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दयारा बुग्याल में भूस्खलन ने बढ़ाई चिंताए

03/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बुग्याल उत्तराखंड के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले घास के विशाल मैदान होते हैं. यह समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर से 4000 मीटर की ऊंचाई पर मिलते हैं. बुग्यालों को स्थानीय लोग गर्मियों में अपने मवेशियों के चरागाह के रूप में भी उपयोग करते हैं. यह केवल पशुपालन का आधार नहीं हैं. इनमें पाई जाने वाली औषधीय जड़ी बूटियां दुर्लभ फूल और प्राकृतिक वनस्पतियां भी इन्हें खास बनाती हैं. यही कारण है कि बुग्यालों को उत्तराखंड का ग्रीन गोल्ड भी कहा जाता है.समुद्रतल से 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित दयारा बुग्याल (हरी घास का मैदान) चारधाम यात्रा के साथ इन दिनों पर्यटकों से गुलजार है। यहां हर दिन औसतन 30 से 35 पर्यटक पहुंच रहे हैं। घने जंगलों से गुजरने वाला यह ट्रेक प्राकृतिक खूबसूरती से लबरेज है। पर्यटकों की चहल कदमी से दयारा के आधार पर बसे रैथल व बार्सू गांव में पर्यटन कारोबार को पंख लग रहे हैं।प्रसिद्ध बटर फेस्टिवल यानी कि अंढूड़ी उत्सव का आयोजन भी दयारा बुग्याल में होता है। अगस्त में आयोजित होने वाले इस पर्व पर स्थानीय लोग व पर्यटक पहुंचते हैं, जिसमें दूध-मक्खन की होली खेली जाती है।दयारा बुग्याल ट्रेक जनपद के प्रमुख ट्रेक रूटों से एक है। रैथल गांव से दयारा बुग्याल तक जाने के लिए आठ किमी लंबा पैदल ट्रेक है। बांज, बुरांश व देवदार के घने जंगलों से होकर जाने वाला यह ट्रेक पर्यटकों की शारीरिक दक्षता की परीक्षा लेता है।विश्व प्रसिद्ध दयारा बुग्याल में हो रहे भू-क्षरण और भूस्खलन के कारण करीब 400 हेक्टेयर में फैले क्षेत्र पर खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि इस पर वर्ष 2012-13 की आपदा के बाद से भू-धंसाव होने के कारण खतरा बना हुआ था लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों से धियाणा बुग्याल के समीप नहेटा और चिलपाड़ा में भू-क्षरण के कारण कई खाई बनने लगीं है। यहां से निकलने वाला मलबा हर वर्ष पापड़गाड में आपदा का रूप बनकर आ रहा है।दयारा बुग्याल समुद्रतल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मखमली घास के इस मैदान की खूबसूरती देखते ही बनती है। यहां से हिमालय की पर्वत चोटियों का सुंदर नजारा आकर्षण का केंद्र रहता है।मखमली घास के इस मैदान की खूबसूरती देखते ही बनती है। यहां से हिमालय की पर्वत चोटियों का सुंदर नजारा आकर्षण का केंद्र रहता है।मखमली घास के इस मैदान की खूबसूरती देखते ही बनती है। यहां से हिमालय की पर्वत चोटियों का सुंदर नजारा आकर्षण का केंद्र रहता है।पिछले कुछ वर्षोंं में बुग्याल के निचले इलाकों धियाणा, बरनाला, गोई सहित नहेटा और चिलपाड़ा आदि क्षेत्र में तेजी से भू-धंसाव होने से वहां पर बड़ी-बड़ी खाई बन रही हैं। इससे दयारा बुग्याल के जैव विविधता पर भी असर पड़ रहा है।हालांकि वन विभाग की ओर से वर्ष 2020 में वहां पर भारतीय वन्यजीव संस्थान और उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र की ओर से ईको फ्रेंडली तरीके से करीब 600 मीटर क्षेत्र में जूट व नारियल के रेशों से बने केयर नेट व पिरूल के चेक डैम बनाकर क्षरण रोकने की कोशिश की गई। यह उस क्षेत्र में सफल भी रहा लेकिन वर्ष 2024 और 25 में बुग्याल के अन्य क्षेत्रों नहेटा सहित चिलपाड़ा आदि में सबसे अधिक भूस्खलन और भू-धंसाव देखने को मिला है।लगातार हो रहे भू-धंसाव के कारण बुग्याल क्षेत्र में बन रही खाई से बहने वाली मिट्टी पापड़गाड नदी में तबाही बनकर बह रहा है। नहेटा में घने जंगलों में भी भू-धंसाव व भूस्खलन के कारण वन संपदा क्षतिग्रस्त हो रही है। दूसरी ओर दयारा बुग्याल ट्रैक के मुख्य पड़ाव धियाणा, बरनाला, गोई आदि तोक के बुग्यालों में मैदानों ने बड़ी खाइयों का रूप ले लिया है।क्यारक के पूर्व प्रधान विपिन राणा का कहना है कि बुग्याल क्षेत्र में हो रहे भू-धंसाव का असर रैथल और क्यारक गांव सहित गंगोत्री हाईवे तक देखने को मिल रहा है। कई संपत्तियां इस कारण क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। बार्सू प्रधान का कहना है कि बरनाला क्षेत्र में भी भू-धंसाव व भूस्खलन तेजी से दिख रहा है। इसके लिए वन विभाग से दूरगामी योजना बनाने की मांग की गई है।लगातार हो रहे भू-धंसाव के कारण बुग्याल क्षेत्र में बन रही खाई से बहने वाली मिट्टी पापड़गाड नदी में तबाही बनकर बह रहा है। नहेटा में घने जंगलों में भी भू-धंसाव व भूस्खलन के कारण वन संपदा क्षतिग्रस्त हो रही है। दूसरी ओर दयारा बुग्याल ट्रैक के मुख्य पड़ाव धियाणा, बरनाला, गोई आदि तोक के बुग्यालों में मैदानों ने बड़ी खाइयों का रूप ले लिया है।क्यारक के पूर्व प्रधान का कहना है कि बुग्याल क्षेत्र में हो रहे भू-धंसाव का असर रैथल और क्यारक गांव सहित गंगोत्री हाईवे तक देखने को मिल रहा है। कई संपत्तियां इस कारण क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। बार्सू प्रधान दीपा रावत का कहना है कि बरनाला क्षेत्र में भी भू-धंसाव व भूस्खलन तेजी से दिख रहा है। इसके लिए वन विभाग से दूरगामी योजना बनाने की मांग की गई है।ऐसे में यहां फरवरी आखिर से अप्रैल तक शीतकालीन खेलों के आयोजन की भरपूर संभावनाएं रहती हैं। लेकिन, दयारा को रोपवे से जोडऩे की योजना के धरातल पर न उतरने और यहां शीतकाल के दौरान ठहरने की व्यवस्था न होने से हिम खेलों के शौकीनों को निराश होना पड़ रहा है। हैरत देखिए कि जिस पर्यटन विभाग को यह तमाम सुविधाएं उपलब्ध करानी थीं, वह तमाशाई बना बैठा है।उत्तरकाशी वन प्रभाग के डीएफओ का कहना है कि वन विभाग की ओर से लगातार जूट केयर नेट आदि के माध्यम से बुग्याल संरक्षण के लिए कार्य किया जा रहा है। पूर्व में वहां पर किया गया सुरक्षात्मक कार्य सफल रहा था। इसी तर्ज पर पर भारतीय वन्य जीव संस्थान और विशेषज्ञों के साथ मिलकर दयारा बुग्याल के संरक्षण के लिए विस्तृत योजना तैयार की जा रही है।  उत्तराखंड के ऊंचे पर्वतीय इलाकों की खूबसूरती और प्राकृतिक धरोहर माने जाने वाले बुग्याल अब खतरे में हैं. बदलते मौसम पैटर्न और अत्यधिक बारिश ने बुग्यालों पर असर डालना शुरू कर दिया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में बुग्याल केवल तस्वीरों और कहानियों तक ही सिमटकर रह जाएंगे.हाल ही में उत्तरकाशी जिले के धराली इलाके में एक बड़ा हादसा सामने आया. यहां गांव के ऊपर फैले बुग्यालों में लगातार बारिश और ग्लेशियर का पानी भरता रहा. नतीजा यह हुआ कि अचानक थोड़ी सी बारिश होते ही बुग्याल का हिस्सा टूटकर भारी मलबे के साथ नीचे आ गया. जिसने तबाही मचा दी. यह घटना केवल एक चेतावनी नहीं है बल्कि भविष्य का संकेत है कि अगर हालात नहीं बदले तो बुग्यालों की स्थिति और भयावह हो सकती है. अगर बुग्याल लगातार खत्म होते रहे तो इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा. इन मैदानों में मिलने वाली दुर्लभ औषधीय घास और जड़ी-बूटियां नष्ट हो जाएंगी. जिससे आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर भी असर पड़ेगा. इसके अलावा बुग्याल प्राकृतिक रूप से पानी का संतुलन बनाए रखते हैं. इनके कमजोर होने का असर सीधा जल स्रोतों और ग्लेशियरों पर पड़ेगा. जलवायु परिवर्तन क्लाइमेट चेंज और पहाड़ों पर लगातार बढ़ते विकास कार्य इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं. सड़कों का विस्तार, होटल और अन्य निर्माण कार्य बुग्यालों की कोमल जमीन पर दबाव डाल रहे हैं. जब इसके ऊपर बदलते मौसम की मार पड़ती है तो नतीजा तबाही के रूप में सामने आता है. उत्तराखंड के बुग्याल केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवनरेखा हैं. वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो बुग्याल खत्म हो जाएंगे. साथ ही पहाड़ों की पारिस्थितिकी भी असंतुलित हो जाएगी. । लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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