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हर साल आपदा से बड़ा नुकसान होता है. प्रदेश के कई गांव आज भी विस्थापन की बाट जोह रहे हैं.

07/09/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में मानसून के दौरान अक्सर विस्थापन, पुनर्वास को लेकर सवाल उठने लगते हैं. लेकिन मानसून सीजन के समाप्त होने के बाद विस्थापन, पुनर्वास की चर्चाएं फाइलों में बंद हो जाती है. उत्तराखंड, आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है. यही वजह है कि वैज्ञानिकों समेत तमाम सामाजिक संगठनों की ओर से पुनर्वास पर जोर दिया जाता रहा है, लेकिन आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से इस पर ठोस निर्णय नहीं हो पाया है.राज्य में हर साल मानसून सीजन के दौरान भीषण आपदाओं का दंश झेलना पड़ता है. जिससे न सिर्फ जान माल को काफी अधिक नुकसान पहुंचता है, बल्कि सैकड़ों परिवार प्रभावित होते हैं. जिसके चलते संवेदनशील/ अति संवेदनशील क्षेत्रों में बसे लोगों का विस्थापन, पुनर्वास किया जाता है. ताकि उनको किसी सुरक्षित स्थान पर बसाया जा सके. इसके लिए जिलाधिकारी के स्तर से प्रभावित परिवारों को बसाया जाता है. लेकिन लंबे से सैकड़ों परिवार ऐसे हैं, जिनका अभी तक विस्थापन, पुनर्वास नहीं हो पाया है.उत्तराखंड में मानसून के दौरान अक्सर विस्थापन, पुनर्वास को लेकर सवाल उठने लगते हैं. लेकिन मानसून सीजन के समाप्त होने के बाद विस्थापन, पुनर्वास की चर्चाएं फाइलों में बंद हो जाती है. उत्तराखंड, आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है. यही वजह है कि वैज्ञानिकों समेत तमाम सामाजिक संगठनों की ओर से पुनर्वास पर जोर दिया जाता रहा है, लेकिन आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से इस पर ठोस निर्णय नहीं हो पाया है.राज्य में हर साल मानसून सीजन के दौरान भीषण आपदाओं का दंश झेलना पड़ता है. जिससे न सिर्फ जान माल को काफी अधिक नुकसान पहुंचता है, बल्कि सैकड़ों परिवार प्रभावित होते हैं. जिसके चलते संवेदनशील/ अति संवेदनशील क्षेत्रों में बसे लोगों का विस्थापन, पुनर्वास किया जाता है. ताकि उनको किसी सुरक्षित स्थान पर बसाया जा सके. इसके लिए जिलाधिकारी के स्तर से प्रभावित परिवारों को बसाया जाता है. लेकिन लंबे से सैकड़ों परिवार ऐसे हैं, जिनका अभी तक विस्थापन, पुनर्वास नहीं हो पाया है. हालांकि, इसके पीछे सरकारी प्रक्रिया के साथ ही लोगों का सामाजिक ताना बाना भी है. आपदा प्रबंधन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, प्रदेश के 270 गांव यानी 3744 परिवारों को विस्थापन की श्रेणी में रखा गया है. जिसमें से साल 2012 से 11 फरवरी 2026 तक 236 गांव यानी 2904 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है. जिसके चलते 128 करोड़ 98 लाख 32 हजार 817 रुपए खर्च हो चुके हैं. वहीं, अभी भी 34 गांव यानी 843 परिवारों का विस्थापन नहीं हो पाया है. इसके अलावा, आपदा की वजह से समय समय पर नए गांव भी जोड़ते रहे हैं, जिनको विस्थापित करने की जरूरत है. आंकड़ों के अनुसार, 28 गांव यानी 207 परिवार ऐसे हैं, जो विस्थापन की श्रेणी में नए जुड़े हैं, जिनको विस्थापित किया जाना बाकी है. ऐसे में कुल 62 गांव यानी 1050 परिवारों को विस्थापित किया जाना बाकी है. आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव ने कहा कि विस्थापन में एक समस्या लोगों से जुड़ी हुई भी आती है. क्योंकि जहां लोग रहते हैं, उनकी जड़े और समाजिक ताना बाना वहां से जुड़ा होता है. यही वजह है कि लोग वहां से जाना नहीं चाहते है. लोग चाहते है कि वो जहां रह रहे हैं, उसके आसपास ही रहे, ताकि उनका सांस्कृतिक संबंध और लोगों से समन्वय बना रहे, जो विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसका रास्ता निकाला जा रहा है. साथ ही बताया कि किसी क्षेत्र के आबादी को खतरा होता है तो सबसे पहले सुरक्षात्मक काम को किया जाता है. लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मिटिगेशन के काम कराए जाने के बाद भी आबादी को खतरा बना रहता है तो फिर विस्थापन की कार्रवाई की जाती है. आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव ने कहा कि विस्थापन में एक समस्या लोगों से जुड़ी हुई भी आती है. क्योंकि जहां लोग रहते हैं, उनकी जड़े और समाजिक ताना बाना वहां से जुड़ा होता है. यही वजह है कि लोग वहां से जाना नहीं चाहते है. लोग चाहते है कि वो जहां रह रहे हैं, उसके आसपास ही रहे, ताकि उनका सांस्कृतिक संबंध और लोगों से समन्वय बना रहे, जो विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसका रास्ता निकाला जा रहा है. साथ ही बताया कि किसी क्षेत्र के आबादी को खतरा होता है तो सबसे पहले सुरक्षात्मक काम को किया जाता है. लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मिटिगेशन के काम कराए जाने के बाद भी आबादी को खतरा बना रहता है तो फिर विस्थापन की कार्रवाई की जाती है. आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव ने कहा कि विस्थापन में एक समस्या लोगों से जुड़ी हुई भी आती है. क्योंकि जहां लोग रहते हैं, उनकी जड़े और समाजिक ताना बाना वहां से जुड़ा होता है. यही वजह है कि लोग वहां से जाना नहीं चाहते है. लोग चाहते है कि वो जहां रह रहे हैं, उसके आसपास ही रहे, ताकि उनका सांस्कृतिक संबंध और लोगों से समन्वय बना रहे, जो विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसका रास्ता निकाला जा रहा है. साथ ही बताया कि किसी क्षेत्र के आबादी को खतरा होता है तो सबसे पहले सुरक्षात्मक काम को किया जाता है. लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मिटिगेशन के काम कराए जाने के बाद भी आबादी को खतरा बना रहता है तो फिर विस्थापन की कार्रवाई की जाती है. आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव ने कहा कि विस्थापन में एक समस्या लोगों से जुड़ी हुई भी आती है. क्योंकि जहां लोग रहते हैं, उनकी जड़े और समाजिक ताना बाना वहां से जुड़ा होता है. यही वजह है कि लोग वहां से जाना नहीं चाहते है. लोग चाहते है कि वो जहां रह रहे हैं, उसके आसपास ही रहे, ताकि उनका सांस्कृतिक संबंध और लोगों से समन्वय बना रहे, जो विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसका रास्ता निकाला जा रहा है. साथ ही बताया कि किसी क्षेत्र के आबादी को खतरा होता है तो सबसे पहले सुरक्षात्मक काम को किया जाता है. लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मिटिगेशन के काम कराए जाने के बाद भी आबादी को खतरा बना रहता है तो फिर विस्थापन की कार्रवाई की जाती है. आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव ने कहा कि विस्थापन में एक समस्या लोगों से जुड़ी हुई भी आती है. क्योंकि जहां लोग रहते हैं, उनकी जड़े और समाजिक ताना बाना वहां से जुड़ा होता है. यही वजह है कि लोग वहां से जाना नहीं चाहते है. लोग चाहते है कि वो जहां रह रहे हैं, उसके आसपास ही रहे, ताकि उनका सांस्कृतिक संबंध और लोगों से समन्वय बना रहे, जो विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसका रास्ता निकाला जा रहा है. साथ ही बताया कि किसी क्षेत्र के आबादी को खतरा होता है तो सबसे पहले सुरक्षात्मक काम को किया जाता है. लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मिटिगेशन के काम कराए जाने के बाद भी आबादी को खतरा बना रहता है तो फिर विस्थापन की कार्रवाई की जाती है. आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव ने कहा कि विस्थापन में एक समस्या लोगों से जुड़ी हुई भी आती है. क्योंकि जहां लोग रहते हैं, उनकी जड़े और समाजिक ताना बाना वहां से जुड़ा होता है. यही वजह है कि लोग वहां से जाना नहीं चाहते है. लोग चाहते है कि वो जहां रह रहे हैं, उसके आसपास ही रहे, ताकि उनका सांस्कृतिक संबंध और लोगों से समन्वय बना रहे, जो विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसका रास्ता निकाला जा रहा है. साथ ही बताया कि किसी क्षेत्र के आबादी को खतरा होता है तो सबसे पहले सुरक्षात्मक काम को किया जाता है. लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मिटिगेशन के काम कराए जाने के बाद भी आबादी को खतरा बना रहता है तो फिर विस्थापन की कार्रवाई की जाती है. लेकिन आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से इस पर ठोस निर्णय नहीं हो पाया है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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