डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड के कुमाऊ मंडल में नौलों की एक संस्कृति रही है। ऐतिहासिक व कुमाऊं की बेजोड़ शिल्पकला का प्रतीक पंत्यौरा नौला या पंत नौला की स्थिति भी पूर्व की भांति जीर्ण शीर्ण अवस्था में ही है। ऐतिहासिक स्थलों व कला का संरक्षण कर इनको ईको टूरिज्म से जोड़कर स्थानीय लोगों की आजीविका को बढ़ाया जा सकता है। वर्तमान स्थिति इन तस्वीरों में देखकर इनके ऐतिहासिक महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है जो कि संभवत चौदहवीं सदी के आस पास निर्मित संरचनायें प्रतीत होती हैं।पैतृक गांव स्यूंनरा कोटगांव प्रकृति के सुकुमार कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी का पैतृक गांव है। जन्म के समय माताजी की मृत्यु उपरांत उनका लालन-पालन कौसानी, उनके ननिहाल में हुआ जिसका हर साहित्य में उल्लेख मिलता है गांव में पंत जी के पारिवारिक सदस्य श्री ललित प्रसाद पंत जी के प्रयासों से स्मारक हेतु एक नाली भूमि का दान किया गया है व वर्ष २०११-१२ में सोमेश्वर के तत्कालीन विधायक द्वारा स्वीकृत विधायक निधि ७५००० रु० से स्मारक की आधारशिला रखी गई है किन्तु धनाभाव से इसका काम रूका हुआ है। श्री ललित प्रसाद पंत जी द्वारा बताया गया कि इस स्मारक स्थल पर एक पुस्तकालय भी पंतजी की स्मृति में बनाया जाना है जिसके लिए वो प्रयासरत हैं।स्मारक स्थल से नीचे प्राचीन शिल्पकला को दर्शाता पंत नौला भी जीर्ण शीर्ण अवस्था में मिला जो एक विशेष शैली से निर्मित ऐतिहासिक नौला है।लेकिन पैतृक गांव स्यूंनरा कोट आज भी उपेक्षित है। नौलों के ह्रास का कारण हमारी भौतिकतावादी संस्कृति है। जहाँ हम विकास के नाम पर भूमिगत पाइप लाइनों को घर के अधिकांश कमरों में जलापूर्ति हेतु लाये हैं। इससे प्रकृति पर हमारी निर्भरता कम कर रही है। अतः नौला जैसी प्राचीन धरोहर जो हमारे जीवन की मूल आवश्यकताओं से जुड़ी है, को संरक्षित करना होगा। यदि समय रहते समाज में इनके प्रति सही सोच पैदा नहीं हुई तो नौला भी अतीत का हिस्सा बन जाएँगे। आज नौलों का महत्त्व लोगों को तब याद आता है, जब सरकारी पेयजल पाइप लाइनों में नियमित आपूर्ति नहीं होती। ग्रामीण क्षेत्रों में नौलों की दुर्दशा का एक कारण पर्वतीय गाँवों से लोगों का पलायन है। इसके अतिरिक्त विभिन्न नौलों के आस-पास वर्तमान में चल रहे भवन, मार्ग निर्माण आदि से भी नौलों को क्षति होती है। नौलों के आस-पास पाये जाने वाले पेड़ों का कटान, भूकम्प, भूगर्भीय हलचलें भी नौलों के पेयजल स्रोत को नुकसान पहुँचा रही है। ऐसी स्थिति में पर्वतीय क्षेत्र के नौले जो वर्षों से हमारे समाज में किसी-न-किसी प्रकार जुड़े हुए थे, आज सूखते जा रहे हैं। इनको बचाने के लिये प्रबुद्ध नागरिकों को आगे आकर इन अनमोल प्राचीन धरोहरों को सुरक्षित रखने हेतु पूर्ण समर्पण के साथ प्रयास करने होंगे।पहाड़ की इस पुरातन व ऐतिहासिक कलाओं के संरक्षण हेतु प्रयास किया जाये जिससे आने वाली पीढ़ियों को अपनी परंपरा व ऐतिहासिक संस्कृति पर गर्व हो। वन और जल को अलग करके नहीं देख सकते। 1953 में कुमाऊँ जल संस्थान और कुमाऊँ जल निगम बनाए गए। उन्होंने किस तरह हमारी परम्परागत जल व्यवस्था को ध्वस्त किया और अपनी परम्परा का हमने किस तरह विस्मरण किया और इस विस्मरण का दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारी जो परम्परागत जल व्यवस्था थी, उसकी उपेक्षा हुई और उसे हमने भूला दिया। हमारे घर में नलों से पानी आने लगा तो उसे याद करने की जरूरत भी हमने महसूस नहीं की। जिसने हमारी पीढ़ियों को सिंचा उन जलस्रोतों के प्रति हम कृतज्ञ नहीं रहे। अपनी जल परम्पराओं को लेकर यह उदासीन होने का नहीं बल्कि आत्मचिन्तन का समय है। परिवर्तन के लिये जागना जरूरी है। पहले कुमाऊँ क्षेत्र में जो नौले धारे थे, उसके प्रति समाज में एक धार्मिक भावना काम करती थी। जो उनके संरक्षण में भी मददगार साबित हुई। वह भावना अब दरकिनार हो चुकी है। इसलिये इनका संरक्षण वर्तमान परिस्थिति में अब प्रशासन द्वारा किया जाना चाहिए। अब नौलों और धारों के पानी को इकट्ठा करने की जरूरत है और उनके आस-पास निर्माण पर रोक लगाकर, वहाँ चौड़ी पत्ती वाले पेड़ और जड़ी बूटी उपजाने की शुरुआत कर देनी चाहिए पहाड़ का पानी और जवानी अब सिर्फ जुमला बन कर ना रहे हकीकत मे इसमे अब अमल हो यही उम्मीद सरकार से है. हिमालयी क्षेत्र सदियों से पानी, पहाड़ों, नदियों, जलवायु, जैवविविधता एवं वृहत्त सांस्कृतिक विविधता का मूल रहा है। लेकिन गंगा-यमुना नदियों का उद्गम स्थल उत्तराखण्ड, जो समस्त उत्तर भारत को सिंचता है, आज खुद प्यासा है।
लेखक उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।











