डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
नेपाल में आई भीषण आपदा के बाद अब उत्तराखंड सरकार भी ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों को लेकर पूरी तरह से अलर्ट नजर आ रही है. ताकि भविष्य की संभावित आपदा के खतरों से बचा जा सके. ऐसे में उत्तराखंड सरकार प्रदेश में मौजूद अति संवेदनशील और संवेदनशील जिलों का सर्वे करा कर वहां पर इक्विपमेंट लगाए जाने पर जोर दे रही है.इसका मकसद है कि भविष्य में अगर झील टूटती हैं या फिर उनमें कुछ गतिविधि होती है, तो उस दौरान उससे प्रभावित होने वाले लोगों को अलर्ट किया जा सके. वैज्ञानिक झील ही नहीं बल्कि झील समेत तीन स्थानों पर इक्विपमेंट लगाए जाने पर जोर दे रहे हैं. ताकि किसी भी आपदा के दौरान बेहतर और सटीक जानकारी मिल सके. उत्तराखंड में सैकड़ों की संख्या में ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं. इनमें से 426 ग्लेशियर झील ऐसी हैं, जिनका आकार 1000 वर्ग मीटर से बड़ा है. लेकिन वर्तमान समय में 13 ग्लेशियर लेक ऐसी हैं, जो अति संवेदनशील और संवेदनशील की श्रेणी में हैं. इनमें से चार झीलों का अध्ययन आपदा प्रबंधन विभाग करवा चुका है, जहां पर इक्विपमेंट लगाए जाने हैंउत्तरकाशी जिले में स्थित केदारताल और चमोली जिले स्थित सरस्वती ताल का अध्ययन करने के लिए अध्ययन टीम 8 सितंबर को रवाना हो रही है. यह टीम इन झीलों के पास जाकर उसका सर्वे करेगी. साथ ही एक बेसलाइन डाटा तैयार करेगी कि आखिर वर्तमान समय में झीलों की स्थिति क्या है. झील के आसपास कौन-कौन से इक्विपमेंट लगाए जाने की जरूरत है. इसके अलावा सूटेबल जगह भी चिन्हित की जाएगी कि किस जगह पर इक्विपमेंट लगाया जाए ताकि इक्विपमेंट सुरक्षित भी रहे और सूचना भी मिलती रहे. मुख्य रूप से इक्विपमेंट में अर्ली वार्निंग सिस्टम इनस्टॉल किया जाना है, जिससे भविष्य में अगर ये झील टूटती है या फिर झील का जलस्तर बढ़ता है, तो उस दौरान सरकार को इसकी जानकारी हो सके, ताकि इससे इफेक्ट होने वाले क्षेत्रों में रह रहे लोगों को सुरक्षित बचाया जा सके. भले ही आपदा प्रबंधन विभाग फिलहाल झील के आसपास अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने पर जोर दे रहा हो, लेकिन वैज्ञानिक इस बात को मान रहे हैं कि सिर्फ झील के आसपास ही अर्ली मॉर्निंग सिस्टम लगाना काफी नहीं है. क्योंकि यह भी संभावना है कि झील के आसपास एक बड़ी आपदा जैसी स्थिति न बन रही हो और झील से निकलने वाला पानी आगे जाकर एक बड़ी आपदा का रूप ले ले उसकी जानकारी नहीं मिल पाएगी. लिहाजा झील के समीप इक्विपमेंट लगाने के साथ ही संभावित नुकसान होने वाले क्षेत्र में इक्विपमेंट लगाने और इन दोनों के बीच में भी एक इक्विपमेंट लगाए जाने की जरूरत है. ताकि भविष्य में अगर झील टूटने से कोई आपदा जैसी स्थिति बनती है, तो उसकी पूरी सटीक जानकारी और वार्निंग समय पर मिल पाएगी. लिहाजा झील के समीप इक्विपमेंट लगाने के साथ ही संभावित नुकसान होने वाले क्षेत्र में इक्विपमेंट लगाने और इन दोनों के बीच में भी एक इक्विपमेंट लगाए जाने की जरूरत है. ताकि भविष्य में अगर झील टूटने से कोई आपदा जैसी स्थिति बनती है, तो उसकी पूरी सटीक जानकारी और वार्निंग समय पर मिल पाएगी. सिर्फ वहां का अध्ययन करना और अलर्ट वार्मिंग सिस्टम लगाना जरूरी नहीं होता है. बल्कि अर्ली वार्निंग सिस्टम कई जगह पर लगाने की जरूरत होती है. यानी अर्ली वार्निंग सिस्टम झील के पास लगाने के साथ ही टारगेट यानी झील के फटने से जहां नुकसान होने की आशंका है, उस क्षेत्र में भी अर्ली मॉर्निंग सिस्टम लगाने की जरूरत है. सिर्फ वहां का अध्ययन करना और अलर्ट वार्मिंग सिस्टम लगाना जरूरी नहीं होता है. बल्कि अर्ली वार्निंग सिस्टम कई जगह पर लगाने की जरूरत होती है. यानी अर्ली वार्निंग सिस्टम झील के पास लगाने के साथ ही टारगेट यानी झील के फटने से जहां नुकसान होने की आशंका है, उस क्षेत्र में भी अर्ली मॉर्निंग सिस्टम लगाने की जरूरत है. ग्लेशियरों में बदलाव केवल उनके अंतिम छोर तक सीमित नहीं है. हाल के वर्षों में बर्फ की सतह पतली होने का असर ग्लेशियरों के ऊपरी हिस्सों तक पहुंच रहा है, जिन्हें सामान्य तौर पर बर्फ जमा होने वाला क्षेत्र माना जाता है. यह सिस्टम भूस्खलन से पहले ही नागरिकों और सरकार को अलर्ट कर देगा। इसके अनुसार राहत एवं बचाव के कार्य तत्परता से किए जा सकेंगे। यह प्रक्रिया आपदा पूर्व की तैयारियों की दिशा में बेहद कारगर साबित होगी। भले ही आपदा प्रबंधन विभाग फिलहाल झील के आसपास अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने पर जोर दे रहा हो, लेकिन वैज्ञानिक इस बात को मान रहे हैं कि सिर्फ झील के आसपास ही अर्ली मॉर्निंग सिस्टम लगाना काफी नहीं है. क्योंकि यह भी संभावना है कि झील के आसपास एक बड़ी आपदा जैसी स्थिति न बन रही हो और झील से निकलने वाला पानी आगे जाकर एक बड़ी आपदा का रूप ले ले उसकी जानकारी नहीं मिल पाएगी. देश के हिमालई क्षेत्रों में लगातार पिघल रहे ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों का बढ़ रहा आकर भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है. इसको लेकर वैज्ञानिक लगातार अध्ययन कर रहे हैं. हिमालय क्षेत्र के पदम ग्लेशियर और नाटेओ नाला ग्लेशियर का अध्ययन किया है. इस अध्ययन में दो महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया गया है. पहला बिंदू जिस ग्लेशियर क्षेत्र के आगे झील बनी हुई है. दूसरा जिस ग्लेशियर के आगे झील नहीं बनी है. उसके पिघलने की दर को कंपेयर करते हुए अध्ययन किया गया है. ग्लेशियरों पर 1993 से 2022 के बीच किए गए एक विस्तृत अध्ययन में चिंताजनक तस्वीरें निकालकर सामने आई हैं इस अध्ययन के बाद निकले निष्कर्ष ने हिमालय की चिंताजनक तस्वीरों को सामने का दिया है. अगर ऐसे ही ग्लेशियर पिघलते रहे तो वे भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं.पारिस्थितिकी और पर्यावरण के लिए भविष्य में खतरा बन सकते सचिव आपदा प्रबंधन ने बताया कि ग्लेशियर झीलों की निगरानी के साथ-साथ ऐसी व्यवस्थाओं को विकसित किया जा रहा है, जिससे संभावित खतरे की स्थिति में चेतावनी से लेकर राहत एवं बचाव तक की पूरी श्रृंखला प्रभावी ढंग से काम कर सके। इसके तहत संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निरंतर निगरानी, अत्याधुनिक सेंसर एवं अर्ली वार्निंग उपकरणों की स्थापना, रियल टाइम डेटा प्राप्त करने की व्यवस्था, आवश्यकतानुसार उपकरणों की संख्या बढ़ाना, चेतावनी के लिए वैकल्पिक संचार माध्यम विकसित करना तथा संभावित प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की तैयारियों को मजबूत किया जाएगा।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











