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उत्तराखंड में होगा मदरसा बोर्ड का अंत

18/08/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड सरकार ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला लेते हुए राज्य में मदरसा शिक्षा बोर्ड को खत्म करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में रविवार 17अगस्त को हुई कैबिनेट बैठक में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान अधिनियम, 2025को मंजूरी दी गई। इस नए अधिनियम को 19से 22अगस्त तक विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।बता दें, इस कदम का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को एक समान और पारदर्शी ढांचे के तहत लाना है। जिसमें न केवल मुस्लिम समुदाय बल्कि सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदायों के संस्थान भी शामिल होंगे। इसी के साथ सरकार का दावा है कि इस कदम के साथ उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन जाएगा, जिसने सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को मान्यता देने के लिए एकाकीकृत और पारदर्शी प्रक्रिया तैयार की है। जानकारी के अनुसार, नए अधिनियम के लागू होने के बाद 01जुलाई 2026से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016और इससे संबंधित गैर-सरकारी अरबी-फारसी मदरसा मान्यता नियम, 2019को निरस्त कर दिया जाएगा। इसकी जगह उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन होगा, जो सभी अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों की मान्यता और निगरानी का कार्य करेगा।वर्तमान में राज्य में 452पंजीकृत मदरसे हैं, जिन्हें नए प्राधिकरण से पुनः मान्यता प्राप्त करनी होगी। नए नियमों के तहत, मान्यता प्राप्त संस्थानों में गुरुमुखी और पाली जैसी भाषाओं का अध्ययन भी संभव होगा, जिससे इन भाषाओं के विकास को बढ़ावा मिलेगा।दरअसल, हाल के सालों में उत्तराखंड में 500से अधिक अवैध मदरसों की पहचान की गई थी, जिनमें से 237को पहले ही बंद किया जा चुका है। इन मदरसों में छात्रवृत्ति और मिड-डे मील योजनाओं में अनियमितताएं पाई गई थीं। सरकार का मानना है कि नया प्राधिकरण शिक्षा की गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा। साथ ही सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर प्रदान करेगा।वहीं, नए अधिनियम के तहत, अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को मान्यता प्राप्त करने के लिए सख्त शर्तें पूरी करनी होंगी। संस्थानों का सोसाइटी एक्ट, ट्रस्ट एक्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकरण अनिवार्य होगा। साथ ही, संस्थान की भूमि और संपत्ति उसके नाम पर होनी चाहिए। गैर-अल्पसंख्यक छात्रों का नामांकन 15% से अधिक नहीं होना चाहिए। प्राधिकरण पाठ्यक्रम निर्धारित करेगा और धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ मुख्यधारा की शिक्षा को बढ़ावा देगा। देवभूमि उत्तराखंड के सीएम राज्य से मदरसा शिक्षा व्यवस्था हटाने की तैयारी कर रहें हैं। इसके लिए कैबिनेट ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की स्थापना करने का फैसला लिया है।जानकारी के मुताबिक, उत्तराखंड में 452 पंजीकृत मदरसे है इसके अलावा 500 से अधिक मदरसे गैर कानूनी रूप से चल रहे थे जिनमें से 237 को धामी सरकार ने बंद करा दिया है। गौरतलब है कि पिछले दिनों उत्तराखंड के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने मदरसों के छात्रों को मिलने वाली केंद्रीय छात्रवृति में भी भारी अनियमितताएँ सामने लाईं थी। इसके आलावा मिड डे मील को लेकर भी गड़बड़ियाँ पाई थी।अब सरकार ने मदरसा व्यवस्था को अपने अधीन रखने के लिए कैबिनेट से प्रस्ताव पारित कराया है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में राज्य में मदरसा शिक्षा व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।फिलहाल धामी सरकार द्वारा उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक पर गंभीर मंथन किया जा रहा है। इस विधेयक का उद्देश्य उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की स्थापना करना है। राज्य सरकार के मुताबिक, अब तक राज्य में अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान का दर्जा केवल मुस्लिम समुदाय को दिया जाता था, लेकिन प्रस्तावित अधिनियम के लागू होने के बाद सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदायों को भी यह सुविधा मिलेगी। सरकार का दावा है कि इस कदम के साथ उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन जाएगा जिसने सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को मान्यता देने के लिए एकाकीकृत और पारदर्शी प्रक्रिया तैयार की है। इसमें अध्यक्ष के अलावा कुल 11 सदस्य होंगे। इन्हें राज्य सरकार द्वारा नामित किया जाएगा। अध्यक्ष अल्पसंख्यक समुदाय का एक शिक्षाविद् होगा। उसे कम से कम 15 साल का शिक्षण अनुभव होना जरुरी है।अधिनियम के तहत  पूर्व में उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों को शैक्षणिक सत्र 2026-27 से मजहबी शिक्षा प्रदान करने के लिए प्राधिकरण से पुनः मान्यता प्राप्त करना आवश्यक होगा। वहीं 1 जुलाई, 2026 से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और उत्तराखंड अशासकीय अरबी एवं फारसी मदरसा मान्यता विनियमावली, 2019 को निरस्त माना जाएगा।इसके आलावा अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए, संस्थानों को कुछ शर्तें पूरी करना भी अनिवार्य होगा। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि संस्थान किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित और संचालित हो, परिषद से संबद्ध हो, और इसका प्रबंधन एक पंजीकृत निकाय (सोसायटी, न्यास, या कंपनी) द्वारा किया जा रहा हो।वहीं अतिरिक्त, गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों का नामांकन 15% से अधिक नहीं होना चाहिए। प्राधिकरण अल्पसंख्यक समुदाय के धर्मों और भाषाओं से संबंधित विषयों के लिए पाठ्यक्रम विकसित करेगा और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को अतिरिक्त विषयों से संबंधित परीक्षाएँ आयोजित करने, छात्रों का मूल्यांकन करने और प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए मार्गदर्शन देगा।इस विधेयक को राज्य के भीतर अल्पसंख्यक शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह पहली बार है कि उत्तराखंड में इस तरह की व्यवस्था बनाई गई है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक समुदायों के संविधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए सभी अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को मान्यता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है। इस अधिनियम के लागू होने से राज्य में अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से मान्यता मिलेगी। इसके साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे। राज्य सरकार के पास संस्थानों के संचालन की निगरानी करने और समय-समय पर आवश्यक निर्देश जारी करने की शक्ति भी होगी।  उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा, इससे आने वाले समय में सभी समुदायों विशेषकर मुसलमानों को बहुत फायदा होगा. उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी. उन्होंने जोर देकर कहा कि इससे धार्मिक शिक्षा पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वह जारी रखी जाएगी. केंद्र सरकार का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि एक तरफ हमारी केंद्र सरकार मुसलमानों के उत्थान का वादा करते हुए मदरसा आधुनिकीकरण योजना शुरू करती है, एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में लैपटॉप लेकर चलने की बात करती है। कहा जाता है कि इसका मकसद मदरसों का आधुनिकीकरण और उनकी शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना है। लेकिन, दूसरी तरफ उत्तराखंड ने मदरसा बोर्ड को खत्म करने का फैसला किया है। यह जाहिर करता है कि सरकार मुसलमानों को किस तरह से देखती है। यह अफसोस की बात है। उन्होंने मांग की है कि उत्तराखंड में राज्य सरकार की ओर से जो फैसले लिए जा रहे हैं, केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए। उत्तराखंड सरकार ने जो फैसला लिया है, हम मांग करते हैं कि इसे वापिस लिया जाए। बता दें कि उत्तराखंड सरकार ने जहां अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025 को मंजूरी दी, वहीं मानसून सत्र में इसे विधानसभा में पेश किया जाएगा। अभी तक अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान का दर्जा केवल मुस्लिम समुदाय को मिलता था। प्रस्तावित विधेयक के अंतर्गत अब अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध एवं पारसी को भी अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान का दर्जा प्राप्त होगा। यह देश का पहला ऐसा अधिनियम होगा जिसका उद्देश्य राज्य में अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा स्थापित शैक्षिक संस्थानों को मान्यता प्रदान करने हेतु पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित करना है, साथ ही शिक्षा में गुणवत्ता और उत्कृष्टता सुनिश्चित करना है। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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