डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
एशिया का सबसे बड़ा एप्पल गार्डन अल्मोड़ा जिले में हैरानी खेत उपमंडल बागवानी के लिहाज से बेहद उर्वर है। तत्कालीन पर्वतीय विकास मंत्री गोविंद सिंह माहरा व नित्यानंद कांडपाल ने उद्यान निदेशालय व अनुसंधान केंद्र को लखनऊ से चौबटिया स्थापित कराने के लिए संघर्ष किया। ताकि सेब उत्पादन को पहाड़ की आर्थिकी से जोड़ स्वरोजगार मुहैया कराया जा सके। 1955-56 में चौबटिया में उद्यान निदेशालय ने मूर्तरूप ले भी लिया। फिल्मकारों को भी यह एप्पल गार्डन भाने लगा। अविभाजित उत्तर प्रदेश तक हालात अपेक्षाकृत ठीक रहे। अल्मोड़ा जिले के चौबटिया में करीब 235 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला सेब का बागान एशिया का सबसे बड़ा एप्पल गार्डन है। लेकिन विभागीय अधिकारियों की उपेक्षा और अनदेखी के कारण साल दर साल इस बागान का उत्पादन लगातार गिरता गया। नतीजा आज इसके अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है। अब बागान को पुनर्जीवित करने के बजाय शासन की मंशा इसे अनुसंधान केंद्र बनाने पर है। यह सब कुछ तब हुआ जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक रीढ़ बागवानी और इसके विकास की तमाम संभावनाओं के देखते हुए उद्यान निदेशालय को लखनऊ के बजाय रानीखेत में स्थापित किया गया था।चौबटिया गार्डन का सेब उत्पादन क्षेत्र घटकर अब 106.91 हेक्टेयर रह गया है। उसमें भी मात्र 60.20 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सेब उत्पादन किया जा रहा है। एक दौर था जब 235 हेक्टेयर में विभिन्न प्रजातियों के पेड़ सीजन में 500 कुंतल से ज्यादा सेब की पैदावार देते थे। वर्तमान में यहां फल वृक्ष तो लगभग 17 हजार हैं मगर उत्पादन खिसक कर 20 से 30 कुंतल के बीच ही सिमट गया है।उत्तराखंड में, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, चमोली और नैनीताल जैसे जिले सेब उत्पादन की रीढ़ हैं, जिनमें उत्तरकाशी सबसे आगे है। लेकिन नैनीताल जिले के मध्य पहाड़ी क्षेत्र रामगढ़-मुक्तेश्वर में, जो 1,400-2,400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां कभी सेब की खेती खूब फलती-फूलती थी, अब किसान धीमी गति से लेकिन लगातार गिरावट की बात कर रहे हैं।उत्तराखंड में, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, चमोली और नैनीताल जैसे जिले सेब उत्पादन की रीढ़ हैं, जिनमें उत्तरकाशी सबसे आगे है। लेकिन नैनीताल जिले के मध्य पहाड़ी क्षेत्र रामगढ़-मुक्तेश्वर में, जो 1,400-2,400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां कभी सेब की खेती खूब फलती-फूलती थी, अब किसान धीमी गति से लेकिन लगातार गिरावट की बात कर रहे हैं।उत्तराखंड में, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, चमोली और नैनीताल जैसे जिले सेब उत्पादन की रीढ़ हैं, उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित रामगढ़, जिसे कभी “फलों की टोकरी” कहा जाता था, आज सेब उत्पादन के क्षेत्र में अपनी पहचान खोता जा रहा है. एक समय था जब यहां के सेब मिठास और रंगत के कारण देशभर के बाजारों में छाए रहते थे. लेकिन अब हिमाचल और कश्मीर के सेब के मुकाबले यह पीछे छूट गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह तकनीकी रूप से पिछड़ापन, सरकारी स्तर पर उपेक्षा और बाज़ार तक पहुंच की कमी है.जहां हिमाचल और कश्मीर में हाई डेंसिटी पौधारोपण, कोल्ड स्टोरेज की सुविधा और किसानों को सरकारी सब्सिडी मिल रही है, वहीं रामगढ़ के किसान अब भी पारंपरिक खेती पर निर्भर हैं. साथ ही मौसम में हो रहे बदलाव, असमान बारिश और बर्फबारी ने सेब की फसल को नुकसान पहुंचाया है. जिनमें उत्तरकाशी सबसे आगे है। लेकिन नैनीताल जिले के मध्य पहाड़ी क्षेत्र रामगढ़-मुक्तेश्वर में, जो 1,400-2,400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां कभी सेब की खेती खूब फलती-फूलती थी, अब किसान धीमी गति से लेकिन लगातार गिरावट की बात कर रहे हैं।फसल कटाई के चरण में, किसानों को एक और तरह की असुरक्षा का सामना करना पड़ता है: बाजार तक पहुंच।स्थानीय भंडारण और प्रसंस्करण अवसंरचना के अभाव के कारण किसानों को बिचौलियों पर अत्यधिक निर्भर रहना पड़ता है। छोटे किसान अक्सर अपनी उपज को कटाई से पहले ही ठेकेदारों को बेच देते हैं, जबकि बड़े उत्पादक कमीशन आधारित बाजारों में अपना काम करते हैं।सतबुंगा गांव के चंदन सिंह गौर कहते हैं, ‘शीत भंडारण या सीधे बाजार संपर्क के बिना, हम यह नियंत्रित नहीं कर सकते कि कब और कहां बेचना है।’यह निर्भरता सौदेबाजी की शक्ति को कमजोर करती है, जिससे किसानों को अक्सर कम कीमत स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। परिणामस्वरूप, मूल्य उत्पादकों से दूर होकर व्यापारियों की ओर चला जाता है।जलवायु और बाज़ार के अलावा, एक और बदलाव हो रहा है। युवा पीढ़ी अधिक स्थिर आजीविका की तलाश में कृषि से दूर जा रही है। इसके चलते बागों के प्रबंधन के लिए आवश्यक पारंपरिक ज्ञान में गिरावट आई है।परिणामस्वरूप, कई बागों का या तो ठीक से रखरखाव नहीं किया जाता है या उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया जाता है, जिससे इस क्षेत्र में सेब की खेती के दीर्घकालिक भविष्य के बारे में चिंताएं बढ़ जाती हैं।जलवायु और बाज़ार के अलावा, एक और बदलाव हो रहा है। युवा पीढ़ी अधिक स्थिर आजीविका की तलाश में कृषि से दूर जा रही है। इसके चलते बागों के प्रबंधन के लिए आवश्यक पारंपरिक ज्ञान में गिरावट आई है।परिणामस्वरूप, कई बागों का या तो ठीक से रखरखाव नहीं किया जाता है या उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया जाता है, जिससे इस क्षेत्र में सेब की खेती के दीर्घकालिक भविष्य के बारे में चिंताएं बढ़ जाती हैं।जलवायु और बाज़ार के अलावा, एक और बदलाव हो रहा है। युवा पीढ़ी अधिक स्थिर आजीविका की तलाश में कृषि से दूर जा रही है। इसके चलते बागों के प्रबंधन के लिए आवश्यक पारंपरिक ज्ञान में गिरावट आई है।मौसम की मार से उत्तराखंड में सेब की पैदावार के साथ गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। मंडी में स्थानीय सेब की आवक पिछले साल के मुकाबले 70 फीसदी तक घट गई है। त्यूणी और मोरी क्षेत्र से आ रहा अधिकांश सेब काला पड़ रहा है। थोक में इसके दाम महज 60 से 70 रुपये किलो हैं, जबकि हिमाचल के अच्छे सेब के थोक में 120 से 130 रुपये तक मिल रहे हैं।मंडी में करीब दो सप्ताह पहले से सेब पहुंचना शुरू हुआ था। पहले हिमाचल और फिर मोरी (उत्तरकाशी) व त्यूणी (देहरादून) का सेब आया। शुरुआत में स्थानीय सेब 80 से 90 रुपये किलो बिका, लेकिन खराब गुणवत्ता वाली फसल आने के बाद भाव गिर गए। फल कारोबारी असगर के अनुसार, स्थानीय सेब के दाम गिरने की मुख्य वजह गुणवत्ता खराब होना है।परिणामस्वरूप, कई बागों का या तो ठीक से रखरखाव नहीं किया जाता है या उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया जाता है, जिससे इस क्षेत्र में सेब की खेती के दीर्घकालिक भविष्य के बारे में चिंताएं बढ़ जाती हैं।मौसम में बदलाव ने जिले के सेब बागवानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। सबसे अधिक उत्पादन वाले मोरी में इस वर्ष सेब का उत्पादन 16 हजार मीट्रिक टन से घटकर महज तीन से साढ़े तीन हजार मीट्रिक टन रह गया है। पुरोला और नौगांव में भी सामान्य उत्पादन का सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही सेब हो पाया। जिले की यमुना घाटी में मोरी, पुरोला और नौगांव तथा गंगा घाटी के हर्षिल क्षेत्र में करीब 25 से 30 हजार मीट्रिक टन सेब उत्पादन होता है। यमुना घाटी में अगस्त तक और हर्षिल में सितंबर-अक्टूबर में तुड़ान होती है। पुरोला और नौगांव में सामान्य उत्पादन आठ से नौ हजार मीट्रिक टन रहता है। बागवान ने बताया कि मार्च-अप्रैल में फ्लावरिंग के दौरान बारिश से फल सेट नहीं हो पाया। बाद में ओलावृष्टि ने बचे सेब को भी नुकसान पहुंचाया। 600 पेटी तक उत्पादन लेने वाले बागवान इस बार 60 से 100 पेटी पर सिमट गए। हालांकि मंडियों में दाम सही मिलने से कुछ राहत मिली। मोरी के उद्यान अधिकारी ने बताया कि लगातार मौसम परिवर्तन के कारण इस वर्ष क्षेत्र में उत्पादन तीन से साढ़े तीन हजार मीट्रिक टन रह गया। अत्यधिक ओलावृष्टि ने इस साल ज्योतिर्मठ क्षेत्र के सेब उत्पादन को आधा कर दिया। पेड़ों पर बचे अधिकांश सेब दागदार हैं, जिससे काश्तकारों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। सुनील, औली, परसारी, मेरग, बड़ागांव, उर्गम, सलूड़ सहित नीती घाटी के कई गांवों में सेब उत्पादन होता है। पिछले साल क्षेत्र में 300 मीट्रिक टन सेब हुआ था, जो इस वर्ष घटकर 150 मीट्रिक टन रह गया। मार्च-अप्रैल में हुई भारी ओलावृष्टि से ज्यादातर सेब झड़ गए। जो बचे, उन पर दाग पड़ गए। काश्तकार ने बताया कि उत्पादन कम होने के साथ गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। दाग वाले सेब का दाम कम मिलता है, जिससे काश्तकारों में मायूसी है। अल्मोड़ा जिले के चौबटिया में आज पूरा सेब बागान बर्बादी की कगार पर है। जरूरत है नए सिरे से नई सोच व इच्छाशक्ति के साथ बागान को दोबारा विकसित करने की। ताकि इसका वजूद बचाया जा सके। तंत्र को इस दिशा में गंभीरता से काम करने की जरूरत है। वहीं उद्यान विशेषज्ञ का कहना है कि चौबटिया गार्डन को नए सिरे विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए ठोस प्लान बनाने की जरूरत होगी। सेब बागान का गौरव अब इतिहास बनने की दहलीज पर है। उस पर रोने पीटने से कुछ नहीं होगा। नए रूप में विकसित करने के लिए दृढ़संकल्प व इच्छा शक्ति की जरूरत है। राज्य में भले ही सेब अपनी स्थापना की 170 साल पूरे करने जा रहा है, लेकिन किसी भी सरकारों ने सेब बागवानों के लिए ठोस नीति नहीं बनाई. आज भी उत्तराखंड का सेब बागवान हिमाचल के ब्रांड से अपने सेबों को बाजारों में बेचने को मजबूर है. हिमाचल की पेटियों में सेब होने से उत्तराखंडी सेब को पहचान नहीं मिल पा रही है. लगातार मांग के बावजूद बागवानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है. उत्तराखंड के सेब बागवान वर्षभर कड़ी मेहनत के बाद सेब की फसल तैयार करते हैं.फसल तैयार होने के बाद सेब को समय से मंडियों तक पहुंचाने की जुगत में लगे रहते हैं. सरकारी उपेक्षा के चलते रवांईघाटी के सेब बागवानों को पहले तो सेब के पेड़ों व सेब को बीमारी से बचाने के लिए दवाइयों की व्यवस्था नहीं हो पाती है और बाद में जब किसान किसी तरह सेब की फसल तैयार कर मंडियों तक पहुंचाना चाहते हैं तो उन्हें समय से पेटियां भी उपलब्ध नहीं हो पाती हैं.राज्य में भले ही सेब अपनी स्थापना की 170 साल पूरे करने जा रहा है, लेकिन किसी भी सरकारों ने सेब बागवानों के लिए ठोस नीति नहीं बनाई. आज भी उत्तराखंड का सेब बागवान हिमाचल के ब्रांड से अपने सेबों को बाजारों में बेचने को मजबूर है. हिमाचल की पेटियों में सेब होने से उत्तराखंडी सेब को पहचान नहीं मिल पा रही है. लगातार मांग के बावजूद बागवानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है. उत्तराखंड के सेब बागवान वर्षभर कड़ी मेहनत के बाद सेब की फसल तैयार करते हैं.फसल तैयार होने के बाद सेब को समय से मंडियों तक पहुंचाने की जुगत में लगे रहते हैं. सरकारी उपेक्षा के चलते रवांईघाटी के सेब बागवानों को पहले तो सेब के पेड़ों व सेब को बीमारी से बचाने के लिए दवाइयों की व्यवस्था नहीं हो पाती है और बाद में जब किसान किसी तरह सेब की फसल तैयार कर मंडियों तक पहुंचाना चाहते हैं तो उन्हें समय से पेटियां भी उपलब्ध नहीं हो पाती हैं. रामगढ़ का पारंपरिक सेब जैसे फैनी और डेलिशियस कभी बेहद लोकप्रिय हुआ करता था. लेकिन सरकारी उपेक्षा और विपणन तंत्र की कमी के कारण इसकी पहचान धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. उन्होंने कहा कि अब वक्त है जब सरकार को चाहिए कि वह इस क्षेत्र में आधुनिक बीज, खाद, तकनीकी प्रशिक्षण और बेहतर विपणन व्यवस्था की सुविधा दे. अगर यही स्थिति बनी रही तो रामगढ़ का सेब सिर्फ किताबों और कहानियों में रह जाएगा.सरकार को चाहिए कि वह कोल्ड स्टोरेज और फल मंडियों की संख्या बढ़ाए. साथ ही किसानों को उन्नत किस्मों की खेती के लिए प्रोत्साहन और मदद दी जाए. तभी रामगढ़ की पहचान दोबारा कायम हो सकेगी. पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में शोध करने वाले संगठन ‘क्लाइमेट ट्रेंडस’ द्वारा किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि प्रमुख फलों के उत्पादन और उन्हें उगाए जाने वाले क्षेत्र में काफी कमी आयी है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











