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लालढांग-चिलरखाल वन मोटर मार्ग!

07/09/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
वर्ष 1992 में सरकार ने इस सड़क को आम यातायात के लिए खोलने के लिए उत्तर प्रदेश शासनकाल में 92 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। पर्यावरणविदों ने विरोध किया तो कंडी रोड का नया रोडमैप जारी कर दिया गया, जिसके तहत 138 किलोमीटर लंबी इस सड़क का 95 किलोमीटर हिस्सा उत्तर प्रदेश में चला गया। वर्ष 2006 में क्षेत्रीय जनता ने आंदोलन शुरू किया व रामनगर-कालागढ़-कोटद्वार मार्ग संयुक्त संघर्ष समिति अस्तित्व में आई व आंदोलन शुरू कर दिया। इसके बाद केंद्र ने वन क्षेत्र से गुजरने वाले हिस्से में एलीवेटेड रोड बनाने का सुझाव दिया। वर्ष 2009-10 में इस सड़क पर लालढांग-चिलरखाल के मध्य डामरीकरण की कवायद शुरू हुई। दो चरणों में होने वाले इस कार्य के प्रथम चरण में करीब पौने छह करोड़ की धनराशि से सड़क पर मिट्टी-पत्थर का भरान कर सड़क का बेस बना दिया। द्वितीय चरण में लोनिवि सड़क पर डामर बिछाता, वन महकमे ने सड़क हस्तांतरण में यह कहते हुए आपत्ति लगा दी कि भारत सरकार की अनुमति के बगैर डामर नहीं बिछ सकता। वर्तमान में सड़क पूरी तरह बंद पड़ी हुई है। पूर्ववर्ती शासनकाल में इस मार्ग को ऐलीवेटेड बनाने का प्रस्ताव तैयार हुआ, जिसकी डीपीआर तैयार करने के नाम पर एक निजी संस्था को मोटी धनराशि दी गई, लेकिन नतीजा शून्य रहा।यह सड़क कोटद्वार क्षेत्र को सीधे लालढांग से जोड़ती है. जो हरिद्वार व मैदानी इलाकों तक पहुंच को सुगम बनाती है. वर्तमान में लोगों को लंबा और घुमावदार रास्ता तय करना पड़ता है, जिससे समय और ईंधन दोनों की अतिरिक्त खपत होती है. बरसात के मौसम में स्थिति और ज्यादा गंभीर हो जाती है, जब वैकल्पिक मार्गों पर भूस्खलन और जलभराव की समस्या होती है.स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों की ओर से लंबे समय से इस सड़क को ऑल वेदर रोड के रूप में विकसित करने की मांग की जा रही थी. ग्रामीणों का कहना था कि सड़क के अभाव में स्वास्थ्य सेवाओं, उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों तक पहुंच प्रभावित होती है. आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. इस निर्णय से करीब 18 गांवों और 40 हजार से ज्यादा की आबादी को सीधा लाभ मिलेगा. सड़क निर्माण पूरा होने के बाद क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा. कृषि और दुग्ध उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में आसानी होगी. पर्यटन की संभावनाएं भी मजबूत होंगी. साथ ही छात्रों को स्कूल और कॉलेज तक सुरक्षित व नियमित आवागमन की सुविधा मिलेगी.राजनीतिक दृष्टि से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह मामला लंबे समय से जनभावनाओं से जुड़ा रहा है. राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन अब वन स्वीकृतियों से जुड़े बाकी प्रक्रियात्मक पहलुओं को जल्द पूरा कर निर्माण कार्य को गति देने की तैयारी में हैं.सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को क्षेत्र के लिए मील का पत्थर माना जा रहा है. उम्मीद की जा रही है कि निर्धारित मानकों और पर्यावरणीय नियमों का पालन करते हुए सड़क निर्माण कार्य जल्द ही पूरा किया जाएगा, जिससे पहाड़ और मैदान के बीच संपर्क और ज्यादा मजबूत हो सकेगा. लालढांग और चिल्लरखाल क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों को सीधा फायदा मिलेगा। लोगों को लंबा रास्ता तय नहीं करना पड़ेगा, जिससे समय और ईंधन दोनों की बचत होगी। साथ ही आपातकालीन सेवाओं जैसे एम्बुलेंस और राहत कार्यों में भी तेजी आएगी।स्थानीय लोगों का मानना है कि यह सड़क क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। वर्षों से इस मार्ग की मांग उठती रही है और अब न्यायालय के फैसले के बाद लोगों की उम्मीदें हकीकत में बदलती नजर आ रही हैं।अब सभी की नजरें प्रशासन और संबंधित विभागों पर हैं कि निर्माण कार्य कब शुरू होता है और कितनी तेजी से पूरा किया जाता है। क्षेत्र की जनता को उम्मीद है कि यह मोटर मार्ग जल्द ही जमीन पर दिखाई देगा और आने वाले समय में कोटद्वार के विकास की नई कहानी लिखेगा।उत्तराखंड के बहुप्रतीक्षित लालढांग-चिल्लरखाल मोटर मार्ग निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने इस सड़क निर्माण पर लगी रोक को हटा दी है. सुनवाई के दौरान गढ़वाल सांसद ने इंटरवेंशन एप्लीकेशन दायर कर पक्ष रखा. जबकि, नई दिल्ली से सांसद ने उनके वकील के रूप में अदालत में प्रभावी पैरवी की. अदालत के सकारात्मक आदेश के बाद अब लंबे समय से अटकी इस परियोजना का रास्ता साफ हो गया है. ऐतिहासिक और पर्यटन दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह वाइल्ड लाइफ व साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देगा। साथ ही क्षेत्र के सुलताना भांडू, कण्वाश्रम, महाबगढ़ व मालिनी नदी घाटी सभ्यता तक पर्यटकों की आसान पहुँच सुनिश्चित करेगा।सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को क्षेत्र के लिए मील का पत्थर माना जा रहा है. उम्मीद की जा रही है कि निर्धारित मानकों और पर्यावरणीय नियमों का पालन करते हुए सड़क निर्माण कार्य जल्द ही पूरा किया जाएगा, जिससे पहाड़ और मैदान के बीच संपर्क और ज्यादा मजबूत हो सकेगा. सड़क के महत्व की बात करें, तो यह सड़क गढ़वाल-कुमाऊं को प्रदेश की सीमा के भीतर ही आपस में जोड़ने वाली एकमात्र सड़क है। वर्तमान में हरिद्वार से रामनगर तक पहुंचने के लिए यात्रियों को करीब 186 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर तय करना पड़ता है, लेकिन कंडी रोड निर्माण से यह दूरी घटकर 106 किलोमीटर रह जाएगी। साथ ही वाहन चालकों को उत्तर प्रदेश की विभिन्न चेकपोस्टों पर लिए जाने वाले ‘सेवा कर’ की मार भी नहीं पड़ेगी। इतना ही नहीं, सड़क निर्माण के बाद चार धाम यात्रा को वन-वे करने में इस सड़क की अहम भूमिका हो सकती है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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