इक्कीसवीं सदी में सड़क पर प्रसूति और बच्चे की मौत का भी कोई असर नहीं होता सरकार पर

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संपादकीय
शंकर सिंह भाटिया

देहरादून में चार दिवसीय विधानसभा सत्र संपन्न हो गया, लेकिन कुछ भी ऐसा निकलकर नहीं आया, जिससे खुश हुआ जा सकता है। सदन में वही पुराना ढर्रा प्रदर्शित होता रहा। मंत्रियों के पास सवालों के जवाब नहीं होते, मतलब कि वे तैयारी करके ही नहीं आते। इस प्रचंड बहुमत की सरकार में एक नया चलन आया है। हर सत्र में विपक्ष सुस्त दिखाई देता है, खुद सत्ता पक्ष के विधायक अपनी ही सरकार के मंत्रियों का निरूत्तर करते रहते हैं।

इस बार भी यही हुआ, बल्कि अब सरकार के अंदर विपक्ष की भूमिका ज्यादा तीखी होती चली जा रही है। स्थायी राजधनी गैरसैंण पर जो ढुलमुल रवैया पिछली सरकार का था, उससे भी अधिक टरकाने वाला रवैया इस सरकार का दिखाई देता है। गैरसैंण पर विपक्षी पार्टी औपचारिता के लिए सवाल उठाती है, सरकार का जवाब गोलमोल होता है। रस्म अदायगी के तौर पर विपक्ष सदन से वाकआउट करता है, बिल्कुल पुरानी स्क्रिप्ट इस बार भी दोहराई गई।

जब विधानसभा का सत्र चल रहा था, 6 दिसंबर को चमोली जिले के घाट के घुनी गांव निवासी मोहन सिंह अपनी 32 वर्षीय पत्नी को प्रसव के लिए जिला अस्पताल गोपेश्वर लेकर पहुंचे। गोपेश्वार जिला अस्पताल के डाक्टरों ने जांच कर बताया कि बच्चे की धड़कन कमजोर है, इसलिए हायर सेंटर ले जाओ। न एंबुलेंस दी गई और न ही कोई चिकित्सकीय सहायता दी गई। जीएमओयू की बस में बैठाकर मोहन सिंह अपनी गर्भवती पत्नी को इसी हालत में श्रीनगर के लिए निकले, रास्ते मंे महिला की प्रसव पीढ़ा बढ़ने लगी तो वह कराहने लगी। चालक परिचालक ने उन्हें बस से नीचे उतार दिया।

सह यात्रियों ने उसकी सहायता करने के बजाय चालक परिचालक पर उन्हें बस से उतारने का ही दबाव बनाया। इस घटनाक्रम ने मानवता को पूरी तरह शर्मशार कर दिया। प्रसूता ने सड़क किनारे ही बच्चे को जन्म दिया और बच्चे की मौत हो गई। पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल देने वाली और मानवता को शर्मशार कर देने वाली घटना से सदन में माननीय उतने नहीं पसीजे, इससे अधिक चिंतित वे स्टिंगबाज पत्रकार की गिरफ्तारी से होते हुए दिखाई दिए। यह साबित करता है कि माननीयों के मन में पहाड़ की संवेदनाएं मर चुकी हैं। उन्हें इस तरह झकझोर देने वाली पहाड़ की घटनाएं हिला भी नहीं सकती।

इस दौरान केदारनाथ फिल्म भी रिलीज हुई। हाई कोर्ट ने फिल्म पर रोक लगाने से मना किया तो जनदबाव में सरकार को इसके लिए एक कमेटी बनानी पड़ी। कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज की अध्यक्षता में कमेटी बनी। सतपाल महाराज ने साफ कह दिया कि यह फिल्म ‘‘लव जिहाद’’ को बढ़ावा देने वाली है। जिलाधिकारियों के माध्यम से उत्तराखंड के सात जिलों में इसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई, अन्य जिलों में सिनेमाघर हैं ही नहीं।

इसी बीच राज्य सरकार द्वारा गठित पलायन आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी, जिसमें पलायन से सबसे अधिक प्रभावित जिले पौड़ी में पलायन की मुख्य वजह रोजगार बताया गया है। 2011 के बाद पौड़ी जिले में 25 प्रतिशत गांव और तोक मानविहीन हो गए। इस दौरान 186 गांव और तोक जनशून्य हो गए। 112 गांव और तोकों की जनसंख्या में 50 फीसदी कमी आई। इस रिपोर्ट में एक बात खुलकर सामने आई है कि पौड़ी जिला जो गढ़वाल का मंडल मुख्यालय भी है की योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही बनी। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पशुपालन हर स्तर पर चिंतनीय कमी दर्ज की गई। यह गंभीर सवाल भी सदन की चिंता का विषय नहीं बन पाया।

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