिश्तेदार उन्हें चाचू के नाम से जानता है। कहने
को वह शारीरिक रुप से दिव्यांग हैं मगर उनकी इच्छाशक्ति, मेहनत और
जिंदादिली को देखते हुए उन्हें दिव्यांग कहना न्याय संगत नहीं होगा। एक पेड़ है
जो पहाड़ के लिए नासूर बन गया है. इसकी रोकथाम के लिए पहाड़ पर कई बार
आंदोलन भी हुए लेकिन अभी तक न तो सरकार के कानों में जूं रेंगी और न ही
वन महकमा नींद से जागा है. हम बात कर रहे है पाइन यानी चीड़ के पेड़ की.
एक तरफ जहां चीड़ के जंगल प्राकृतिक असंतुलन को बढ़ावा दे रहे हैं, तो वहीं
गर्मियों के मौसम में वनाग्नि को न्यौता भी दे रहे हैं. जंगल में खलनायक के बतौर
जाना जाने वाला ये वृक्ष दरअसल ब्रिटिशराज की देन है.अंग्रेज अपनी
व्यवसायिक जरूरतों की पूर्ति के लिए इसे यूरोप से यहां लाए थे. ये पेड़ उतना

लाभकारी नहीं है, जिससे ज्यादा इसके नुकसान है. हालांकि चीड़ का अगर
व्यवसायिक उपयोग किया जाए तो जंगलों में धधकती आग पर काबू पाने के
साथ ही युवाओं को रोजगार भी दिया जा सकता है. मगर जरूरत है सरकारों की
मजबूत इच्छा शक्ति की और चीड़ के दोहन के लिए बेहतर नीति बनाने की.
लेकिन आज तक न तो सरकारों ने इस बात की सुध ली और न ही वन महकमे ने.
अगर समय रहते कोई कारगर कदम नहीं उठाये गये तो इसकी कीमत
पहाड़वासियों को अपने जल, जंगल और जमीन खोकर चुकानी पड़ेगी. उनकी
दिली इच्छा है कि आने वाले समय में वह अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी आर्ट
गैलरी में लगाएं। उन्होंने कहा कि सरकारों ने हस्तशिल्प कला को बढ़ावा दिया
तो राज्य में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के*
*जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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