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रंग लाने लगी वन प्रभाग की कोशिश, उगने लगे ब्रह्मकमल, जड़ी बूटी और दुर्लभ वनस्पतियां

09/07/21
in उत्तराखंड, चमोली
Reading Time: 1min read
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गोपेश्वर। कोई भी कृषक जब लगन, मेहनत और धैर्य के साथ अपने खेत में फसल उगाता है और जब फसल लहलहाती है तो उसकी खुशी की कोई सीमा नहीं होती, ठीक उसी तरह की खुशी केदारनाथ वन्य जीव वन प्रभाग के अफसरों और कार्मिकों के चेहरों पर पढ़ी जा सकती है। इस वन प्रभाग ने जो उपलब्धि हाल के वर्षों में अर्जित की है वह न सिर्फ एक उदाहरण है बल्कि अनुकरणीय भी है।श्री केदारनाथ के उच्च हिमालयी क्षेत्र के बुग्यालों एवं धार्मिक स्थलों में तेजी के साथ ब्रह्मकमल सहित अन्य दुर्लभ औषधीय गुणों से भरपूर सुगंधित एवं वन विभाग के द्वारा रोपित जड़ी-बूटियों के पौधों के उगने से वन महकमे में इसे लेकर खासा उत्साह बना हुआ हैं।

आशा जताई जा रही हैं कि रोपित पौधे इसी तरह से बढ़ते रहेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब केदारनाथ की धार्मिक यात्रा पर आने वाले यात्रियों को ब्रह्मकमल सहित अन्य दुर्लभ जड़ी-बूटियों का दीदार करने के साथ ही कुछ सीमित मात्रा में ही सही, अपने साथ प्रसादी के रूप में ले जाने का और भी बेहतरीन मौका मिल सकेगा।दरअसल सदियों से उच्च हिमालयी क्षेत्र के अद्भुत बुग्यालों में 11 से 17 हजार फीट तक की ऊंचाई पर प्राकृतिक रूप से जुलाई से सितंबर माह तक उगने वाला ब्रह्मकमल का सफेद फूल देश – विदेश के धार्मिक यात्रियों के साथ ही प्रकृति प्रेमी पदयात्रियों के आकर्षण का मुख्य विषय बना रहता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अद्भुत, दुर्लभ, मादक, सुगंधित, तारेनुमा सफेद फूल का नाम ब्रह्मकमल पड़ने के पीछे ब्रह्मदेव के द्वारा इसका नाम रखने की बात कही जाती हैं। धार्मिक दृष्टि से भी इस फूल का काफी अधिक महत्व हैं। उत्तराखंड में नंदा अष्टमी के पर्व पर तमाम क्षेत्रों में नंदा देवी की पूजा में इसी फूल से देवी की मुख्य रूप से पूजा की जाती है। केदारनाथ धाम में सावन माह में भगवान शिव का अभिषेक भी इसी पुष्प से किया जाता है। इसके अलावा बद्रीनाथ, केदारनाथ सहित अन्य कई मंदिरों में इस फूल से ही देवी-देवताओं की पूजा अर्चना की जाती है। एक तरह से ऊंचाई पर बसे सभी क्षेत्रों में देवी-देवताओं की पूजा में इस फूल का विशेष महत्व हैं।

यही नही देवी- देवताओं के भक्तों को इसी फूल को प्रसादी के रूप दिया भी जाता हैं। उत्तराखंड में ब्रह्मकमल का पुष्प मुख्य रूप से पिंडारी ग्लेशियर से लेकर, चिफला बुग्याल, नंदीकुंड, सप्तकुंड, रूपकुंड, हेमकुंड, होमकुंड, फूलों की घाटी, ब्रजगंगा के साथ ही केदारनाथ के आसपास के ऊंचाई पर स्थित क्षेत्रों में दुर्लभ, सुगन्धित एवं औषधीय गुणों से भरपूर अन्य जड़ी-बूटियों के साथ प्राकृतिक रूप से उगता आ रहा है परंतु ब्रह्मकमल के साथ ही अन्य दुर्लभ एवं बहु उपयोगी जड़ी-बूटियों को उगाने के लिए पिछले वर्षो केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग गोपेश्वर के द्वारा एक सराहनीय प्रयास केदारनाथ धाम में करने का प्रयास शुरू किया हैं।

जिसमें लगता है कि उसे काफी हद तक सफलता हासिल भी होने लगी हैं। केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग गोपेश्वर के प्रभागीय वनाधिकारी अमित कंवर ने बताया कि पिछले साल प्रभाग ने केदारनाथ धाम के आसपास के क्षेत्रों को तीन सेक्टरों में बांट कर उनमें प्राकृतिक रूप से उगने वाले ब्रह्मकमल के साथ ही अन्य जड़ी-बूटियों का उत्पादन करने का प्रयास किया गया।

इसके तहत केदारनाथ के भैरव मंदिर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम से रखे गए मोदी ध्यान गुफा क्षेत्र में कुल तीन हैक्टेयर क्षेत्र में ब्रह्मकमल, कुटकी, बज्रदंती, भूतकेश, नैरपाती, आरचू एवं कूथ के पौधों का बड़े स्तर पर रोपण किया गया है। रोपे गए ब्रह्मकमल सहित सभी अन्य दुर्लभ जड़ी-बूटियों के पौधों का तेजी के साथ विकास हो रहा हैं। डीएफओ कंवर ने बताया कि ब्रह्मकमल के रोपित पौधों में इस साल फूल भी खिले हैं। मानव रोपित ब्रह्मकमल के पौधों में फूल खिलने से वन महकमे के अधिकारी एवं कर्मचारी खासे उत्साहित हैं। उनकी मेहनत रंग लाने लगी तो आगे की संभावनाएं भी उज्ज्वल हो गई हैं और इसके साथ ही दुर्लभ होती जा रही जड़ी बूटियों के संरक्षण की उम्मीद भी बढ़ गई है।

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