डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
ग्लेशियर झीलों से जुड़े संभावित खतरों की निगरानी के लिए उत्तराखंड में तकनीक का दायरा बढ़ाया जा रहा है। चमोली के वसुंधरा ताल में लगने वाला नया सिस्टम खतरे की आशंका होने पर समय रहते अलर्ट देने में मदद करेगा। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की चमोली जिले के वसुंधरा ताल में अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करेगा। इसकी सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इससे पहले सीबीआरआई द्वारा विकसित इस स्वदेशी तकनीक को मनाली में स्थापित किया गया था, जहां से पिछले करीब एक वर्ष से लगातार डेटा प्राप्त हो रहा है। अब इसी तकनीक को वसुंधरा ताल में लगाया जाएगा।वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में यह प्रणाली करीब एक घंटे पहले अलर्ट जारी करने में सक्षम होगी। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद हिमनद झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों को देखते हुए राज्य सरकार और सीबीआरआई मिलकर ग्लोफ मॉनिटरिंग एंड अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित कर रहे हैं। सीबीआरआई के निदेशक ने बताया कि इसके तहत झील क्षेत्र में एक विशेष टॉवर लगाया जाएगा, जिसमें कई आधुनिक सेंसर स्थापित होंगे। ये सेंसर बारिश, बर्फबारी, झील के आकार, जलस्तर और पानी के बहाव में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी करेंगे। प्रणाली झील से संबंधित प्राकृतिक परिवर्तनों और संभावित आपदाओं का डेटा एवं तस्वीरें रीयल टाइम में निगरानी केंद्र तक भेजेगी। किसी भी असामान्य गतिविधि, जैसे हिमखंड का झील में गिरना, जलस्तर का अचानक बढ़ना या झील के प्राकृतिक बांध में दरार आने की स्थिति में सेंसर एक से दो मिनट के भीतर कंट्रोल रूम को सूचना भेज देंगे।
सेंसर सेटेलाइट से जुड़े होंगे और घटनाक्रम की पुष्टि के लिए कैमरे भी लगाए जाएंगे। विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी कारण वसुंधरा ताल टूटता है तो पानी और मलबा करीब 20 किलोमीटर नीचे तक मात्र आठ से दस मिनट में पहुंच सकता है। ऐसे में यह अर्ली वार्निंग सिस्टम संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी जारी कर जान-माल के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अलर्ट में राज्य में चार धाम या अन्य स्थानों की यात्रा करने वाले तीर्थ यात्री और पर्यटकों को भी सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं. लोगों को सलाह दी गई है कि वह नदी और नालों के किनारे ना जाए क्योंकि नदियों के जलस्तर बढ़ने की वजह से खतरा बढ़ सकता है. जैसे-जैसे पानी निचले क्षेत्रों की ओर बढ़ेगा, अलग-अलग स्थानों तक पहुंचने में आधा घंटा, एक घंटा या उससे अधिक समय लग सकता है। ऐसे में शुरुआती कुछ मिनटों में मिलने वाली चेतावनी निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण साबित होगी। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद हिमनद झीलों से संभावित खतरे को लेकर निगरानी व चेतावनी प्रणाली मजबूत की जा रही है। आपदा प्रबंधन सचिव के अनुसार ग्लोफ मानीटरिंग एंड अर्ली वार्निग सिस्टम का कंट्रोल रूम सीबीआरआई रुड़की अथवा देहरादून में वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान में स्थापित किया जा सकता है। यह कंट्राेल रूम राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र से भी जुड़ा रहेगा। उत्तराखंड में भी हिमालय का तेजी से बदलता पर्यावरण ग्लेशियर झीलों के माध्यम से नई आपदा की आहट लेकर आया है। ग्लेशियरों के पीछे हटने, टूटने और झीलों के आकार में बदलाव के साथ ही इनके फटने के कारण बढ़ते खतरे ने चिंता और चुनौती, दोनों बढ़ा दी हैं।नेपाल की हालिया विनाशकारी आपदा इस चुनौती को और गंभीर बना रही है। हालांकि, इस परिदृश्य के बीच उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी और संभावित आपदा से निबटने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की दिशा में कवायद होती दिख रही है, लेकिन जरूरत इस मुहिम को बेहद गंभीरता और तेजी से आगे बढ़ाने की है। ग्लेशियर झीलों का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि हिमालय केवल उत्तराखंड की भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि यहां की नदियों, जलस्रोतों और पारिस्थितिकी का आधार भी है। ग्लोबल वार्मिग के दौर में हिमालयी क्षेत्र में हो रहे बदलावों ने आपदा के स्वरूप और जोखिम को भी बदल दिया है। राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्र में 344 ग्लेशियर झीलें चिह्नित की गई हैं। इनमें से 13 झीलों को जोखिमपूर्ण माना गया है। यानी ये नेपाल की तरह तबाही का सबब बन सकती हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने राज्य में 13 ग्लेशियर झीलों को अधिक जोखिमपूर्ण श्रेणी में रखा है। इनमें पिथौरागढ़ की छह, चमोली की चार और बागेश्वर, टिहरी व उत्तरकाशी की एक-एक झील है।इनमें से अब तक पिथौरागढ़ की मबांग झील का ग्लेशियोलाजिकल और चमोली के वसुंधरा ताल, पिथौरागढ़ की स्यूंतियांक्ति और प्युंगरु झील का बाथीमेट्री ग्लेशियोलाजिकल अध्ययन कराने के साथ ही चारों झीलों का विशेष वैज्ञानिक सर्वेक्षण भी कराया जा चुका है। ‘भारतीय हिमालयी क्षेत्र ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) की दृष्टि से संवेदनशील है। हमारी खड़ी घाटियों को देखते हुए बाढ की लहर हमें प्रतिक्रिया देने के लिए घंटे नहीं देगी, यह कुछ मिनटों की बात हो सकती है। हमारी बस्तियां, जलविद्युत परियोजनाएं और तीर्थयात्रा मार्ग नीचे की ओर हैं। ऐसे में उत्तराखंड के लिए निरंतर निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली वैकल्पिक नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है।’ नेपाल में ग्लेशियर फटने से बाढ़ का आना कोई नई बात नहीं है. हर साल यहां पर ग्लेशियर फटने से हादसे होते हैं. पिछले साल भी इसी भोटेकोशी नदी में ग्लेशियर का सैलाब आया था जिसकी वजह से 30 लोगों की मौत हुई थी. लेकिन इस बार ग्लेशियर फटने से आई आपदा ने लोगों को डरा दिया है. साथ ही साथ भारत को भी एक ऐसी वॉर्निंग दी है कि अगर भारत ने नेपाल की इस आपदा से नहीं सीखा तो आने वाले दिनों में ग्लेशियर बम जब फटेगा तो नेपाल से भी बड़ी तबाही होगी. ग्लेशियरों का टूटना अलग अलग कारणों पर निर्भर करता है. इसीलिए इसे पूरी तरह रोकना संभव नहीं है. लेकिन ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और अस्थिर होने की रफ्तार को कम किया जा सकता है. ये सब इंसान के हाथ में है. ग्लेशियरों को पिघलने से रोकने का सबसे महत्वपूर्ण उपाय है ग्लोबल वार्मिंग रोकना. अगर ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित कर लिया जाए तो ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है. कोयला, पेट्रोल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का कम इस्तेमाल, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना और कार्बन उत्सर्जन घटाना लंबे समय में ग्लेशियरों को बचाने में सबसे अहम भूमिका निभा सकते हैं.इसके अलावा वैज्ञानिक ग्लेशियरों की लगातार निगरानी करते हैं. सैटेलाइट तस्वीरों, ड्रोन, सेंसर और जमीन पर लगाए गए उपकरणों की मदद से बर्फ की मोटाई, तापमान और दरारों में होने वाले बदलावों का पता लगाया जाता है. इससे संभावित ग्लेशियर टूटने या ग्लेशियल झील फटने जैसी घटनाओं के लिए समय रहते चेतावनी जारी की जा सकती है और एक बड़ी तबाही को कम किया जा सकता है.विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी ग्लेशियर को बांधकर या किसी एक तकनीक से स्थायी रूप से टूटने से रोकना संभव नहीं है. असली समाधान है तापमान वृद्धि को सीमित करना और हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की लगातार निगरानी करना. यानी ग्लेशियरों को बचाने की लड़ाई सिर्फ पहाड़ों पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में लड़ी जानी है. कम प्रदूषण, कम कार्बन उत्सर्जन और बेहतर वैज्ञानिक निगरानी यही ग्लेशियरों के भविष्य को सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी उम्मीद और संभावित महातबाही से बचने का उपाय भी. ऐसे में यह अर्ली वार्निंग सिस्टम संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी जारी कर जान-माल के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











