डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारतीय हिमालय को आमतौर पर बर्फीली चोटियों, ग्लेशियरों और नदियों के उद्गम क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, लेकिन हिमालय की पहचान इन्हीं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कहीं ज्यादा है. हिमालय में मौजूद वनस्पतियां सदियों से स्थानीय और आदिवासी समुदायों के लिए भोजन, दवा, ईंधन, चारा, निर्माण सामग्री और धार्मिक-सांस्कृतिक जरूरतों का आधार रही हैं.भारतीय हिमालय की इसी जैव सांस्कृतिक विरासत पर वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसमें चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. खास बात ये है कि देश के सभी हिमालयी राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड में सबसे ज्यादा 44.6 फीसदी उपयोगी प्रजातियां पाई गई हैं. बता दें कि भारतीय हिमालय में मनुष्यों की ओर से इस्तेमाल की जाने वाली 5,404 प्रजातियां दर्ज की गई हैं. इनमें पौधों के अलावा फंगी, लाइकेन और शैवाल भी शामिल हैं. अध्ययन के अनुसार, दर्ज 5,404 उपयोगी प्रजातियों में करीब 90 फीसदी एंजियोस्पर्म यानी पुष्पीय पौधे हैं. करीब 4.5 फीसदी प्रजातियां फंगी से संबंधित हैं. जीवन-रूप के आधार पर 49.3 फीसदी प्रजातियां जड़ी-बूटियां हैं. इन प्रजातियों के सबसे ज्यादा इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में पाया गया है. 49 फीसदी प्रजातियों का मानव भोजन में हो रहा इस्तेमाल: मुख्य रूप से 96.4 फीसदी प्रजातियां किसी न किसी औषधीय इस्तेमाल से जुड़ी हैं. जबकि, 49 फीसदी प्रजातियों का इस्तेमाल मानव भोजन के लिए होता है. इसके अलावा 36.6 फीसदी प्रजातियों का इस्तेमाल सामग्री के रूप में पाया गया है. इतना ही नहीं कई प्रजातियों का इस्तेमाल एक साथ दवा, भोजन, चारा, ईंधन और धार्मिक-सांस्कृतिक जरूरतों के लिए किया जाता है. अध्ययन में पाया गया कि इन पौधों के अलग-अलग हिस्सों का उपयोग किया जा रहा हैं. सबसे ज्यादा इस्तेमाल पत्तियों का पाया गया. पौधों के हिस्सों के उपयोग के आंकड़ों पर गौर करें तो, सबसे ज्यादा 2,771 प्रजातियों के पत्तियों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके अलावा, 1,647 प्रजातियों के पूरे पौधे, 1488 प्रजातियों के फलों, 1411 प्रजातियों के जड़ों, 858 प्रजातियों का तना और 821 प्रजातियों के फूल का इस्तेमाल किया जा रहा है. औषधीय पौधों का मामला सिर्फ संरक्षण तक सीमित नहीं है. इनका दोहन एवं व्यापार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है. अनुमानों के अनुसार, भारत में औषधीय पौधों के दोहन एवं उनका व्यापार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सालाना करीब 3.5 करोड़ तक का है. ऊंचाई वाले गांवों में इन गतिविधियों से परिवारों की आय का करीब 15 से 30 फीसदी हिस्सा जुड़े होने की संभावना है. ऐसे में संरक्षण और आजीविका को अलग-अलग करके देखना काफी मुश्किल है. रिपोर्ट में इस बात को कहा गया है कि जिन-जिन औषधीय पौधों की डिमांड बाजार में ज्यादा है, उसका दोहन ज्यादा होता है. जिससे इनकी प्राकृतिक आबादी घट सकती है. दोहन करने वालों की आय प्रभावित हो सकती है. पारंपरिक ज्ञान के ट्रांसफर पर असर पड़ सकता है. ग्रामीण युवाओं का पलायन बढ़ सकता है. स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर हो सकती है.पौधों के साथ पारंपरिक ज्ञान भी संकट में आ सकता है. हिमालय में पौधों के उपयोग से जुड़ा ज्ञान लंबे समय तक मौखिक परंपरा के जरिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा है, लेकिन आधुनिकीकरण, शहरों की ओर पलायन और युवा पीढ़ी का पारंपरिक जीवन-पद्धतियों से दूर होना, इस ज्ञान-हस्तांतरण को प्रभावित कर रहा है. जटिल और गंभीर बीमारियों के उपचार से जुड़ा ज्ञान अक्सर कुछ अनुभवी वैद्यों या पारंपरिक उपचारकर्ताओं तक सीमित होता है. कई जगह ये ज्ञान सीमित शिष्य-परंपरा के जरिए आगे बढ़ता है. ऐसे में किसी एक अनुभवी ज्ञान-धारक की मृत्यु या सक्रिय जीवन से बाहर होने पर पूरी ज्ञान-श्रृंखला खत्म होने का खतरा रहता है. इसलिए संरक्षण की रणनीति में पौधों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों, पारंपरिक उपचारकर्ताओं और उनके ज्ञान पर भी ध्यान देना जरूरी है. इसके अलावा उत्तराखंड में पहले से ही काफी व्यापक शोध हो चुका है. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











