• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

पर्यावरण संरक्षण, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है हरेला

16/07/21
in उत्तराखंड, संस्कृति
Reading Time: 1min read
477
SHARES
596
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter
https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हरेला का शाब्दिक अर्थ हर धन एला अर्थात हर भगवान शंकर और एला स्त्री सूचक होने से माता पार्वती का आभास कराता है। लोक परंपरा में हरेला त्योार पर्व बन गया। ऋग्वेद में कृषि कृणत्व अर्थात खेती करो के तहत इसका उल्लेख है। सावन मास की शुरुआत शुभ दिन से की जाती है। हरेला का अर्थ हरियाली से है। हरेला के दिन इसे काटने के बाद तिलक, चंदन, अक्षत लगाया जाता है। घर के सभी बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे इसे शिरोधारण करते हैं। इस मौके पर सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य की कामना की जाती है। यह प्रकृति पूजन का प्रतीक भी है। यहां लोग पीपल, वट, आम, हरड़, आंवला आदि के पौधों का किसी न किसी रूप में पूजन करते हैं जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं इस त्योहार को मनाने से समाज कल्याण की भावना विकसित होती है।

हरेला पर्व पर नौ दिन पूर्व घर के मंदिर में बोया गया हरेला मंत्रोच्चार के बीच विधिविधान से काटकर सभी परिजनों, पड़ोसियों, ईष्टमित्रों को शिरोधारण कराया जाता है। हरेला पर्व के साथ ही सावन मास शुरू हो जाता है। पर्व से नौ दिन पूर्व घर में स्थापित मंदिर में पांच या सात प्रकार के अनाज को मिलाकर एक टोकरी में बोया जाता है। हरेले के तिनके अगर टोकरी में भरभराकर उगें तो माना जाता है कि इस बार फसल अच्छी होगी। हरेला काटने से पूर्व कई तरह के पकवान बनाकर देवी देवताओं को भोग लगाने के बाद पूजन किया जाता है। हरेला पूजन के बाद घर परिवार के सभी लोगों को हरेला शिरोधारण कराया जाता है। इस मौके पर लाग हर्याव, लाग बग्वाल, जी रयै, जागि रयै, यो दिन बार भेटने रयै, शब्दों के साथ आशीर्वाद दिया जाता है।

कुमाऊं में हरेले की समृद्ध परंपरा रही है। पूर्व में परिजन अपने संबंधियों, घर से दूर प्रदेश में नौकरी करने वालों को हरेले के तिनके और देव मंदिर की अशीका फूल डाक से भेजते थे। आज भी कई परिवारों में यह परंपरा जारी है। हरेला पर्व पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। इस पर्व से मौसम को पौधरोपण के लिए उपयुक्त माना जाता है। हरेला बोने के लिए उसी खेत की मिट्टी लाई जाती है जिसमें उचित पौधों के रोपण और अच्छी फसल का परीक्षण हो सके। सात या पांच प्रकार का अनाज बोया जाता है जो अनुकूल मृदा और मौसम चक्र का आभास कराता है। हरेला पर्व पौधरोपण, मृदा परीक्षण और मौसम चक्र का भी द्योतक है, लेकिन आज के दौर में वनों का जिस तरह दोहन हो रहा है, यह हमारी इस परंपरा पर कुठाराघात भी है। खेत की मिट्टी को जांचने का वैज्ञानिक तरीका है हरेला। पांच या सात प्रकार के अनाज को बोकर उसके अंकुरण से पता चलता था कि यह मिट्टी कैसी है और इस बार फसल कैसी होगी। इस परंपरा को त्योहार से जोड़कर युवा पीढ़ी जो आज खतड़ुवा, फूलदेई, हरेला जैसे पर्वों से दूर हो रही है, उसे इसके महत्व से रूबरू कराना है।

युवा पीढ़ी भविष्य में इसके महत्व को समझे। उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों विशेषकर कुमाऊँ अंचल में हरेला मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। उमंग और उत्साह के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व को ऋतु उत्सवों में सर्वाेच्च स्थान प्राप्त है। हरेला पर्व सौरमास श्रावण के प्रथम दिन यानि कर्क संक्रान्ति को मनाया जाता है। परम्परानुसार पर्व से नौ अथवा दस दिन पूर्व पत्तों से बने दोने या रिंगाल की टोकरियों में हरेला बोया जाता है। जिसमें उपलब्धतानुसार पाँच, सात अथवा नौ प्रकार के धान्य यथा. धान, मक्का, तिल, उड़द, गहत, भट्ट, जौं व सरसों के बीजों को बोया जाता है। देवस्थान में इन टोकरियों को रखने के उपरान्त रोजाना इन्हें जल के छींटों से सींचा जाता है। दो.तीन दिनों में ये बीज अंकुरित होकर हरेले तक सात.आठ इंच लम्बे तृण का आकार पा लेते हैं। हरेला पर्व की पूर्व सन्ध्या पर इन तृणों की लकड़ी की पतली टहनी से गुड़ाई करने के बाद इनका विधिवत पूजन किया जाता है। कुछ स्थानों में इस दिन चिकनी मिट्टी से शिव.पार्वती और गणेश.कार्तिकेय के डिकारे मूर्त्तियाँ बनाने का भी रिवाज है। इन अलंकृत डिकारों को भी हरेले की टोकरियों के साथ रखकर पूजा जाता है। हरेला पर्व के दिन देवस्थान में विधि.विधान के साथ टोकरियों में उगे हरेले के तृणों को काटा जाता है। इसके बाद घर.परिवार की महिलाएँ अपने दोनों हाथों से हरेले के तृणों को दोनों पाँव, घुटनों व कन्धों से स्पर्श कराते हुए और आशीर्वाद युक्त शब्दों के साथ बारी.बारी से घर के सदस्यों के सिर पर रखती हैं।

इस दिन लोग विविध पहाड़ी पकवान बनाकर एक दूसरे के यहाँ बाँटा जाता है। गाँव में इस दिन अनिवार्य रूप से लोग फलदार या अन्य कृषिपयोगी पेड़ों का रोपण करने की परम्परा है। लोक.मान्यता है कि इस दिन पेड़ की टहनी मात्र के रोपण से ही उसमें जीवन पनप जाता है। यदि हम गहराई से देखें तो हरेला पर्व सीधे तौर पर प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाने की भूमिका में नजर आता है। मानव के तन.मन में हरियाली हमेशा से ही प्रफुल्लता का भाव संचारित करती आई है। यह पर्व लोक विज्ञान और जैव विविधता से भी जुड़ा हुआ है। हरेला बोने और नौ.दस दिनों में उसके उगने की प्रक्रिया को एक तरह से बीजांकुरण परीक्षण के तौर पर देखा जा सकता है। इससे यह सहज पूर्वानुमान लग जाता है आगामी फसल कैसी होगी। हरेले में मिश्रित बीजों के बोने की जो परम्परा है वह बारहनाजा अथवा मिश्रित खेती की पद्धति के महत्त्व को भी दर्शाता है।परिवार व समाज में सामूहिक और एक दूसरे की भागीदारी से मनाया जाने वाला यह लोक पर्व सामाजिक समरसता और एकता का भी प्रतीक है क्योंकि संयुक्त परिवार चाहे कितना भी बड़ा हो पर हरेला एक ही जगह पर बोया जाता है और.तो.और कहीं.कहीं पूरे गाँव का हरेला सामूहिक रूप से एक ही जगह विशेषकर गाँव के मन्दिर में भी बोया जाता है।

पहले हरेले पर कई स्थानों में मेले भी लगते थे परन्तु आज वर्तमान में छखाता पट्टी के भीमताल व काली कुमाऊँ के बालेश्वर व सुई.बिसुंग में ही मेले आयोजित होते हैं। हरेला पर्व में लोक कल्याण की एक अवधारणा निहित है। समूचे वैश्विक स्तर पर आज पूँजीवादी और बाजारवादी संस्कृति जिस तरह प्रकृति और समाज से दूर होती जा रही है यह बहुत चिन्ताजनक बात है। ऐसे में निश्चित तौर पर लोक के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व हमें प्रकृति के करीब आने का सार्थक सन्देश देता है। हरेला के इस पर्व को सरकार ने अब पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण से जोड़ दिया है। यह एक अच्छी पहल है। इससे संस्कृति के साथ लोगों का जुड़ाव होगा। इस जुड़ाव के साथ यह पर्व धीरे.धीरे पहाड़ों से बाहर भी मनाया जाने लगा है। आज जब पर्यावरण पर गहरा संकट है। मनुष्य का लालच दिनों.दिन प्रकृति का दोहन कर रहा है तो ऐसे में एक पर्व प्रकृति को बचाने और उसकी तरफ लौटने का संदेश देता है तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है। अच्छा ही है, यदि हम अपनी परंपरा से कुछ ग्रहण करके समाज के लिए उसका सार्थक प्रयोग करते हैं। बाकी आज जिस आधुनिक समाज में हम रह रहे हैं वहां तो पर्यावरण को नष्ट करने के हजारों तरीके और उत्सव ईजाद कर लिए गए हैं और हम उन्हीं के उत्सव में खोए रहते हैं। पर्यावरण दोहन के इस दौर में हरेला जैसा पर्व अँधेरे समय में विचार सरीखे है। जहाँ एक रौशनी की किरण नजर आती है। इस रौशनी में पर्यवारण के साथ .साथ वह सामूहिक चेतना भी नजर आती है जो अब बहुत कम ही बची हैण्समाज और प्रकृति में हरेले की महत्ता को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार भी पिछले साल से सरकारी स्तर पर हरेला मनाने की कवायद कर रही है जिसके तहत राज्य में पर्यावरण और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए जन चेतना और जागरुकता पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं।

Share191SendTweet119
Previous Post

आशु लिपिक, वैयक्तिक सहायक परीक्षा के परिणाम घोषित

Next Post

ऊर्जा मंत्री हरक सिंह रावत ने की ऊर्जा विभाग की समीक्षा

Related Posts

उत्तराखंड

राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के अंतर्गत ब्लॉक स्तरीय विज्ञान क्विज प्रतियोगिता का आयोजन

January 16, 2026
39
उत्तराखंड

किसान आत्महत्या मामले में कांग्रेस का पुलिस मुख्यालय कूच, डोईवाला से बड़ी संख्या में कांग्रेसी शामिल

January 16, 2026
16
उत्तराखंड

डोईवाला: केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ किसानों का प्रदर्शन

January 16, 2026
23
उत्तराखंड

नुक्कड़ सभा में अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मांग

January 16, 2026
11
उत्तराखंड

पूर्व सैनिक नायक कलम सिंह बिष्ट को सम्मानित किया गया

January 16, 2026
11
उत्तराखंड

वीबी जी राम जी योजना से गांवों में रोजगार की मजबूत नींव रख रही है भाजपा: दीप्ति रावत

January 16, 2026
31

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67583 shares
    Share 27033 Tweet 16896
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45769 shares
    Share 18308 Tweet 11442
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38040 shares
    Share 15216 Tweet 9510
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37430 shares
    Share 14972 Tweet 9358
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37312 shares
    Share 14925 Tweet 9328

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के अंतर्गत ब्लॉक स्तरीय विज्ञान क्विज प्रतियोगिता का आयोजन

January 16, 2026

किसान आत्महत्या मामले में कांग्रेस का पुलिस मुख्यालय कूच, डोईवाला से बड़ी संख्या में कांग्रेसी शामिल

January 16, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.