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गायब’ बर्फ, बीता, दिसंबर वैज्ञानिक भी मौसमी बदलाव से हैरान

06/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के पहाड़ अब भी बर्फ की सफेद चादर के लिए तरस रहे हैं. विशेष रूप से 2500 मीटर से 3500 मीटर की ऊंचाई वाली चोटियों पर अब तक बर्फबारी नहीं हुई है, जबकि इससे ऊपरी इलाकों में केवल हल्की बर्फबारी ही दर्ज की गई है. हिमालयी क्षेत्रों में इस ‘बर्फ अकाल’ के कारण जलवायु में गंभीर बदलाव नजर आ रहे हैं. पिछले एक महीने की तस्वीरों ने चिंता और बढ़ा दी है, जहां ऊंचे पहाड़ बर्फविहीन और मटमैले दिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कड़ाके की ठंड के कारण नदी, झरने और तालाब जम चुके हैं.विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का तर्क है कि यह स्थिति मौसमी चक्र में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत है. न तो समय पर बारिश हो रही है और न ही बर्फबारी, यहां तक कि गर्मियों के आगमन का समय भी अब अनिश्चित हो गया है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल के बढ़ते तापमान को माना जा रहा है. बढ़ते तापमान की वजह से बर्फ को ग्लेशियरों पर जमने का पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है, और जो बर्फ जमीन पर गिरती भी है, वह ऊष्मा के कारण टिक नहीं पा रही है. यह स्थिति न केवल ग्लेशियरों के स्वास्थ्य के यह हाल सिर्फ केदारनाथ क्षेत्र का नहीं है, बल्कि गंगोत्री यमुनोत्री और बद्रीनाथ धाम क्षेत्र का भी है यहां पर इस समय तक यानी दिसंबर के महीने में बर्फ पड़ जाती थी. लेकिन बर्फ नहीं है और पहाड़ बिना बर्फ के सूखे दिख रहे हैं, क्योंकि चारों धाम जिसमें बद्रीनाथ केदारनाथ और गंगोत्री धाम लगभग 3000 मीटर से ऊपर का क्षेत्र है. वहां बर्फ नहीं दिख रही है. उत्तराखंड के सभी 3000 मीटर से ऊपरी इलाकों में दिसंबर के महीने में दो बार बर्फ जरूर पड़ जाती थी. यह सब जलवायु परिवर्तन और मौसमी चक्र के बदलाव का एक जीता जागता उदाहरण है.दिसंबर का महीना गुजरने को है और नया साल आने के लिए मुश्किल से 5 दिन गए हैं अब यह साल नवंबर और दिसंबर बिना बर्फ के गुजर जाएगा लोगों को उम्मीद है कि नए साल में बर्फ जरूर देखने को मिलेगी. लेकिन बर्फ का पड़ना, बारिश का ना होना. इसका सिर्फ पर्यावरण को नुकसान नहीं है, बल्कि इंसानों के साथ वन संपदा और वन्य जीव वन्य जंतुओं को भी इसका नुकसान आने वाले दिनों में हो सकता है. ऐसा फरवरी 2021 से पूर्व भी देखा गया था तब दिसंबर 2020 एवं जनवरी 2021 मे न्यूनतम बर्फबारी हुई थी और हैंगिग ग्ल्येशियर खिसकने से ऋषि गंगा मे भारी तबाही हुई थी।इस बार तो प्रायः देखा गया कि बर्फबारी को लेकर मौसम विभाग का पूर्वानुमान मे कुछ सटीक नहीं रहा, दिसंबर- जनवरी महीने मे ही अब तक कई बार मौसम विभाग ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों मे हिमपात का पूर्वानुमान जारी किया, खबर देख सुन पर्यटक पहाड़ों की ओर उमड़े भी लेकिन बर्फ का दीदार न कर पाने से मायूस भी दिखे, हालांकि ट्रैकिंग के शौकीन पर्यटकों ने विभिन्न ट्रैकिंग रुट्स पर पहुंचकर नए साल का जश्न मनाया।
बहरहाल समय पर बर्फबारी नहीं होने से पर्यटन व्यवसाय पर जो असर पड़ा सो पड़ा परन्तु इससे खेती किसानी को भी नुकसान ही हुआ है, सेब के पेड़ो को लगाने का सबसे उपयुक्त समय दिसंबर-जनवरी ही होता है, लेकिन बर्फबारी न होने के कारण काश्तकार यह नहीं कर सके।लेकिन इन सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि कम बर्फबारी का होना और समय समय पर नहीं होना क्या यह एवलांच का खतरा बन सकता है ?. यदि फरवरी 2021की ही बात करें तो उस वर्ष भी बर्फबारी भी बेहद कम हुई थी और ऋषि गंगा के ऊपर हैंगिग ग्ल्येशियर टूटने से रैणी से लेकर तपोवन तक भारी तबाही हुई थी, तब के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2020 मे साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित औली मे ही 12दिसंबर 2020को मात्र 5सेमी बर्फ गिरी थी और जनवरी 2021मे मात्र 6सेमी बर्फ गिरी थी।” ग्ल्येशियर वैज्ञानिक बताते हैं कि ग्लोवल वार्मिंग के कारण बर्फबारी का सिलसिला सिफ्ट हो रहा है और यह पिछले कई वर्षो से देखा जा रहा है, उन्होंने कहा कि स्थिर ग्ल्येशियर से ज्यादा हैगिंग ग्ल्येशियर खतरनाक होते हैं, ये बेहद सेंसटिव होते हैं, जल्दी बनते हैं और जल्दी खत्म भी होते हैं। देर से बर्फबारी होने पर हैंगिग ग्ल्येशियर के क्रेक होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है “।यूँ तो हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं मे असंख्य हैंगिग ग्ल्येशियर हो सकते हैं परन्तु पड़ताल उन हैंगिग ग्ल्येशियर की होनी ही चाहिए जिनके तलहटी के आस पास बसागत हो ताकि ऋषि गंगा की तरह किसी हैंगिग ग्ल्येशियर के मूवमेंट पर नुकसान को कम से कम किया जा सके। दरअसल, उत्तराखंड के पहाड़ों और केदारनाथ-बदरीनाथ धाम में अब तक बर्फबारी न होने से चिंता बढ़ गई है. औली में इस वक्त बर्फ की चादरें बिछी होती थीं, मगर इस बार नजारा ऐसा नहीं हैं. नववर्ष पर सैलानी उमड़े हैं लेकिन बर्फ न होने से पर्यटक थोड़े मायूस हैं. स्थानीय कारोबार को भी बर्फ का इंतजार है. बर्फबारी होती है तो टूरिस्ट खींचे चले आते हैं. उधर चंबा में दिसंबर में बारिश और बर्फबारी होती है. मगर इस बार ऐसा नहीं होने से किसान और बागवानी करने वाले चिंतित हैं. पर्यटन कारोबारी भी निराश चल रहे हैं. पहली बार बर्फ गायब हो गयी जिससे लोग अचरज में पड़ गए।है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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