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पहाड़ के गांधी को नमन

18/08/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में ‘पहाड के गांधी’ के रूप में याद किए जाने वाले श्री इन्द्रमणि बडोनी जी की पुण्यतिथि है. मगर दुःख के साथ कहना पड़ता है कि उत्तराखंड की जनता के द्वारा इस जन नायक की पुण्यतिथि जिस कृतज्ञतापूर्ण हार्दिक संवेदनाओं के साथ मनाई जानी चाहिए उसका अभाव ही नजर आता है. इससे सहज में ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड की राजनीति आज किस प्रकार की विचारशून्य, स्वार्थपूर्ण और निराशा के दौर से विचरण कर रही है? इतिहास साक्षी है कि जो कौम या समाज अपने स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को भुला देता है, वह ज्यादा दिनों तक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकता.उत्तराखंड की सम्पूर्ण जनता अपने महानायक के पीछे लामबन्द हो गयी थी. बीबीसी ने तब कहा था, ‘‘यदि आपने जीवित एवं चलते फिरते गांधी को देखना है तो आप उत्तराखंड की धरती पर चले जायें. वहाँ गांधी आज भी अपनी उसी अहिंसक अन्दाज में विराट जन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहा है.श्री इन्द्रमणि बडोनी जी उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के मुख्य सूत्रधार थे. अगस्त का यह महीना वैसे भी स्वतंत्रता आंदोलन के वीर सेनानियों को उनके योगदान के लिए याद करने का विशेष महीना होता है. बडोनी जी के संदर्भ में अगस्त का महीना उनके राजनैतिक संघर्ष का खास महीना भी था. 2 अगस्त 1994 को उन्होंने पौड़ी प्रेक्षागृह के सामने आमरण अनशन का जन आंदोलन शुरू किया था और 7 अगस्त 1994 को उन्हें पहले मेरठ अस्पताल में और बाद में दिल्ली स्थित आयुर्विज्ञान संस्थान में जबरन भरती करवा दिया गया. इसी दौरान उत्तराखंड राज्य आन्दोलन पूरे पहाड में आग की तरह फैल चुका था. उत्तराखंड की सम्पूर्ण जनता अपने महानायक के पीछे लामबन्द हो गयी थी. बीबीसी ने तब कहा था, ‘‘यदि आपने जीवित एवं चलते फिरते गांधी को देखना है तो आप उत्तराखंड की धरती पर चले जायें. वहाँ गांधी आज भी अपनी उसी अहिंसक अन्दाज में विराट जन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहा है.’आज की युवा पीढी के बहुत कम लोगों को शायद यह बात मालूम है कि उत्तराखण्ड आंदोलन में इन्द्रमणि बडोनी जी के जुझारु नेतृत्व के बदौलत ही पृथक् राज्य का सपना पूरा हो सका. जरा याद करें स्वतंत्र भारत में भी पृथक् राज्य की मांग करने वाले उत्तराखण्ड के आन्दोलनकारियों पर किए गए जुल्म और अत्याचार के कारनामों की दास्तां दी थी-“1 सितम्बर 1994 को खटीमा और 2 सितम्बर को मसूरी के लोमहर्षक हत्याकांडों से पूरा देश दहल उठा था. 15 सितम्बर को शहीदों को श्रद्धांजलि देने हेतु मसूरी कूच किया गया, जिसमें पुलिस ने बाटा घाट में आन्दोलनकारियों को दो तरफा घेर कर लहूलुहान कर दिया. दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया और बडोनी को जोगीवाला में ही गिरफ्तार कर सहारनपुर जेल भेजा गया. इस दमन की सर्वत्र निन्दा हुई.“1 सितम्बर 1994 को खटीमा और 2 सितम्बर को मसूरी के लोमहर्षक हत्याकांडों से पूरा देश दहल उठा था. 15 सितम्बर को शहीदों को श्रद्धांजलि देने हेतु मसूरी कूच किया गया, जिसमें पुलिस ने बाटा घाट में आन्दोलनकारियों को दो तरफा घेर कर लहूलुहान कर दिया. दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया और बडोनी को जोगीवाला में ही गिरफ्तार कर सहारनपुर जेल भेजा गया. इस दमन की सर्वत्र निन्दा हुई. मुजफ्फरनगर के जघन्य कांड की सूचना मिलने के बाद 2 अक्टूबर की दिल्ली रैली में उत्तेजना फैल गई. मंच पर अराजक तत्वों के पथराव से बडोनी जी चोटिल हो गये थे.मगर ‘उत्तराखंड के इस गांधी’ ने उफ तक नहीं की और यूपी हाऊस आते ही फिर उत्तराखंड के लिए चिन्तित हो गये.”स्वतंत्रता आंदोलन संघर्ष से जुड़े उन तूफानी दिनों की बात ही कुछ और थी. जगह-जगह पर आन्दोलनकारी अनशन कर रहे थे,धरनों पर बैठे थे और विराट जलूसों के रूप में सड़कों पर निकल पड़ते थे. इनमें सबसे आगे चल रहा होता था दुबला-पतला,लम्बी बेतरतीब दाढ़ी वाला शख्स-इन्द्रमणि बडोनी.अदम्य जिजीविषा एवं संघर्ष शक्ति ने उन्हें इतना असाधारण बना दिया था कि बड़े से बड़ा नेता उनके सामने बौना लगने लगा था.श्री इन्द्रमणि बडोनी जी का जन्म 24 दिसम्बर 1925 को टिहरी गढवाल के जखोली ब्लाक के अखोडी ग्राम में हुआ.उनके पिता का नाम श्री सुरेशानंद बडोनी था. अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष में उतरने के साथ ही उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई.अपने सत्याग्रहपूर्ण सिद्धांतों पर दृढ रहने वाले इन्द्रमणि बडोनी जी का जल्दी ही राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने वाले दलों से मोहभंग हो गया. इसलिए वह चुनाव भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लडे और सन् 1967,1974,1977 में देवप्रयाग विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे.उत्तर प्रदेश में बनारसी दास गुप्त के मुख्यमंत्रित्व काल में वह पर्वतीय विकास परिषद के उपाध्यक्ष भी रहे थे.उत्तराखण्ड आंदोलन के प्रणेता इन्द्रमणि बडोनी राज्य निर्माण के लिए सन् 1980 में उत्तराखण्ड क्रांति दल में शामिल हुए. उन्हें पार्टी का संरक्षक बनाया गया.1989 से 1993 तक उन्होंने उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति के लिए पर्वतीय अंचलों में व्यापक स्तर पर जनसम्पर्क अभियान द्वारा जन जागृति की मुहिम चलाई और लोगों को अलग राज्य की लडाई लडने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया.उत्तराखण्ड आंदोलन के प्रणेता इन्द्रमणि बडोनी राज्य निर्माण के लिए सन् 1980 में उत्तराखण्ड क्रांति दल में शामिल हुए. उन्हें पार्टी का संरक्षक बनाया गया.1989 से 1993 तक उन्होंने उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति के लिए पर्वतीय अंचलों में व्यापक स्तर पर जनसम्पर्क अभियान द्वारा जन जागृति की मुहिम चलाई और लोगों को अलग राज्य की लडाई लडने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया. पूरे पहाड़ में व्यापक आंदोलन शुरू होने के बाद तन मन धन से समर्पित बडोनी जी ने स्कूल कालेजों में आरक्षण व पंचायती सीमाओं के पुनर्निधारण नीति का विरोध करते हुए 2 अगस्त 1994  को कलेक्ट्रेट कार्यालय पर आमरण अनशन शुरू कर दिया. कालांतर में उनका यह अनशन उत्तराखण्ड आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ.उनके इसी आमरण अनशन ने आरक्षण के विरोध को उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में बदल दिया.बडोनी जी आंदोलन के दौरान गांधीवादी विचारों, सत्याग्रहपूर्ण सिद्धांतों और आंदोलन को नेतृत्व देने की अपनी विशिष्ट शैली के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधा बनकर एक क्रातिकारी नेता के रूप में भारतीय राजनीति में छाए रहे. वह अहिंसक आंदोलन के प्रबल समर्थक थे.उनके इसी क्रातिकारी व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए तब अमरीकी अखबार ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने स्व.इन्द्रमणि बडोनी जी को ‘पहाड के गॉधी’ की उपाधि दी थी. ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने लिखा था–“उत्तराखण्ड आंदोलन के सूत्रधार इन्द्रमणि बडोनी की आंदोलन में उनकी भूमिका वैसी ही थी जैसी आजादी के संघर्ष के दौरान ‘भारत छाड़ो’ आंदोलन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधीवादी ने निभायी थी. उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड बनने के करीब 12 साल बाद अलग राज्य के लिए हुए आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले दिवंगत इंद्रमणि बडोनी सहित 45 लोगों को आधिकारिक रूप से उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी की मान्यता दी गई है।
आधिकारिक सूत्रों ने शनिवार को यहां बताया कि पौड़ी जिला प्रशासन ने बडोनी और दिवंगत बाबा मोहन उत्तराखंडी सहित 45 लोगों को उत्तराखंड आंदोलनकारी के रूप में मान्यता प्रदान कर दी है। बडोनी को उत्तराखंड का गांधी भी कहा जाता है। उन्होंने अलग राज्य के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। माना जाता है कि उनके सतत एवं जोरदार नेतृत्व से अलग राज्य का सपना साकार हो सका।
उन्हें पौड़ी में दो अगस्त 1994 से आमरशन अनशन शुरू करने के लिए भी याद किया जाता है। उनकी गिरफ्तारी के बाद आंदोलन ने नयी गति पकड़ ली और केंद्र पर अलग उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए दबाव बढ़ा। जिसकी परिणति अंततः उत्तरांचल की स्थापना के रूप में हुई.”उत्तराखंड के इस सच्चे सपूत ने 72 वर्ष की उम्र में 1994 में राज्य निर्माण की निर्णायक लड़ाई लड़ी,जिसमें उनके अब तक के किये परिश्रम का प्रतिफल जनता के विशाल सहयोग के रूप में मिला. उस ऐतिहासिक जन आन्दोलन के बाद भी 1994 से अगस्त 1999 तक बडोनी जी उत्तराखंड राज्य के लिए जूझते रहे. मगर अनवरत यात्राओं और अनियमित खान-पान से कृषकाय देह का यह वृद्ध-गांधी बीमार रहने लगा.श्री इन्द्रमणि बडोनी जी को देवभूमि उत्तराखंड और अपनी संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम था. उत्तराखंड हिमालय भ्रमण के दौरान उन्होंने ही भिलंगना नदी के उद्गम स्थल खतलिंग ग्लेशियर को खोजा था. उनका सपना पहाड को आत्मनिर्भर राज्य बनाने का था और उन्ही के प्रयासों से इस क्षेत्र में दुर्लभ औषधियुक्त जडी बूटियों की बागवानी प्रारम्भ हुई. उनका सादा जीवन देवभूमि के संस्कारों का ही जीता-जागता नमूना था. वे चाहते थे कि इस पहाडी राज्य को यहां की भौगोलिक परिस्थिति व विशिष्ट सांस्कृतिक जीवन शैली के अनुरूप विकसित किया जाए.वर्ष 1958 में राजपथ पर गणतंत्र दिवस के अवसर पर बडोनी जी ने केदार नृत्य की ऐसी कलात्मक प्रस्तुति की थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी उनके साथ थिरक उठे थे. युग पुरुष इन्द्रमणि बडोनी जी हिमालय के समान दृढ निश्चयी,गंगा के समान निर्मल हृदय,नदियों और हरे भरे जंगलों की भांति परोपकारी वृत्ति के महा मानव थे. उत्तराखंड के इस सच्चे सपूत ने 72 वर्ष की उम्र में 1994 में राज्य निर्माण की निर्णायक लड़ाई लड़ी,जिसमें उनके अब तक के किये परिश्रम का प्रतिफल जनता के विशाल सहयोग के रूप में मिला. उस ऐतिहासिक जन आन्दोलन के बाद भी 1994 से अगस्त 1999 तक बडोनी जी उत्तराखंड राज्य के लिए जूझते रहे. मगर अनवरत यात्राओं और अनियमित खान-पान से कृषकाय देह का यह वृद्ध-गांधी बीमार रहने लगा.देहरादून के अस्पतालों, पी.जी.आई. चंडीगढ़ एवं हिमालयन इंस्टीट्यूट में इलाज कराते हुए भी मरणासन्न बडोनी जी हमेशा उत्तराखंड की बात करते थे. गुर्दों के खराब हो जाने से दो-चार बार के डायलिसिस के लिए भी उनके पास धन का अभाव हो गया था. मातृभूमि की प्राणपण से सेवा करते-करते 18 अगस्त 1999 को उत्तराखंड का यह सपूत अनंत यात्रा की तरफ महाप्रयाण कर गया. इसे भी हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस राज्य के लिए बडोनी जी ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया उसके अस्तित्व में आने से पहले ही वह हमें नेतृत्व विहीन करके चला गया.आज हमारे बीच बडोनी जी जैसे नेता होते तो उत्तराखंड की ऐसी दुर्दशा नहीं होती. वह एक पृथक उत्तराखंड राज्य चाहते थे जो अपने मानकों , संस्कृति , भाषा पर आगे बढ़े ।इसी कड़ी में साल 1979 में मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन हुआ था। वह इस दल के आजीवन सदस्य रहे।उन्होंने उक्रांद के बैनर तले राज्य को अलग बनाने के लिए काफी संघर्ष किया था। उन्होंने 105 दिन की पद यात्रा भी की थी। वर्ष 1992 में मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर के प्रसिद्ध उत्तरायणी कौतिक से उन्होंने उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण करने की घोषणा कर दी थी। राज्य आंदोलन हिंसक ना हो उसके लिए उन्होंने हमेशा सभी को साथ मिलकर आगे चलने का मार्ग प्रशस्त किया. उन्होंने कहा कि स्वर्गीय बडोनी हमेशा से ही चकाचौंध से दूर रहा करते थे, क्योंकि पहाड़ उनके दिल में हमेशा बसा रहता था. वहीं, बडोनी पहाड़ की अवधारणा को कैसे पूरा किया जाए सिर्फ इस बात की ही चर्चा किया करते थे. साधारण जीवन में रहकर उन्होंने हमेशा ऊंची सोच रखी. उत्तराखंड की ‘अगस्त क्रांति’ के इस जननायक को उनकी पुण्यतिथि पर हम समस्त उत्तराखंडवासी अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. पहाड़ के इस गांधी को कोटि कोटि नमन!!। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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