डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग की खस्ता हालत लंबे समय से चर्चाओं में है. केंद्र सरकार स्तर पर उचित पैरवी के अभाव में सड़क लंबे समय से तकनीकी अड़चनों के मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पा रही है. 5 साल पहले सड़क को दो लेन किए जाने की घोषणा के बाद सड़क का समरेखण कार्य तो स्वीकृत हो चुका है, लेकिन विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार न होने से मामला फाइलों में ही अटका हुआ है.दरअसल, महत्वपूर्ण मार्ग होने के बाबजूद अब तक एक लेन सड़क होने का खामियाजा राजमार्ग किनारे बसे बाजारों और इस पर सफर करने वाले यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है. सड़क पर बेहिसाब गड्ढे जहां हादसों को न्यौता दे रहे हैं, तो वहीं आए दिन का जाम परेशानियों का सबब बना हुआ है. जिससे ग्रीष्मकालीन राजधानी परिक्षेत्र के मेहलचौरी, गैरसैंण, आदिबदरी और सिमली बाजार समस्या से जूझ रहे हैं.गौर हो कि उत्तराखंड के मध्य भू-भाग से गुजरने वाली 235 किलोमीटर की लंबी राजमार्ग संख्या 109 (पूर्व में 87) कुमाऊं क्षेत्र के नैनीताल जिले के ज्योलिकोट से शुरू होकर चमोली जिले के कर्णप्रयाग में ॠषिकेश-बदरीनाथ राजमार्ग 7 से मिलान करता है. जो कि दोनों मंडलों के सामरिक महत्व के शहरों, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, धार्मिक-पर्यटन व व्यापारिक क्षेत्रों को जोड़ने का काम करती है. यह मार्ग नैनीताल जिले के भवाली, कैंची धाम, अल्मोड़ा, मजखाली, रानीखेत, द्वाराहाट, चौखुटिया होते हुए पांडुवाखाल से चमोली की सीमा में प्रवेश करती है. भारत-चीन युद्ध के दौरान छठे दशक में बनी यह सड़क 65 सालों के लंबे अंतराल बाद भी उपेक्षा झेलने वाली सड़कों में शामिल है. सड़क के महत्व को देखते हुए साल 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कार्यकाल के अंतिम महीनों में तत्कालीन केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री ने इसे राजमार्ग घोषित किया, लेकिन 22 सालों बाद भी यह राजमार्ग सड़कों की मानक गुणवत्ता की सुविधाओं से आज भी वंचित है. इस मार्ग के महत्व को देखते हुए केंद्र सरकार ने साल 2021 में इसे राष्ट्रीय परियोजना के तौर पर ऑल वेदर रोड डिजाइन में दो लेन बनाने की घोषणा की. जिसको लेकर एक परामर्शदाता (कंसल्टेंसी) कंपनी को विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई.जिसके तहत चौड़ीकरण की जद में आने वाली भूमि का अधिग्रहण, मुआवजा व वन भूमि के मामलों को लेकर औपचारिकताएं पूरी करनी थी, लेकिन तय तीन साल की अवधि में डीपीआर तैयार न होने पर इसी साल मार्च महीने में अनुबंध समाप्त कर दिया गया है. अब तक तैयार समरेखण के हिसाब से ऑल वेदर रोड की तर्ज पर चौड़ीकरण होने के साथ ही मार्ग पर पुराने पुलों की जगह नए पुल, बाईपास मार्ग, सुरंग मार्ग निर्माण शामिल हैं. यातायात को सुगम और सरल बनाने के साथ ही समय बचाने के लिए अल्मोड़ा जिले के रानीखेत के गगास व चौखुटिया और चमोली के मेहलचौरी के पुल डबल लेन के बनाए जाने हैं. इसके अलावा चमोली के गैरसैंण, आदिबदरी और कर्णप्रयाग बाजारों में बाईपास सड़कें बनाए जाने के प्रस्ताव शामिल हैं. इसके तहत कर्णप्रयाग में दो पुल व एक टनल का निर्माण कर बदीरनाथ नेशनल हाईवे एनएच 7 पर मिलाया जाना प्रस्तावित है. वहीं, अल्मोडा के अंतर्गत चौखुटिया और द्वाराहाट बाजार भी बाईपास होंगे.वहीं, मेहलचौरी से निकटवर्ती सिमलखेत और कालीमाटी गैरसैंण के पास से खेती के बीच दो टनलों के निर्माण की संभावनाओं को लेकर प्रस्ताव प्राधिकरण को भेजे गए हैं, जो अभी अंतिम रूप से स्वीकृत नहीं हैं. जबकि, द्वाराहाट और गगास टनलों के निर्माण के लिए भी प्रस्ताव सुझाव के रूप में भेजे जा रहे हैं. 2004 में राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित होने के बाद चमोली, अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों से गुजरने वाले इस 235 किलोमीटर लंबे मार्ग पर साल 2016 से चौड़ीकरण का काम शुरू हुआ. इसके तहत नैनीताल जिले के हल्द्वानी डिवीजन के अंतर्गत ज्योलिकोट से खैरना तक 35 किलोमीटर का डेढ़ लेन का काम हुआ.इसके अलावा रानीखेत डिवीजन के अंतर्गत खैरना से पांडुवाखाल 136 किलोमीटर में खैरना से क्वारब तक 20 किलोमीटर डबल लेन, तो आगे कहीं डेढ़ लेन और सिंगल लेन सड़क है. जबकि, रुद्रप्रयाग डिवीजन के अंतर्गत ग्रीष्मकालीन राजधानी परिक्षेत्र गैरसैंण के अंतर्गत पांडुवाखाल से कर्णप्रयाग तक 64 किलोमीटर सड़क में से महज 10 किलोमीटर की सड़क ही सिमली से चांदपुरगढ़ी तक डेढ़ लेन बनी है. फिलहाल, बरसात के सीजन में सड़क की खराब स्थिति को लेकर राजमार्ग विभाग पूर्व में स्वीकृत कुछ हिस्से में डामरीकरण की तैयारी में है. जिसके तहत पूर्व में स्वीकृत 18 किलोमीटर के डामरीकरण में से 7 किलोमीटर का डामरीकरण दिवालीखाल से गैरसैंण की तरफ और 2 किलोमीटर कर्णप्रयाग के नजदीक पूर्व में किया जा चुका है. बाकी 9 किलोमीटर का डामरीकरण भी दिवालीखाल से गैरसैंण धुनारघाट के बीच बरसात के बाद किया जाएगा. जाहिर है कि इन सड़कों के चौड़ीकरण से जहां गैरसैंण के लिए सफर आसान होगा, वहीं क्षेत्र में पर्यटन को भी पंख लगेंगे! इन मुद्दों पर नए सिरे से गंभीरता दिखानी होगी।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











