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चारधाम के पर्यावरण पर गंभीर दबाव बढ़ गया है

13/09/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चारधाम यात्रा में रिकॉर्ड संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालुओं के बीच हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्लास्टिक और ठोस कचरे ने नई चिंता खड़ी कर दी है. यात्रा सीजन के शुरुआती डेढ़ महीने में ही चारधाम क्षेत्रों से 288 टन से अधिक कचरा एकत्र किया गया है. उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा इस वर्ष भी आस्था के नए रिकॉर्ड बना रही है. पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस यात्रा सीज़न अब तक दो महीने में 29 लाख से ज्यादा यात्री चारधाम यात्रा पर आ चुके हैं. लाखों श्रद्धालु बाबा केदार, बदरी विशाल, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए हिमालय की ओर रुख कर रहे हैं. लेकिन श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ हिमालयी पर्यावरण पर पड़ रहा दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है. बढ़ते पर्यावरणीय खतरे के बीच केदारनाथ में अब ‘कैरी मी बैक’ अभियान शुरू किया गया है, जिसके तहत श्रद्धालुओं को अपना कचरा वापस साथ लेकर आने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.केदारनाथ धाम की यात्रा में आस्था के साथ अब पर्यावरण संरक्षण की तस्वीर भी सामने आने लगी है। हजारों श्रद्धालु जहां बाबा केदार के दर्शन के लिए पैदल पहाड़ी रास्ता तय करते हैं वहीं लौटते वक्त अपने साथ हिमालय क्षेत्र में फैला कचरा भी ला रहे हैं।केदारनाथ धाम में मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी इन दिनों कचरा प्रबंधन में अहम भूमिका निभा रही है। इस यात्रा काल में अभी तक 46 टन से अधिक प्लास्टिक और नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरा एकत्र किया गया है।इस पूरी मुहिम में सबसे खास श्रद्धालुओं की भागीदारी है। अभियान के तहत चार हजार श्रद्धालु इस मुहिम से जुड़े और उन्होंने केदारनाथ से बेस कैंप तक एक-एक किलो कचरा वापस लाने की जिम्मेदारी उठाई।यहां एमआरएफ के माध्यम कचरे को एकत्र करने के साथ ही उसे अलग-अलग श्रेणियों में छांटने और रिसाइकिलिंग के लिए आगे भेजने का काम किया जा रहा है। कैरी मी बैक अभियान ने इस जिम्मेदारी को आगे बढ़ाया है। यह जिम्मेदारी सफाईकर्मियों तक सीमित नहीं है इसमें श्रद्धालु भी भागीदार बन रहे हैं।प्लास्टिक और ठोस कचरा बना चिंता का कारण यात्रा मार्गों और धाम क्षेत्रों में जमा हो रहा प्लास्टिक तथा अन्य ठोस कचरा अब प्रशासन, पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है. हाल ही में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ के लेकर वहां की नगर और जिला पंचायतों की ओर से सामने आए आंकड़ों के अनुसार, यात्रा सीजन की शुरुआत से माह के अंत तक चारधाम यात्रा क्षेत्रों से लगभग 288 टन कचरा एकत्र किया जा चुका है. इनमें प्लास्टिक बोतलें, खाद्य पदार्थों के रैपर, पॉलीथिन, डिस्पोजेबल सामग्री और अन्य ठोस अपशिष्ट शामिल हैं. जैसा कि हम सब जानते हैं उत्तराखंड के चारों धाम और इनके यात्रा मार्ग देश के सबसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में आते हैं. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में छोड़ा गया प्लास्टिक वर्षों तक नष्ट नहीं होता. धीरे-धीरे यह कचरा मिट्टी, जल स्रोतों और वन्यजीवों को प्रभावित करता है.यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में उपयोग होने वाली प्लास्टिक पानी की बोतलें, स्नैक्स पैकेट, चाय-कॉफी के डिस्पोजेबल कप और अन्य सामग्री कचरे का बड़ा हिस्सा बनती हैं. कई बार यह कचरा रास्तों, पहाड़ियों और नदी-नालों के किनारे जमा हो जाता है. बरसात के दौरान यही कचरा जलधाराओं के माध्यम से नदियों तक पहुंच जाता है, जिससे पर्यावरणीय संकट और गहरा हो जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के सिकुड़ने और अनियंत्रित पर्यटन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हिमालय के लिए यह अतिरिक्त दबाव भविष्य में गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है. बढ़ती समस्या को देखते हुए केदारनाथ में एक नई पहल शुरू की गई है. इसका नाम ‘कैरी मी बैक’ रखा गया है. इस अभियान का उद्देश्य श्रद्धालुओं को पर्यावरण संरक्षण की मुहिम से सीधे जोड़ना है. इस पहल के तहत केदारनाथ पहुंचने वाले यात्रियों को विशेष कपड़े के बैग उपलब्ध कराए जा रहे हैं. श्रद्धालुओं से अपील की जा रही है कि यात्रा के दौरान उत्पन्न होने वाला प्लास्टिक और अन्य सूखा कचरा इन बैगों में एकत्र करें और वापसी के समय अपने साथ नीचे लेकर आएं. इसके बाद निर्धारित स्थानों पर कचरे का पृथक्करण और वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाएगा. अभियान से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि यदि प्रत्येक श्रद्धालु अपने हिस्से का कचरा वापस लेकर आए, तो धाम और यात्रा मार्गों में फैलने वाले प्लास्टिक कचरे की मात्रा में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है. प्रशासन का कहना है कि पहाड़ों में कचरा प्रबंधन एक जटिल और खर्चीली प्रक्रिया है. ऐसे में जनभागीदारी के बिना स्थायी समाधान संभव नहीं है. अब तक कचरा प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और स्थानीय निकायों पर रहती थी, लेकिन ‘कैरी मी बैक’ अभियान इस सोच को बदलने की कोशिश है. कैरी मी बैक’ अभियान के तहत श्रद्धालुओं को केवल पर्यटक या यात्री नहीं, बल्कि हिमालय संरक्षण अभियान का सहभागी बनाने का प्रयास किया जा रहा है. यात्रा मार्ग के विभिन्न पड़ावों पर जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं. यात्रियों को बताया जा रहा है कि जिस हिमालय की गोद में वे दर्शन के लिए पहुंचते हैं, उसकी स्वच्छता और सुरक्षा भी उनकी सामूहिक जिम्मेदारी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह अभियान प्रभावी रूप से लागू होता है, तो आने वाले वर्षों में चारधाम यात्रा मार्गों पर प्लास्टिक कचरे की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. उत्तराखंड के चारों धाम जिन नगर निकायों के अंतर्गत आते हैं, वहां आज भी प्रभावी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम का अभाव है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उत्तरकाशी जैसे महत्वपूर्ण जनपद में भी कचरे के प्रसंस्करण की समुचित व्यवस्था नहीं है. उनके अनुसार यात्रा सीजन हो या ऑफ सीजन, बड़ी मात्रा में कचरा नदी किनारों और खुले क्षेत्रों में डंप किया जाता है. बाद में जब तेज बारिश या बाढ़ जैसी स्थिति बनती है तो यही कचरा नदियों में बह जाता है और पर्यावरणीय संकट को और गंभीर बना देता है. विशेषज्ञों का मानना है कि चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी से भी जुड़ी हुई है. यदि यात्रा को दीर्घकालिक और पर्यावरण अनुकूल बनाना है तो सरकार, प्रशासन, स्थानीय समुदाय और श्रद्धालुओं को मिलकर काम करना होगा. कैरी मी बैक’ जैसे अभियान इस दिशा में एक सकारात्मक शुरुआत माने जा रहे हैं. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसके साथ मजबूत कचरा प्रबंधन नीति, सॉलिड वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट, सख्त निगरानी और व्यापक जनजागरूकता अभियान भी जरूरी हैं. चारधाम यात्रा में उमड़ रही आस्था के बीच अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हिमालय की पवित्रता और प्राकृतिक विरासत को कैसे सुरक्षित रखा जाए. क्योंकि यदि आज प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में बढ़ता प्लास्टिक कचरा हिमालय के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकता है. इस पहल को सोशल मीडिया पर व्यापक समर्थन मिल रहा है। कई लोग इसे देश के अन्य धार्मिक स्थलों, नदियों और जंगलों में भी लागू करने की मांग कर रहे हैं।समय रहते नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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