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देववृक्ष पंय्या उत्तराखंड में चंदन के बराबर पवित्र

21/05/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में इस पौधे का वैज्ञानिक नाम प्रुनस सेरासोइडिस है। हिंदी में इस वृक्ष को पद्म या पदमख कहा जाता है। पंय्या के पेड की छाल का इस्तेमाल दवा बनाने के लिए किया जाता है। रंग बनाने के लिए भी इसकी छाल का इस्तेमाल होता है। दवाइयों के लिए भी इस पेड़ का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। पंय्या की लकड़ी को चंदन के समान पवित्र माना जाता है। हवन में पंय्या की लकडी का इस्तेमाल पवित्र माना जाता है। ये पेड एक लंबे अंतराल के बाद पत्तियां छोड़ता है। पत्तियों का इस्तेमाल गाय बकरियों के विछौने के रूप में किया जाता है। आगे चलकर ये ही सूखे पत्ते उर्वरा और खाद का काम करती हैं। पंय्या का वृक्ष लम्बी उम्र वाला होता है। इसकी हरी.भरी शाखाएं बेहद ही खूबसूरत होती हैं। ये वृक्ष हिमालयी क्षेत्रों में उगता है।
भारतीय संस्कृति में देववृक्ष है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्तः चेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है उत्तराखंड में पंय्या के पेड का सीधा संबंध सांस्कृतिक रीति रिवाजों से भी है। गांव में होने वाली शादी मे प्रवेश द्वार पर पंय्या की शाखाऐं लगाई जाती हैं। खास बात ये भी है कि शादी का मंडप भी पंय्या की शाखाओं और पत्तियों के बिना अधूरा माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से पंय्या का बडा महत्व है। पूजा के लिऐ इस्तेाल होने वाली इसकी पत्तियां पवित्र मानी जाती हैं। उत्तराखंड में घर के द्वार, गृह प्रवेश या हवन के दौरान इसका इस्तेमाल बंदनवार के रूप में होता है। हालांकि एक बुरी खबर ये भी है कि इस वृक्ष का दोहन बड़ी संख्या में हो रहा है। उत्तराखंड में पंय्या के पेड का सीधा संबंध सांस्कृतिक रीति रीवाजों से भी है। गांव में होने वाली शादी मे प्रवेश द्वार पर पंय्या की शाखाऐं लगाई जाती हैं। खास बात ये भी है कि शादी का मंडप भी पंय्या की शाखाओं और पत्तियों के बिना अधूरा माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से पंय्या का बडा महत्व है। मनुष्य का जीवन प्रकृति के साथ अत्यंत निकटता से जुड़ा है। पहाड़ के उच्च शिखर, पेड़.पौंधे, फूल.पत्तियां, नदी.नाले और जंगल में रहने वाले सभी जीव.जन्तुओं के साथ मनुष्य के सम्बन्धों की रीति उसके पैदा होने से ही चलती आयी है।
समय.समय पर मानव ने प्रकृति के साथ अपने इस अप्रतिम साहचर्य को अपने गीत.संगीत और रागों में भी उजागर करने का प्रयास किया है। पीढ़ी.दर.पीढ़ी अनेक लोक गीतों के रुप में ये गीत समाज के सामने पहुंचते रहे। उत्तराखण्ड के पर्वतीय लोकगीतों में वर्णित आख्यानों को देखने से स्पष्ट होता है कि स्थानीय लोक ने प्रकृति में विद्यमान तमाम उपादानों यथा ऋतु चक्र, पेड़.पौधों, पशु.पक्षी, लता, पुष्प तथा नदी व पर्वत शिखरों को मानवीय संवेदना से जोड़कर उसे महत्वपूर्ण स्थान दिया है।
लोकगीतों वर्णित बिम्ब एक अलौकिक और विशिष्ट सुख का आभास कराते हैं। मानव के घनिष्ठ सहचर व संगी.साथी के तौर पर प्रकृति के ये पात्र जहां मानव की तरह हंसते.बोलतेए चलते.फिरते हैं तो वहीं सुख.दुख में मानव के करीबी मित्र बनकर उसकी सहायता भी करते हैं। निष्कर्ष रुप में यह कहा जा सकता है कि प्रकृति के प्रति उद्दात भावों को मुखरित करते बसन्त ऋतु के ये गीत हिमालय की समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा, जीवन दर्शन और यहां के बौद्धिक विकास को प्रदर्शित करते हैं। पर्वतीय लोक जीवन में प्रकृति के समस्त पेड़ पौधोंए फूल पत्तियों और जीव जन्तुओं के प्रति अनन्य आदर का भाव समाया हुआ है। खासकर फूलों के लिए तो यह भाव बहुत पवित्र दिखायी देता है। यहां के कई लोकगीत भी इसकी पुष्टि करते हैं। बसन्त ऋतु में खिलने वाले पंय्या अथवा पदम के वृक्ष को उत्तराखंड में अत्यंत शुभ माना जाता है और इसे देवताओं के वृक्ष की संज्ञा दी जाती है। पंय्या का नया वृक्ष जब जन्म लेता है पहाड़ों में देववृक्ष के नाम से जाना जाने वाले इस वृक्ष को बचाने के लिए मुहिम तेज हो रही है। अच्छी बात ये भी है कि इसे बचाने के लिए टिहरी विधायक धन सिंह नेगी ने वन विभाग से साथ मिलकर काम करना शुरू किया है। हाल ही में बसंतोत्सव के मौके पर विधायक की मौजूदगी में 50 से ज्यादा पंय्या के पौधे लगाये गये। जाहिर सी बात है कि हमें अपने स्वार्थ को त्यागकर पंय्या को बचाने की कोशिश करनी होगी। इस तरह से ही आने वाली पीढ़ी इस वृक्ष का फायदा उठा सके।
उत्तराखण्ड आदि काल से ही महत्वपूर्ण जड़ी.बूटियों व अन्य उपयोगी वनस्पतियों के भण्डार के रूप में विख्यात है। इस क्षेत्र में पाये जाने वाले पहाड़ों की श्रृंखलायें, जलवायु विविधता एवं सूक्ष्म वातावरणीय परिस्थितियों के कारण प्राचीन काल से ही अति महत्वपूर्ण वनौषधियों की सुसम्पन्न सवंधिनी के रूप में जानी जाती हैं। कुदरत ने उत्तराखंड को कुछ ऐसे अनमोल तोहफे दिए हैं, जिनमें अद्भुत गुणों की भरमार है। महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बचाने की कोशिश के लिए मुहिम से सी बात ही कई प्रकार की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं भी जन्म दे सकती है। बचाने की कोशिश करनी होगी।

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