डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के दो शहरों की सेहत खराब होने से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में चिंता बढ़ गई है. स्थिति ये है कि पिछले साल के मुकाबले रैंकिंग कमजोर हुई है और इस बात में पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को चिंता में डाल दिया है. बोर्ड के मुताबिक राज्य में ऐसे नए प्रयासों पर काम किया जा रहा है जो तकनीक से जुड़े होंगे और जिससे प्रदूषण नियंत्रण को लेकर राज्य के शहरों की रैंकिंग बेहतर हो सके. वहीं स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में काशीपुर की रैंकिंग 18 से 21वीं, जबकि ऋषिकेश की रैंकिंग 14 से 16वीं हो गई हैउत्तराखंड में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अब देश के अलग-अलग राज्यों में अपनाई जा रही बेहतर व्यवस्थाओं और तकनीकों का अध्ययन किया जाएगा. खासतौर पर काशीपुर और ऋषिकेश में वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए दूसरे राज्यों की बेस्ट प्रैक्टिस को उत्तराखंड में लागू करने की तैयारी है. स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में इन दोनों शहरों की रैंकिंग में गिरावट सामने आने के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है. स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में पिछले साल की तुलना में काशीपुर और ऋषिकेश का प्रदर्शन कमजोर हुआ है. रैंकिंग में आई इस गिरावट ने उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चिंता बढ़ाई है. बोर्ड अब इन दोनों शहरों में प्रदूषण के प्रमुख कारणों को कम करने के साथ ही दूसरे राज्यों में सफल रहे उपायों को अपनाने की तैयारी कर रहा है.देश के विभिन्न राज्यों और शहरों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए किए जा रहे बेहतर कामों का अध्ययन किया जाएगा. इनमें ऐसी व्यवस्थाओं को चिन्हित किया जाएगा, जिनके जरिए कम समय में वायु गुणवत्ता में सुधार किया जा रहा है. इन उपायों को काशीपुर और ऋषिकेश की स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू करने पर काम होगा. प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहने के बजाय तकनीक का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाएगा. इसके लिए अलग-अलग शहरों में जरूरत के मुताबिक नई मशीनें और आधुनिक उपकरण लगाए जाने की योजना है. बोर्ड के मुताबिक ऋषिकेश के लिए भी इस तरह की व्यवस्था पर काम किया जाएगा. निर्माण कार्यों के मलबे के प्रबंधन के साथ-साथ सड़कों की धूल और अन्य प्रदूषणकारी तत्वों को नियंत्रित करने पर जोर रहेगा. दरअसल स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में काशीपुर की रैंकिंग 18 से 21वीं, जबकि ऋषिकेश की रैंकिंग 14 से 16वीं हो गई है. अब इसी गिरावट को रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तकनीक नई मशीनों और दूसरे राज्यों की सफल व्यवस्थाओं को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की योजना में सड़कों और खुले क्षेत्रों से उड़ने वाली धूल को कम करना अहम हिस्सा है. धूल के कण हवा की गुणवत्ता खराब करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं. ऐसे में सड़कों की सफाई और धूल नियंत्रण के लिए मैकेनिकल रोड स्वीपिंग मशीनों का इस्तेमाल बढ़ाया जाएगा.अभी प्रदेश में सीमित स्तर पर इन मशीनों के जरिए सफाई की जा रही है. देहरादून में मैकेनिकल स्वीपिंग मशीनों से सड़कों की सफाई का काम रात के समय किया जाता है. इसी तर्ज पर दूसरे शहरों में भी मशीनों के जरिए सफाई की व्यवस्था विकसित करने की तैयारी है. इससे सड़कों पर जमा धूल को हटाने के साथ ही सफाई व्यवस्था को भी बेहतर किया जा सकेगा. प्रदूषण नियंत्रण के साथ ही निर्माण कार्यों से निकलने वाले मलबे के निस्तारण पर भी फोकस किया जा रहा है. काशीपुर में कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की योजना पर काम चल रहा है. यहां शहर से निकलने वाले भवन निर्माण और तोड़फोड़ से जुड़े मलबे को वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित किया जाएगा.बोर्ड के मुताबिक ऋषिकेश के लिए भी इस तरह की व्यवस्था पर काम किया जाएगा. निर्माण कार्यों के मलबे के प्रबंधन के साथ-साथ सड़कों की धूल और अन्य प्रदूषणकारी तत्वों को नियंत्रित करने पर जोर रहेगा. दरअसल स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में काशीपुर की रैंकिंग 18 से 21वीं, जबकि ऋषिकेश की रैंकिंग 14 से 16वीं हो गई है. अब इसी गिरावट को रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तकनीक नई मशीनों और दूसरे राज्यों की सफल व्यवस्थाओं को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. शहर की आबोहवा इन दिनों सांस के रोगियों के लिए मुसीबत का सबब बन रही है. स्वच्छ हवा के लिए पहचान रखने वाला देहरादून शहर में वायु प्रदूषण की स्थिति दीपावली के रात से ही बनी हुई है. इससे विशेष कर श्वांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन का तेजी से विस्तार हुआ है. लाखों पर्यटक साल भर देव स्थलों पर पहुंच रहे हैं. लेकिन यही पर्यटन पहाड़ के पर्यावरण पर भारी पड़ने लगा है. नैनीताल का कैंचीधाम हो या फिर बद्रीनाथ यहां प्रदूषण का लेवल कई गुना बढ़ने लगा है, जिससे हवा पानी खराब हो रही है. हालात इस कदर बिगड़ रहे हैं कि स्थानीय व पर्यटक सब को स्लो प्वाइजन इन इलाकों में मिल रहा है. पहाड़ों के धार्मिक पर्यटन में वाहनों का ये दबाव पर्यावरण पर भारी पड़ने लगा है. स्वास्थ्य लाभ के लिये पहुंच रहे भक्तों पर सीधा असर पड़ने लगा है. दरअसल कैंचीधाम व बद्रीनाथ में नॉन मीथेन हाईड्रोकाँर्बन बढ़ने का सबसे बड़ा जरिया गाड़ियों की भीड़ और उससे निकलने वाला धुआं है. तेजी से बड़े वाहनों के प्रेशर से आबोहवा खराब होने के साथ इसका असर पानी, हवा, पर्यावरण व यहां की जैव विविधता पर सीधे तौर पर पड़ा है हिमालयी क्षेत्रों के लिये कैंपेन में ये सब कुछ सामने आया है. तो साल दर साल इन इलाकों में बढ़ रहे वाहनों की भीड़ को कम करने का कोई प्लान लागू ही नहीं हो सका है. तेजी से बढ़ रहे इस स्लो प्वाइजन सांस से लेकर कैंसर तक की बीमारी दे सकता है .हांलाकि अधिकारी कहते हैं कि वाहनों के दबाव को कम करने के लिये प्लानिंग की जा रही है.ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इन मुद्दों पर नए सिरे से गंभीरता दिखानी होगी।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











