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उत्तराखंड में बागवानी विकास एक बड़ी चुनौती

13/05/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
रामगढ़ ब्लाक और धारी ब्लाक के सेब, आडू, खुबानी, नाशपाती और आलू, गोभी, मटर सहित तमाम पहाड़ी फल और सब्जियों के उत्पादक क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता में कभी नहीं रहे। कभी अंग्रेज यहाँ खट्टे सेबों को लाये होंगे। उत्तराखंड राज्य हमेशा से ही फलों के उत्पादन के मामले में आगे रहा है। खुमानी, पुलम, काफल आदि पहाड़ी फल उत्तराखंड वासियों समेत बाहरी क्षेत्र के लोगों को भी काफी पसंद आते हैं। कोरोना महामारी ने जिस तरह से पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। उसकी गूंज सदियों तक इतिहास में सुनाई देती रहेगी। इस महामारी ने मानव जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। विशेषकर दुनिया भर की अर्थव्यवस्था इस महामारी की शिकार हुई है।

दुनिया के सात सबसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था तक इस महामारी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी है। कोरोना की मार से भारत की अर्थव्यवस्था भी बहुत हद तक चरमराई है। जहां जीडीपी नकारात्मक अंक तक चली गई है। इसका प्रभाव देश के सभी सेक्टरों में देखने को मिलता है। सरकार द्वारा जारी जुलाई 2020 के आंकड़ों के अनुसार खाद्य कीमतों में उछाल के कारण खुदरा महंगाई दर बढ़कर 6.93 प्रतिशत पहुंच गई है। जो रिजर्व बैंक द्वारा तय मानक 4 प्रतिशत से 2.93 प्रतिशत अधिक है। इसके पीछे कोरोना महामारी के कारण खाद्य उत्पादों की आपूर्ति में बाधाएं आना बताया जा रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि खुदरा महंगाई की दर आगामी माहों में और भी ऊचाइयों को छू सकती है। अगर खाद्य महंगाई दर की बात करें तो यह जून 2020 में 8.72 फीसदी थी, जो जुलाई 2020 में बढ़कर 9.62 प्रतिशत पहुंच गई है। यह कुछ आंकड़े हैं जो आगामी समय में देश के आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाले हैं। कोरोना संकट के चलते अगर किसी का जीवन सबसे अधिक प्रभावित हुआ है तो वह आम नागरिकों के साथ.साथ किसानों, मजदूरों एवं छोटे उद्यमियों का है। जिससे देश के इन खास तबकों की जड़े तक हिल गई हैं। जिसे दोबारा पटरी पर लाना भूसे की ढेर में सूई ढूंढने के समान है।

आने वाले दिनों में इस संकट के और अधिक गहराने की प्रबल संभावनाएं हैं। देश के अन्य राज्यों की तरह पहाड़ी राज्य उत्तराखंड को भी इस संकट का सामना करना पड़ सकता है। वर्तमान में बरसात का मौसम है और पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में इस वक्त कई प्रकार की फल एवं सब्जियों का उत्पादन होता है। यहां के किसान इसी फल.सब्जियों के उत्पादन से होने वाली आय से वर्ष भर अपनी रोटी चलाते हैं। वैसे तो विगत कई वर्षों से इस पहाड़ी राज्य के किसानों की स्थिति सोचनीय बनी हुई है। लेकिन इस वक्त स्थिति काफी भयावह है। मंडियों में किसानों को फल व सब्जियों की उपज का उचित दाम नहीं मिल पा रहा है। जो थोड़ा बहुत मिल रहा है, उससे किराये भाड़े और बारदाने खर्च तक निकालना मुश्किल हो गया है। ऐसे में किसान निराश एवं हताश है। वह पहले ही कर्ज में दबा है और अब ऐसी परिस्थितियों में वह अपना कर्ज कैसे चुकाये और कैसे अपने परिवार का पालन करें। यह सबसे बड़ी चुनौती है।

फल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध नैनीताल जनपद के रामगढ़, धारी, मुक्तेश्वर, सतबुंगा, धानाचूली, नथुवाखान आदि क्षेत्रों में सेब और नाश्पाती उत्पादन का एक बड़ा रकबा है। इस क्षेत्र में लगभग 1244.67 हेक्टेयर भूमि में सेब के बागान हैं। जिससे लगभग 8550 मीट्रिक टन सेबों का उत्पादन होता है। लेकिन जब इस उत्पादन को बाजार उपलब्ध कराने की बात आती है तो खरीददार न मिलना, उचित दाम न मिलना, मार्केट के अनुसार गुणवत्ता का न होना जैसे तर्क देकर किसान के साथ नाइंसाफी की जाती है। हालांकि सरकारी अधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि इन सके पीछे सेब की पुरानी वैराईटी होने, बागवानी के तरीकों का पारंपरिक होना आदि को गुणवत्ता कमी का मुख्य कारण मानते हैं। हिमाचल प्रदेश जैसे अग्रणि फल उत्पादक राज्य की तर्ज पर उद्यान नीतियों को अपनाने की बात कही जाती है। लेकिन जब उस क्षेत्र में एक ठोस नीति बनाने और ग्राउंड में योजनाओं के क्रियांवयन की बात आती है, तो बिना किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के योजनायें प्रारंभ कर दी जाती हैं। योजना का लाभ लेने वाले मुक्तेश्वर क्षेत्र के किसानों ने बताया कि प्रदेश में सेब की सघन बागवानी को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा योजना प्रारंभ की गईं। जिसका जिम्मा प्रदेश के उद्यान विभाग को दिया गया। जिसने आनन फानन में कुछ लाभार्थियों का चयन किया और योजना का क्रियांवयन प्रारंभ कर दिया। जब उद्यान स्थापना के लिए गुणवत्तापूर्ण प्लाटिंग मैटेरियल की व्यवस्था की बात आई तो विभाग ने अपने हाथ खड़े कर दिए।

यहां किसानों को इनपुट मैटेरियल और प्लाटिंग मैटेरियल की व्यवस्था स्वयं करने को कह दिया गया। इन सबके कारण किसानों को योजना के क्रियांवयन में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस संबंध में मुक्तेश्वर क्षेत्र में बागवानी विकास पर विगत वर्षों से कार्य कर रहे विशेषज्ञ डॉण् नारायण सिंह का कहना है कि ष्ष्सरकार द्वारा संचालित इस योजना का एक बड़ा ड्रा बैक यह है कि इस योजना के तहत कम से कम एक एकड़ क्षेत्रफल में किसान को बाग स्थापित करना है। जिससे एक एकड़ से कम भूमि वाले किसान इस योजना के लाभ से वंचित हो जाते हैं। यदि राज्य सरकार वास्तव में किसानों को लाभ प्रदान करने की इच्छा रखती है तो उसे एक छोटी जोत के किसान को भी ध्यान में रखकर योजनाओं का निर्माण करना होगा। यह योजना को विस्तार देने के साथ ही क्षेत्र को पुनः बागवानी बहुल एवं चहुमुखी विकास में मदद प्रदान कर सकता है।

कृषि सेक्टर को मंदी से बचाना है तो एक ऐसी ठोस योजनाओं को लागू करने की जरूरत है, जिसका सीधा फायदा किसानों को हो। केंद्र की ऐसी कई योजनाएं हैं जिसका सीधा लाभ किसानों को मिल सकता है और उन्हें उनकी फसल का बेहतर मुनाफा प्राप्त हो सकता है। लेकिन केवल योजनाएं बनाने से नहीं बल्कि उन्हें धरातल पर वास्तविक रूप से लागू करने से ही परिवर्तन संभव है। इस वक्त किसान ही एक ऐसा माध्यम है जो देश को आर्थिक संकट से उबारने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकता है। ऐसे में उन्हें सरकारी नीतियों में उलझाने से कहीं अधिक योजनाओं का सीधा लाभ पहुंचाने में है। जिसकी तरफ केंद्र से लेकर राज्य और पंचायत स्तर तक को गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। इस वक्त जरूरत है एक ऐसी योजना की जिसका सीधा लाभ छोटे स्तर के किसानों को भी मिल सके। फलों के लिए हमेशा से ही सुप्रसिद्ध रहा है। जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर हम रामगढ़ ब्लाक के बारे में कोई बात करें तो हमें फलों के अलावा उसे कोई दूसरी पहचान देने की आवश्यकता नहीं है। रामगढ़ अंग्रेजी हुकूमत के दिनों से ही फलों के गढ़ के रूप में जाना जाता रहा है। हालांकि संसाधनों की कमी के कारण इसकी यह पहचान केवल एक क्षेत्र तक ही सीमित है। परन्तु अब वह दिन दूर नहीं जब रामगढ़ को देश.विदेश में भी प्रसिद्धि मिल जाएगी। ऐसा संभव होने जा रहा है राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के एक बेहतरीन प्रोजेक्ट के जरिए, जिसमें सरकार की योजना रामगढ़ में एक फ्रूट प्रोसेसिंग यूनिट लगाने का प्रस्ताव हैपर्वतीय क्षेत्र में आड़ू की नई कोपलों के साथ फलों और व अन्य पहाड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। अलबत्ता, लोग यह भी मान रहे हैं कि यह बारिश.ओलवृष्टि व अंधड़ कोरोना की महामारी का क्षेत्र से खात्मा करने में मददगार साबित हो सकता है तो भी संतोष किया जा सकता है। फल पट्टी में मौजूद शीतोष्ण बागवानी अनुसन्धान केंद्र एक केन्द्रीय सरकार का उपक्रम है शोध मददगार साबित हो सकता निभा सकता थी।

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