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उत्तराखंड में वन्यजीव हमलों से दहशत, तीन साल में 345 बाघ और तेंदुओं की मौत

22/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में राज्य में 45 बाघों की मौत दर्ज की गई। इनमें तीन बाघों का अवैध शिकार किया गया, जबकि नौ की मौत अज्ञात कारणों से हुई। पांच बाघ सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए और 20 की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। इसके अलावा कुछ मामलों में रेल दुर्घटनाएं और अन्य हादसे भी सामने आए। वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में राज्य में 45 बाघों की मौत दर्ज की गई। इनमें तीन बाघों का अवैध शिकार किया गया, जबकि नौ की मौत अज्ञात कारणों से हुई। पांच बाघ सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए और 20 की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। इसके अलावा कुछ मामलों में रेल दुर्घटनाएं और अन्य हादसे भी सामने आए।स्थिति तेंदुओं के मामले में और अधिक गंभीर दिखाई देती है। रिपोर्ट के अनुसार, तीन साल में 303 तेंदुओं की मौत हुई है। इनमें कई तेंदुए जाल में फंसकर मारे गए, कुछ रेल और सड़क दुर्घटनाओं की भेंट चढ़े, जबकि बड़ी संख्या में तेंदुओं की मौत आपसी संघर्ष और अन्य दुर्घटनाओं में हुई। वन विभाग के अनुसार, 64 तेंदुओं की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, जबकि पांच को मानव जीवन के लिए खतरनाक घोषित किए जाने के बाद मारना पड़ा।विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, वन्यजीवों के लिए सबसे बड़ा खतरा अवैध शिकार है। जहर, खटका और क्लच वायर जैसे खतरनाक तरीकों से वन्यजीवों का शिकार किया जा रहा है। खासतौर पर वन क्षेत्रों में अवैध रूप से रह रहे कुछ वन गुर्जरों पर वन्यजीव शिकार में संलिप्त होने के आरोप लगते रहे हैं। कई मामलों में वन्यजीव अंगों की तस्करी के नेटवर्क का भी खुलासा हुआ है।हाल ही में हरिद्वार वन प्रभाग की श्यामपुर रेंज में दो बाघों को जहर देकर मारने का मामला सामने आया। इससे पहले भी कई घटनाओं में वन्यजीव अंगों के साथ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, कुछ मामलों में उत्तर प्रदेश सीमा से जुड़े लोगों की संलिप्तता भी सामने आई है। मोहंड क्षेत्र में तेंदुए की खाल के साथ वन गुर्जरों की गिरफ्तारी और वर्ष 2016 में गैंडीखत्ता में बाघ की खाल के साथ चार लोगों की गिरफ्तारी जैसे मामले वन्यजीव तस्करी की गंभीरता को दर्शाते हैं।वन्यजीव संरक्षण के लिए विभाग ने एंटी पोचिंग सेल और सर्विलांस सिस्टम गठित किए हैं। जंगलों में गश्त बढ़ाई गई है और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। बावजूद इसके, अवैध शिकार की घटनाएं पूरी तरह नहीं रुक पा रही हैं।वन मंत्री ने भी माना है कि वन गुर्जरों के विस्थापन में चुनौतियां बनी हुई हैं। सरकार की ओर से प्रति परिवार 15 लाख रुपये तक का पुनर्वास पैकेज देने की पेशकश की गई थी, लेकिन विस्थापन की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है। विभाग का मानना है कि जंगलों में मानवीय गतिविधियों का बढ़ता दबाव वन्यजीवों के लिए खतरा बन रहा है।वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो उत्तराखंड की समृद्ध वन्यजीव विरासत पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। बाघ और तेंदुए केवल जंगलों की शान ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन के महत्वपूर्ण आधार भी हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकार, वन विभाग और समाज को मिलकर प्रभावी रणनीति अपनानी होगी, ताकि जंगलों के ये बेशकीमती प्रहरी सुरक्षित रह सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे जैव विविधता वाले राज्य में बाघ और तेंदुए केवल वन्यजीव नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। लगातार हो रही मौतें वन्यजीव संरक्षण की चुनौतियों को उजागर करती हैं। संरक्षणवादियों ने जंगलों में गश्त बढ़ाने, संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी मजबूत करने और वन्यजीव अपराधों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।इसके साथ ही जंगलों में रहने वाले समुदायों के पुनर्वास, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो राज्य की वन्यजीव संपदा पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है। राज्य में पिछले तीन साल में 45 बाघों की मौत हुई है। इनमें अवैध शिकार से तीन, अज्ञात वजह से नौ, सड़क दुर्घटना में पांच और प्राकृतिक कारणों से 20 बाघ शामिल हैं। इस अवधि में 303 तेंदुए भी मारे गए हैं। इनमें एक जाल में फंसकर, तीन रेल दुर्घटना में, 21 सड़क दुर्घटना में, 52 आपसी लड़ाई से, 33 अन्य दुर्घटनाओं में, 64 प्राकृतिक कारणों से और पांच मानव जीवन के लिए खतरनाक घोषित किए जाने के बाद मारे गए। मंत्री के इस बयान के बाद विभागीय हलकों में भी हलचल तेज हो गई है. बताया जा रहा है कि जिस रेंजर पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है, वह लंबे समय से हरिद्वार जिले की विभिन्न रेंजों में तैनात रहा है. कभी श्यामपुर रेंज तो कभी रुड़की और खानपुर रेंज में उसकी पोस्टिंग रही है. ऐसे में अब इस बात को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं कि आखिर इतने लंबे समय तक एक ही जिले में तैनाती क्यों बनी रही? और पर्वतीय जनपदों में ऐसे अधिकारियों को क्यों नहीं भेजा जाता.उधर, इस पूरे मामले की जांच फिलहाल एसडीओ स्तर के अधिकारी को सौंपी गई है. हालांकि, इतने संवेदनशील मामले की जांच प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट स्तर के अनुभवी अधिकारी की निगरानी में होनी चाहिए थी. एसडीओ स्तर का अधिकारी मुख्य रूप से अधीनस्थ कर्मचारियों की भूमिका की जांच कर सकता है, लेकिन यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी की जवाबदेही तय करनी हो तो उच्च स्तर की स्वतंत्र जांच जरूरी है.वन विभाग के भीतर भी अब यह चर्चा तेज है कि आखिर जंगल में दो-दो टाइगर का शिकार कैसे हो गया? शुरुआती जांच में शिकारियों के संगठित नेटवर्क की आशंका जताई जा रही है. 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है, जबकि एक अन्य आरोपी अभी फरार बताया जा रहा है. विभागीय टीमें लगातार दबिश दे रही हैं और आरोपियों की तलाश में कई स्थानों पर छापेमारी की जा रही है. इस घटना ने उत्तराखंड में वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.NTCA की टीम अगले कुछ दिनों में उत्तराखंड पहुंच सकती है. यह टीम घटनास्थल का निरीक्षण करने के साथ-साथ कई पहलुओं पर स्वतंत्र रूप से जांच करेगी. माना जा रहा है कि टीम वन विभाग द्वारा अब तक जुटाए गए साक्ष्यों, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, घटनास्थल की सुरक्षा व्यवस्था और गश्त रिकॉर्ड का भी परीक्षण करेगी.एनटीसीए की जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि देशभर में बाघ संरक्षण की निगरानी करने वाली यह सर्वोच्च संस्था है. यदि जांच में गंभीर लापरवाही सामने आती है तो विभागीय अधिकारियों पर बड़ी कार्रवाई हो सकती है. साथ ही भविष्य में उत्तराखंड की टाइगर सुरक्षा रणनीति में भी बदलाव देखने को मिल सकता है.उत्तराखंड में पिछले कुछ समय से वन्यजीव अपराधों की घटनाएं बढ़ी हैं. हाथियों की संदिग्ध मौत, सांपों के जहर की तस्करी और अब बाघों के शिकार जैसी घटनाओं ने राज्य की वन सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है. केवल गश्त बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि खुफिया नेटवर्क मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र विकसित करने की भी जरूरत है.फिलहाल पूरे मामले पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं. वन विभाग की जांच, फरार आरोपी की गिरफ्तारी और लापता बाघिन के सुराग आने वाले दिनों में कई बड़े खुलासे कर सकते हैं. सबसे अहम बात यह होगी कि क्या इस बार वास्तव में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या फिर मामला केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित रह जाएगा. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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