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तब सालम के वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत से आजाद करा लिया था क्षेत्र को

24/08/21
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड
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शहीद दिवस पर विशेष
अल्मोड़ा से शिवेंद्र गोस्वामी की रिपोर्ट
सन्1942 में जनपद मुख्यालय से 70 किमी दूर लमगड़ा विकास खण्ड के अन्तर्गत सालम क्षेत्र को आजदी के रणबांकुरों ने कुछ समय के लिये अंग्रेजों से आजाद करा लिया था। तब सालम जैंती-धामद्यों में अंग्रेजी सेना ने सालम के क्रान्तिकारियों पर गोली चलाई थी। जिसमें सालम के ग्राम चौकुना निवासी नरसिंह व काण्डे निवासी टीका सिंह शहीद हो गये थे। उनकी शहादत में प्रति वर्ष 25 अगस्त को धामद्यो सालम में शहीद दिवस मनाया जा रहा है।

ज्ञापव्य हो कि देश की आजादी के लिए 09 अगस्त 1942 को महात्मा गॉधी के करो या मरो नारे के बाद पूरे देश के साथ ही पहाड़ के सुदूरवर्ती क्षेत्र सालम में भी आंदोलन ने जोर पकड़ा। तब हालत यह थी कि 9 अगस्त 1942 से पूर्व पूरे देष के प्रमुख नेताओं को ब्रिटिश हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया था। जिसके कारण आंदोलन की बागडोर किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं रह गयी थी। तथा सभी आंदोलनकारियों ने एक तरह से आंदोलन का नेतृत्व अपने.अपने हाथों में ले लिया था। सालम के शेर नाम से जाने जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी प्रताप सिंह बोरा के नेतृत्व में सालम क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन ने जोर पकडा़ तथा आंदोलनकारियों ने जैंती डाकखाने में आग लगाकर उसे फंूक दिया।

बिटिश हुकूमत के एक विद्यालय के प्रधानाध्यापक को अांदोलनकारियों ने गांधी टोपी पहनाकर उसे स्वतंत्रता की जंग के लिए नारे लगाने को मजबूर कर दिया। आजादी के दीवानें उग्र आंदोलनकारियों ने सालम क्षेत्र के एक पटवारी व कानूनगो की मंूछे कटवाकर उसकी बेरहमी से पिटाई कर डाली। सालम क्षेत्र के क्रान्तिकारियों ने क्षेत्र के दर्जनों गांवों में अपनी हुकूमत चलानी शुरू कर दी। बसन्तपुर में कमलापति बहुगुणा व नयन सिंह बिष्ट उर्फ वर्मा जी भीतर ही भीतर आंदोलन को गति देने के लिए रणनीति बनाने लगे तो सांगड़ के क्रान्तिवीर राम सिंह आजाद के उग्र आदोलन को देखते हुए क्षेत्रीय पटवारी साधु का वेश बनाकर यहां से भागकर अल्मोडा़ पहुंच गया तथा उसने स्थिति से अवगत कराया। जिस पर अंग्रेजी अधिकारी बौखला गये और उन्होंने सालम में क्रान्तिकारियों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन को कुचलने के लिए अल्मोड़ा से गोरी पल्टन सालम भेज दी।

इस पल्टन ने अल्मोडा़ से सालम को जाने वाले मागों के किनारे के गांवों में इस कदर आतंक मचाया कि ग्रामीणों के हल, मूसल, कृषि यंत्र तक जला डाले तथा खेतों में खड़ी फसल को नष्ट कर दिया। गोरी सेना के इस आतंक से आक्रोषित सालम के क्रान्तिकारी बड़ी संख्या में काण्डे गांव के ऊपर ऊँची पहाड़ों धाम जो अब धामद्यो को नाम से जानी जाती है, एकत्रित हो गये और गोरी पल्टन ज्यों ही जैंती गांव के समीप पहुंची तो पहले से ही धामद्यो टापू पर एकत्रित क्रान्तिकारियों ने भारत माता की जयघोष के नारे के साथ गोरी पल्टन पर जबर्दस्त पथराव कर दिया। इस पथराव के कारण गोरी पल्टन के कमाण्डर के सिर में चोट लग गयी और उसने क्रोधित होकर सेना को गोली चलाने के आदेश दे दिये।

अंग्रेजी सेना की गोलाबारी से भीड़ में भगदड़ मच गयी। इसी बीच क्रांन्तिकारी नर सिंह व टीका सिंह अपने अन्य साथियों के साथ मोर्चे पर डटे रहें, जिससे दोनों को अंग्रेजी सेना का शिकार होना पड़ा। क्रान्तिकारी नर सिंह गोली लगते ही घटना स्थल पर शहीद हो गये। जबकि गोली लगने से टीका सिंह ने अल्मोडा़ लाते वक्त रास्ते में ही दम तोड़ दिया। इसके साथ ही दर्जनों आंदोलनकारियों की बेरहमी से पिटाई कर उन्हें जेल में ठूंस दिया।

यहां यह भी उल्लेखनीय है। कि सालम क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन की षुरूआत 9 अगस्त 1942 से कई वर्ष पूर्व हो चुकी थी। इस आंदोलन का नेतृत्व देश को जै हिन्द का नारा देने वाले क्रान्तिवीर राम सिंह धौनीख् पंण् दुर्गा दत्त शास्त्री ने किया। सन् 1930 में राम सिंह धौनी की मत्यु के बाद पं दुर्गादत्त शास्त्री ने स्व धौनी के सपनों को साकार करने में अहम् भमिका निभाई। आबादी की इस जंग में जैंती के उत्तम सिंहख् कुटौली के मिर्चराम, रेवाधर पाण्डे, चौकुना के श्री धानिक का अविस्मरणीय योगदान रहा है। जिन्होंने गांव.गांव जाकर आजादी की अलख जगाते हुए। युवकों को संगठित किया। सालम क्षेत्र के रणबांकुरों ने सन्. 1942 के आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत को कुछ समय के लिए सालम में समाप्त कर दिया। यद्यपि अंग्रेज अधिकारियों ने गोरी पल्टन के साथ ही जाट पल्टन को भी सालम भेजा तथा ये दोनों पल्टनें कई महिनों तक सालम में डेरा जमाये रहीं, परन्तु आजादी के इन दीवानों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव को हिलाकर रख दिया। आजादी के बाद धामद्यो में प्रतिवर्ष 25 अगस्त कोशहीदो की याद में शहीद दिवस मनाया जाता है।

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