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बुग्यालों में बिखरा पड़ा है दिव्य फरण औषधियों का खजाना

27/09/19
in उत्तराखंड, संस्कृति, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों के भी अपने कुछ ख़ास मसाले हैं जो यहीं पैदा होते हैं और इस्तेमाल किये जाते हैं। इन्हीं में से एक मसाला है जम्बू। जम्बू का इस्तेमाल भारत की हिमालयी क्षेत्रों के अलावा नेपाल, तिब्बत, पकिस्तान और भूटान में भी किया जाता है। नेपाल में इसे जिम्बु कहा जाता है। भारतीय खान.पान की परंपरा में मसालों की महत्वपूर्ण भूमिका है। अपने खाने में मसालों के इस्तेमाल से भारतीय रसोई में प्राकृतिक अनाज, सब्जियों और दालों का कायापलट कर दिया जाता है। सामान्य भारतीय रसोइयों में 100 से ज्यादा किस्म के मसालों का इस्तेमाल किया जाता है। जीरा, धनिया, हींग, रतनजोत, लौंग, छोटी.बड़ी इलायची, तेजपत्ता, दालचीनी, जावित्री, जायफल, सरसों, मेथी, राई, अजवाइन, इमली, अमचूर, सौंफ, कलौंजी, विभिन्न किस्म की मिर्चें, कई तरह के नमक आदि भारतीय रसोई में इस्तेमाल किये जाने वाले आम मसाले हैं।
ये मसाले किसी भी आय वर्ग के घर में इस्तेमाल किये जाते हैं। इन मसालों के कुशल संयोजन से आम भारतीय रसोई में दिव्य स्वादों से भरपूर विभिन्न किस्म के जायकेदार व्यंजनों की रचना की जाती है। हर भारतीय अपने सहज ज्ञान से इस संयोजन में मसालों के तालमेल और उनकी मात्रा और भोजन बनाने की प्रक्रिया में उनके इस्तेमाल का क्रम बखूबी जानता है भारतीय पारम्परिक औषधीय ज्ञान में Allium की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। Allium जीनस अन्तर्गत लगभग 750 प्रजातियां पाई जाती है, जिसमें से 34 प्रजातियां केवल भारत में ही उपलब्ध हैं। इन्ही में से एक भारत के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाये जाने वाला बहुमूल्य पौधा Allium stracheyi जिसको भोटिया, बोक्सा, थारू, कोल्टस, किंन्नौरी तथा जौनसारी लोग ही बहुतायत में औषधि तथा Flavoring agent तड़का के रूप में प्रयोग करते है, जिसका अभी भी बहुत कम वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। उत्तराखण्ड, दार्जिलिंग, सिक्किम, नेपाल, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, नेपाल, उत्तरी पाकिस्तान, तिब्बत में फरण का बहुतायत प्रयोग मसाले के रूप में किया जाता है। यूनानी तथा आयुर्वेदिक औषधि निर्माण मे भी एक मुख्य अवयव के रूप प्रयोग किया जाता है। उत्तराखण्ड के निति माणा घाटी के कुछ स्थानों पर व्यवसायिक रुप से भी उगाई तथा बेची जाती है। फरण, जम्बू जिसको गढवाल के कुछ क्षेत्रों में लादो के नाम से भी जाना जाता है।
उत्तराखण्ड में फरण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जहाँ सूर्य की पर्याप्त रोशनी हो, आसानी से स्वतः ही उग जाता है। उच्च हिमालयी क्षेत्रां से भोटिया, बोक्सा, थारू, कोल्टस, किंन्नौरी तथा जौनसारी जनजातियां द्वारा फरण को सुखाया जाता है या इसके फूल एकत्रित कर जगह.जगह स्थानीय बाजार में बेचा जाता है। इसका अधिकतर उपयोग केवल तड़का तथा औषधियों के रूप में ही किया जाता है। पारम्परिक रूप से Allium stracheyi के सम्पूर्ण पौधे में ही औषधीय गुण पाये जाते है। पुरातन काल में वैद्यों द्वारा इसके कन्द को घी में पकाकर हैजा तथा अतिसार के निवारण के लिये प्रयोग किया जाता था तथा कच्चे कंद को सर्दी जुखाम व खासी के निवारण के लिये उपयोग जाता था। जंगलों से इस बहुमूल्य पौधे के अवैज्ञानिक दोहन की वजह से Red data book of Indian Plants में दर्ज किया गया है। फरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण पौधा हैए इसमें सल्फर तत्वो की बहुतायत मात्रा के साथ.साथ Antioxidants, Anti inflammatory तथा Antimicrobial गुण भी पाये जाते हैं। फरण की पत्तियों को Anti inflammatory तथा Analgesic गुणों के लिये ही प्रयोग किया जाता है।
वैज्ञानिक अध्ययनो के परिणामस्वरूप यह पाया गया है की फरण मे 61 प्रतिशत inflammation कम करने की क्षमता होती है जो की संस्तुत दवा डाईक्लोफैनेक सोडियम से भी बेहतर पाई जाती है तथा 64.62 प्रतिशत analgesic क्षमता होती है जो एसप्रीन से भी बेहतर होती है attel एवं Maga 1994 के एक अध्ययन के अनुसार इसमें मौजूद 96 विभन्न रासायनिक अवयवों की पहचान की गयी जिनमें से प्रमुखतः 27 केवल सल्फर अवयव पाये जाते हैं। फरण मे सल्फर तत्वो के विद्यमान होने की वजह से Blood Cholesterol को भी नियंत्रित करता है तथा पाचन क्रिया के लिये Tonic की तरह काम करता है।
फरण में बहुत सारे Aromatic अवयव होने के कारण इसको उत्तराखण्ड तथा देश भर में Flavoring Agent के रूप में बहुतायत मांग रहती है। शायद इन्ही महत्वपूर्ण गुणों की वजह से हिमालयी क्षेत्रो के स्थानीय लोगो द्वारा फरण को प्रतिदिन खाने मे प्रयोग किया जाता है क्योंकि पुरातन समय से ही दुर्गम हिमालयी क्षेत्रो में कई तरह के बहुमुल्य पौधों का भण्डार रहा है तथा स्थानीय निवासी इस परिस्थितिकी मे मौजूद Bio-resources का अपनी दिनचर्या मे उपयोग कर ही जीवन यापन करते रहे है। जहां तक फरण की पोष्टिक गुणवत्ता की बात की जाये तो इसमें प्रोटीन 4.26 प्रतिशत, वसा 0.1 प्रतिशत, फाइबर 79.02 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट 3.18 प्रतिशत, कैल्शियम 0.8 मिग्रा0, फास्फोरस 0.05 मिग्रा0, मैग्नीशियम 0.82 मिग्रा0 तथा पोटेशियम 0.88 मिग्रा0 तक पाये जाते है। लगभग 60.70 वर्ष पूर्व फरण उच्च हिमालय में तिब्बत सीमा से जुड़े क्षेत्रों में बहुतायत मात्रा में पाया जाता था तथा तिब्बती लाम्बा, भोटिया द्वारा भारत के विभिन्न स्थानों में मसालें व औषधि के रूप में बेचा जाता था।
सन् 1961 में चीन युद्ध के बाद भारत. तिब्बत व्यापार बन्द होने के कारण केवल स्थानीय लोगों द्वारा घरेलू बाजार में सीमित क्षेत्रों से दोहन कर बेचा जाता रहा है। नेपाल में सूखी फरण को 300 से 400 प्रति किग्रा0 तक बेचा जाता है। जबकि शुद्ध रूप से फरण को बाजार मे 1000 से 2500 प्रति किग्रा0 कीमत की दर से बेचा जाता है। The Scitech Journal 2014 एन0सी0 शाह के एक अध्ययन के अनुसार मौसमी Allium stracheyi की बाजार कीमत रूपये 2000 से 2500 प्रति किग्रा0 तक है। वर्तमान में उत्तराखण्ड के कई स्थानीय बाजार में फरण को रूपये 25 से 30 प्रति 10 ग्राम तक बेचा जाता है। वैसे तो सम्पूर्ण उत्तराखण्ड अपनी जैव विविधताए पारम्परिक औषधीय ज्ञान तथा औषधीय पौधों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। परन्तु अभी उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कई सारे बहुमूल्य पौधे हैं जिनकी स्थानीय एवं राष्ट्रीय बाजार में ही अच्छी कीमत है। इनका विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन तथा वन विभाग तथा वन पंचायत के समन्वय से संरक्षण व व्यवसायिक खेती के रूप में अपनाये जाने की आवश्यकता है ताकि इस बहुमूल्य सम्पदा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिकी का जरिया बनाया जा सके। वर्ष 2014 में राजपथ पर उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व जड़ी बूटियों की झांकी कर रह थे। इस झांकी में जिन प्रजातियों की जड़ी बूटियों का प्रदर्शन थाए उसमें से उत्तराखंड में गरीबों के तड़के का काम आने वाली जंबू.फरण घास भी है पलायन से खाली होते गांवों मे भले ही अब खेती कम हो गई हो। इस प्रकार एक बहुपयोगी दिव्य मसाला रूप से समृद्धि देने वाला खेती का पारम्परिक है जोकि उत्तराखण्ड में पारम्परिक एवं अन्य फसलों के साथ सुगमता से लगाया जा सकता है जिससे एक रोजगार परक जरिया बनने के साथ साथ इसके संरक्षण से पर्यावण को भी सुरक्षित रखा जा सकता हैए ताकि इस बहुमूल्य सम्पदा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिकी का जरिया बनाया जा सके।

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