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विकास और समृद्धि को चुनौती देती पहाड़ की नाराज़गी

25/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड विषम पर्वतीय क्षेत्रों के विकास की जिस मूल अवधारणा को लेकर अलग उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया, 25 साल गुजरने पर भी वह अधूरा ही है। आमदनी और खुशहाली के मामले में पर्वतीय जिले फिसड्डी बने हुए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर से जुड़ी सुविधाएं पहाड़ चढ़ने के नाम पर हांफ रही हैं। अवैध खनन व अतिक्रमण तथा दिशाहीन निर्माण का शिकार हो रहे पहाड़ों पर भूस्खलन स्थलों की बढ़ती तादाद के कारणों पर वैज्ञानिक मंथन की जरूरत है। बहरहाल कुदरत के आक्रोश से उपजी आपदाओं से सबक लेना होगा, अन्यथा पहाड़ों का तल्ख मिजाज पूरी कायनात के लिए जुल्मत का दौर साबित होगा‘स्थावराणां हिमालय इस प्रसंग का उल्लेख श्रीमद्भागवदगीता के दशवें अध्याय के 25वें श्लोक में हुआ है। इसमें ‘श्रीकृष्ण’ ने कहा है कि ‘मैं स्थिर रहने वालों में हिमालय हूं’। सुखमय जीवन के लिए वेदों में हिमालय की आराधना का उल्लेख भी हुआ है। महाकवि कालीदास ने अपने महाकाव्य ‘कुमारसंभव’ में हिमालय को ‘धरती का मानदंड’ तथा ‘दुनिया की छत व आश्रय’ बताया था। अनादिकाल से पहाड़ आध्यात्मिक चेतना की पुण्यभूमि रहे हैं। प्रकृति के प्रबल उपासक रहे कई ऋषि मुनियों की तपोस्थली, भक्ति व अनुसंधान का केन्द्र पर्वतराज हिमालय ही रहा है। मगर बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं व अंधाधुंध निर्माण कार्य पहाड़ों की स्थिरता को चुनौती पेश कर रहे हैं। सैकड़ों धार्मिक स्थलों के अलावा कई वैदिक ऋषियों के सदियों पुराने आश्रम आज भी देवभूमि हिमाचल के पहाड़ों पर मौजूद हैं। पहाड़ खाली हो रहे हैं। पलायन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन जिम्मेदार केवल चिंता तक ही सीमित है। हालात यह हैं कि रोजगार के अभाव में युवाओं को मजबूरन पहाड़ से विदाई लेनी पड़ रही है। सरकार के पास पलायन को रोकने के लिए ठोस नीति नहीं है। जिसका खामियाजा पहाड़ को ही भुगतना पड़ रहा है। उत्तराखंड के पहाड़ों में विकास की रफ्तार पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है. सड़कें चौड़ी हो रही हैं. सुरंगों का निर्माण हो रहा है. रेल की पटरियां पहाड़ तक पहुंच रही हैं. जल विद्युत परियोजनाएं बन रही है. और चारधाम यात्रा के साथ पर्यटन का दबाव भी बढ़ रहा है. विकास की इन परियोजनाओं ने एक तरफ पहाड़ों की कनेक्टिविटी और आर्थिक गतिविधियों को गति दी है, पौराणिक ग्रंथों में ‘मरूतगणों’ को पहाड़ों का देवता कहा गया है। इसीलिए सनातन संस्कृति में पहाड़ों को आस्था की दृष्टि से देखा जाता है। जन्नत का एहसास कराने वाले पहाड़ों पर प्राकृतिक संसाधनों के अथाह भंडार मौजूद हैं। भागदौड़ भरी जीवनशैली में सुकून के लम्हें बिताने के लिए पर्यटकों का आकर्षण पहाड़ ही बनते हैं। अपनी सैकड़ों पारंपरिक संस्कृतियों को समेटे पहाड़ आध्यात्मिक मूल्यों, शांतिपूर्ण माहौल, स्वच्छ वातावरण तथा स्वस्थ जीवनशैली के लिए भी विख्यात हैं। कई प्रजातियों के वन्यजीवों व जंगली जानवरों का कुदरती आशियाना भी पहाड़ हैं। अपनी मजबूती व बुलंदी के लिए विख्यात पहाड़ों का सामरिक महत्त्व बेहद अहम है। देश रक्षा के मद्देनजर पहाड़ सरहदों के पास्बां बनकर एक मजबूत सेना व मुस्तैद सैनिक का किरदार भी अदा करते हैं। सन् 1962 की भारत-चीन जंग में हिमाचल के पहाड़ चीन की पेशकदमी के आगे अभेद्य रक्षा कवच बन गए थे। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई राष्ट्रीय राजमार्ग पर्वतीय क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं, लेकिन मौजूदा दौर में हिमालय की आगोश में बसे हिमाचल के पहाड़ों पर रंजो-गम की स्याही सूखने का नाम नहीं ले रही है। बीते कुछ वर्षों से भौतिकतावादी प्रवृत्ति तथा विकास का नकाब ओढ़ चुकी व्यवस्था की पहाड़ों के साथ एक जद्दोजहद चल रही है। आधुनिक मशीनीकरण के प्रहारों से पर्यावरण के दोहन के साथ प्राकृतिक संसाधनों का वजूद मिटाकर तथा बारूदी धमाकों से पहाड़ों को गिराकर निर्माण कार्यों में मशगूल व्यवस्था जब कुछ हद तक कामयाबी हासिल कर लेती है तो प्रकृति विनाश के उस खेल को चहुंमुखी विकास की संज्ञा दी जाती है। परन्तु प्रकृति जब विकराल रूप धारण करके पलटवार करती है तो व्यवस्थाओं की नाकामी तथा इनसानी गुस्ताखियों को छुपाने के लिए कुदरत के आक्रोश भरे परिणाम को प्राकृतिक आपदा कहा जाता है। पहाड़ों की खूबसूरती को इस आधुनिक विकास की नजर लग चुकी है। मशीनीकरण का यही आत्मघाती विकास पर्वतों के दरकने का नुक्ता-ए-आगाज साबित हो रहा है। हर दरकते पहाड़ की तहरीर एक अफसोसजनक अफसाना लिख रही है। पहाड़ हादसों की वजह बन रहे हैं। दूसरी तरफ लगातार सामने आ रही आपदाओं ने विकास के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.खास तौर पर गढ़वाल मंडल में पिछले सालों के दौरान सामने आई बड़ी घटनाओं का पैटर्न देखें तो केदारनाथ आपदा से लेकर चमोली की रैणी आपदा, जोशीमठ भू-धंसाव, सिलक्यारा सुरंग हादसा, धराली आपदा और हालिया चमोली पीपलकोटी टनल हादसा की घटना तक. ऐसे में अब बहस इस बात पर है कि क्या यह महज भौगोलिक संयोग है या फिर हिमालय की संवेदनशीलता के साथ बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप इसके पीछे का एक कारण है? जोशीमठ के स्थानीय समाजसेवी का कहना है कि, पिछले कुछ सालों में जिस तरह बड़ी विकास परियोजनाओं के आसपास आपदाओं और तकनीकी घटनाओं का सिलसिला दिखाई दे रहा है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अतुल सती के मुताबिक, तपोवन-विष्णुगाड परियोजना की सुरंग में अभी भी पानी का रिसाव हो रहा है. वर्ष 2009 में भी इस परियोजना की सुरंग में पानी का रिसाव हुआ था और लंबे समय बाद भी वहां पानी निकलने की समस्या बनी हुई है. वे सिलक्यारा सुरंग हादसे के साथ ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे परियोजना की सुरंगों में सामने आई घटनाओं का भी उल्लेख करते हैं. इसके अलावा ऑल वेदर रोड के अलग-अलग हिस्सों में भूस्खलन, सड़क धंसने और निर्माण क्षेत्र में जमीन खिसकने की घटनाएं भी चिंता बढ़ाती हैं. उत्तराखंड में पिछले दो दशकों के दौरान आई बड़ी आपदाओं को देखें तो गढ़वाल क्षेत्र की संवेदनशीलता साफ दिखाई देती है. वे 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की चमोली रैणी आपदा और उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में आई बड़ी आपदा का उदाहरण देते हैं. इसके अलावा, जोशीमठ का भू-धंसाव और सिलक्यारा सुरंग हादसा ऐसी घटनाएं हैं, जिन्होंने हिमालयी क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों और निर्माण को लेकर गंभीर चेतावनी दी है. उनके मुताबिक, हिमालय दुनिया के सबसे नए और कमजोर पर्वत क्षेत्रों में शामिल है. इसलिए यहां निर्माण की सामान्य मैदानी सोच लागू नहीं की जा सकती. एक तरफ हिमालय की प्राकृतिक संवेदनशीलता है और दूसरी तरफ इसी क्षेत्र में लगातार विकास परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है. गंगा, यमुना और अलकनंदा जैसी नदियों के बेसिन, चारधाम यात्रा, पर्यटन और सामरिक महत्व के कारण गढ़वाल में सड़क, सुरंग, जल विद्युत और अन्य परियोजनाओं का दबाव बढ़ रहा है. वे मानते हैं कि, इन परियोजनाओं से परिवहन और कनेक्टिविटी बेहतर हुई है, लेकिन सवाल यह है कि विकास की यह गति हिमालय की वहन क्षमता के अनुरूप है या नहीं. अगर विकास बेतरतीब तरीके से होगा तो उसका खामियाजा भी उसी क्षेत्र को भुगतना पड़ेगा.  हिमालय के साथ विकास की रफ्तार बढ़ाते समय उसकी सीमाओं को भी समझना होगा. अगर वैज्ञानिक अध्ययन, भूगर्भीय आकलन और क्षेत्र की धारण क्षमता को नजरअंदाज किया गया तो आने वाले समय में विकास परियोजनाएं खुद आपदा के जोखिम को बढ़ाने वाली साबित हो सकती हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास की कीमत चुका रहा है, या फिर विकास के तरीके पर अब नए सिरे से सोचने का वक्त आ गया है? विकास से प्रदेश की आर्थिकी को मजबूत किया जा सकता है। देश के कई शहर प्रदूषण व पेयजल समस्या से जूझ रहे हैं। निर्माण कार्यों में बरती जा रही लापरवाही से उपजी दुर्घटनाओं का खामियाजा आम लोग भुगत रहे हैं। भौतिक विकास के खुमार में प्रकृति के सिद्धांतों को नजरअंदाज करना आपदाओं को दावत साबित हो रहा है। लाखों आबादी की प्यास बुझाने वाली कई मुकद्दस नदियों का उद्गम स्थल भी हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में मौजूद है। कई पड़ोसी राज्यों को रौशन करने वाली पनबिजली परियोजनाएं हिमाचल के पहाड़ों पर चल रही हैं। सैकड़ों लोगों की आजीविका बन चुके पर्यटन उद्योग के अलावा पैराग्लाइडिंग, एडवेंचर व टै्रकिंग जैसी गतिविधियों का संचालन भी पहाड़ों पर होता है। देश के कुछ पर्यावरणविदों की कोशिशों से उत्तराखंड राज्य में नौ सितंबर 2010 को ‘हिमालय दिवस’ मनाने की शुरुआत हुई थी ताकि पहाड़ों के संरक्षण की जागरूकता के लिए लोगों का ध्यान आकर्षित किया जा सके। पहाड़ों की अहमियत को समझते हुए ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ ने ग्यारह दिसंबर का दिन ‘अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस’ के रूप में मुकर्रर किया है। पेड़-पौधे जंगल व बर्फ से ढकी हसीन वादियों, पहाड़ों का श्रृंगार होते हैं। मगर बेतरतीब तरीके से बढ़ रहा शहरीकरण, धुआं उगलते उद्योग तथा गगनचुंबी मीनारों का अंधाधुंध निर्माण विकास कार्यों का पैमाना बनकर पहाड़ों की जीनत बन रहे हैं। पहाड़ों पर पर्यटकों की भारी भीड़ के साथ बढ़ती आबादी का बोझ, भूस्खलन, सैलाब जैसी चुनौतियों के साथ इनसानी दखलअंदाजी से प्रकृति के हो रहे खिलवाड़ तथा अनियोजित विकास के कहर से पहाड़ बिखर रहे हैं। हाल ही में जोशीमठ के दरकते पहाड़ों की आपदा ने जो पैगाम दिया था, उसे भी गंभीरता से नहीं लिया गया। अत: पहाड़ों का दिलशाद चेहरा बिगाडऩे वाले अंधाधुंध विकास कार्यों पर पर्यावरणविदों की हिदायतों को अमल में लाना होगा। पहाड़ों पर निर्माण कार्यों की संगे बुनियाद से पूर्व भू-वैज्ञानिकों से गहन मशविरा होना चाहिए। पहाड़ों पर निवास करने वाले स्मस्त जीव-जन्तु व मानव सभ्यता की सुरक्षा के लिए आधुनिक विकास से पहले पहाड़ों का सुरक्षित रहना जरूरी है।स्मरण रहे इनसानी ऐब-ओ-हुनर को खामोशी से देखने वाली कुदरत अपने स्वाभिमान का नेतृत्व खुद करती है। प्रकृति अपने साथ हो रहे खिलवाड़ का एहतेजाज लफ्जों से नहीं करती, बल्कि एक निश्चित वक्त पर आईने की तरह चेहरे की कैफियत को पूरी तफसील से ब्यान करती है। विनाश को अंजाम देने वाले निर्माण कार्यों की सख्त मुखालफत होनी चाहिए। अवैध खनन व अतिक्रमण तथा दिशाहीन निर्माण का शिकार हो रहे पहाड़ों पर भूस्खलन स्थलों की बढ़ती तादाद के कारणों पर वैज्ञानिक मंथन की जरूरत है। बहरहाल कुदरत के आक्रोश से उपजी आपदाओं से सबक लेना होगा, अन्यथा अपने जमाल से पूरे ब्रह्मांड को अफरोज करने वाले पहाड़ों का तल्ख मिजाज पूरी कायनात के लिए जुल्मत का दौर साबित होगा। पर्वतीय क्षेत्रों में सुरक्षित जीवन जीने के लिए पहाड़ों को महफूज रखने की कवायद तेज करनी होगी। हर बरसात में पुलों व सडक़ों का सैलाब में बह जाना चिंताजनक विषय है। ऐसे में पहाड़ के युवा प्राकृतिक स्त्रोतों के पानी व यहां की हवा को बेचकर आर्थिकी मजबूत कर सकते हैं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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