डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
महानगरीय संस्कृति के प्रभाव से आज कुमाउँनी भाषा और संस्कृति अपनी पहचान खोने के दौर से गुजर रही है. ऐसे कठिन दौर में हमारे बीच से हीरा सिंह राणा जैसे लोककवि और दुदबोलि भाषा के उन्नायक लोक गायक का अचानक ही चला जाना बहुत ही दुःखद था. उनके साहित्यिक और लोकगायिकी से कुमाउँनी भाषा और संस्कृति को लोकप्रियता के नए आयाम मिले हैं,इसलिए यह पर्वतीय लोकसंस्कृति के लिए भी अपूरणीय क्षति थी. आज उत्तराखंड के लोकगायक श्री हीरा सिंह राणा को शत शत नमन! अभिवंदन! लोक गायक हीरा सिंह राणा का जन्म 16 सितंबर 1942 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के मानिला डंढोली गांव में हुआ था.
उन्होंने अपनी पढ़ाई की शुरुआत यहीं से की. प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद वो दिल्ली मैं नौकरी करने लगे. उनका मन नौकरी में नहीं लगा तो संगीत के लिए मिली स्कॉलरशिप से कलकत्ता पहुंच गए. वहां वो कुमाऊंनी संगीत की सेवा में जुटे रहे. हीरा सिंह राणा ने 15 साल की उम्र से ही विभिन्न मंचों पर गाना शुरू कर दिया था.लोक गायक हीरा सिंह राणा का जन्म 16 सितंबर 1942 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के मानिला डंढोली गांव में हुआ था. उन्होंने अपनी पढ़ाई की शुरुआत यहीं से की. प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद वो दिल्ली मैं नौकरी करने लगे. उनका मन नौकरी में नहीं लगा तो संगीत के लिए मिली स्कॉलरशिप से कलकत्ता पहुंच गए. वहां वो कुमाऊंनी संगीत की सेवा में जुटे रहे. हीरा सिंह राणा ने 15 साल की उम्र से ही विभिन्न मंचों पर गाना शुरू कर दिया था.हीरा सिंह राणा प्राथमिक शिक्षा मानिला से ही पूरी करने के बाद दिल्ली मैं नौकरी करने लगे थे। पर मन तो अपने पहाड़ों में था, पहाड़ों के संगीत में था। इसलिए दिल्ली छोड़ दी। और उसके बाद ताउम्र कुमाऊनी संगीत की सेवा करते रहे।उन्हें अपनी जन्मभूमि से बेहद लगाव था। वह उसकी बलाई लेेते। समाज को अपनी मातृभूमि से जोडऩे के लिए उन्होंने गीत रचा ‘मेरी मानिला डानी हम तेरी बलाई ल्यूला, तू भगवती छ भवानी हम तेरी बलाई ल्यूना..।’ राणा कविताएं भी रचते थे। पहाड़ की महिला के संघर्ष को महसूस किया तो रचना फूटी ‘पहाड़ाक महिलाओंक तप और त्याग, आफी बड़ा जैले आपड़ भाग, राजुली सैक्याणी मालू घस्यारी, रामी बैराणा पहाड़ की नारी..।’ वह राज्य आंदोलन में भी सक्रिय रहे। नवोदित उत्तरांचल राज्य बनने की खुशी में गीत रचते हुए लिखा ‘उत्तरांचल राज्य हैगो गीत गाओ, फूंको हो रणसिंह नगाड़ ढोल बजाओ..।’ मगर राज्य बनने के बाद भी हालात नहीं बदले। पलायन, बेरोजगारी की पीड़ा को महसूस करते हुए उन्होंने मार्मिक कविता रची। ‘त्यर पहाड़ म्यर पहाड़, रयो दुखों को ड्यर पहाड़, बुजुर्गों लै जोड़ पहाड़, राजनीति लै तोड़ पहाड़, ठेकदारों लै फोड़ पहाड़, नानतिनू लै छोड़ पहाड़..। इसके बाद भी हीरा राणा हौसला और उम्मीद भरते हुए लिखते हैं ‘लस्का कमर बांधा हिम्मत का साथ, फिर भोल उज्याल होली कां लै रोली रात..।’ हीरा सिंह राणा भले हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके कालजयी गीत हमें सदा आनंदित करते रहेंगे।हीरा सिंह राणा को उत्तराखंड के उन चुनिंदा लोक कलाकारों में गिना जाता है जिन्होंने अपने गीतों के जरिए पहाड़ की संस्कृति, सामाजिक सरोकारों और जनजीवन को लोगों तक पहुंचाया. उनके गीतों में लोकजीवन की सादगी, संघर्ष और भावनाओं की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी. यही वजह है कि उनकी रचनाएं आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं.गढ़वाली- कुमाऊंनी,- जौनसारी भाषा अकादमी दिल्ली के पहले उपाध्यक्षथैपलायन पर भी एक सुन्दर व्यंग्य-गीत लिखा था। उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद दिल्ली से उत्तराखण्ड की साहित्यिक-सांस्कृतिक राजधानी के देहरादून-हल्द्वानी शिफ्ट हो जाने के बाद फिर से दिल्ली में उत्तराखण्ड की साहित्यिक-सांस्कतिक गतिविधियों को राज्याश्रय दिलवाने के लिए हीरा सिंह राणा अर्थात हमारे हिरदा को सदैव याद किया जाएगा।महानगरीय संस्कृति के प्रभाव से आज कुमाउँनी भाषा और संस्कृति अपनी पहचान खोने के दौर से गुजर रही है. ऐसे कठिन दौर में हमारे बीच से हीरा सिंह राणा जैसे लोककवि और दुदबोलि भाषा के उन्नायक लोक गायक का अचानक ही चला जाना बहुत ही दुःखद था. उनके साहित्यिक और लोकगायिकी से कुमाउँनी भाषा और संस्कृति को लोकप्रियता के नए आयाम मिले हैं,इसलिए यह पर्वतीय लोकसंस्कृति के लिए भी अपूरणीय क्षति थी. आज उत्तराखंड के लोकगायक श्री हीरा सिंह राणा को शत शत नमन!
लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











