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अंतर्राष्‍ट्रीय जैव विविधता दिवस सब बचेंगे तो हम जिएंगे

22/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की विरासत और जैव विविधता की विश्व में अलग पहचान है। उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता ने प्राचीन काल से पर्यटकों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और संतों को आकर्षित किया है। इसका सामाजिक-पारिस्थितिकीय तंत्रों के साथ समग्र संबंध विभिन्न मठों, मंदिरों और तीर्थस्थलों के रूप में परिलक्षित होता है। जैविक विविधता के संरक्षण के महत्व और आवश्यकता पर नागरिकों और हितधारकों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए वैश्विक स्तर पर हर साल 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैविक विविधता दिवस के रूप में मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने जैविक विविधता पर कन्वेंशन के सहमत पाठ को अपनाने के लिए सम्मेलन के नैरोबी अंतिम अधिनियम द्वारा 22 मई 1992 को कन्वेंशन के पाठ को अपनाने के उपलक्ष्य में 22 मई को आईडीबी के रूप में अपनाया गया. इस वर्ष के लिए आईडीबी 2024 का विषय “योजना का हिस्सा बनें” है. 1993 के अंत में संयुक्त राष्ट्र महासभा की दूसरी समिति द्वारा पहली बार बनाए जाने पर 29 दिसंबर (जैविक विविधता सम्मेलन के लागू होने की तारीख) को दिसंबर 2000 में जैविक विविधता के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस नामित किया गया था. वैश्विक समुदाय को प्राकृतिक दुनिया के साथ अपने संबंधों को फिर से जांचना चाहिए, ताकि बेहतर दुनिया का निर्णाण किया जा सके . एक बात तो निश्चित है, हमारी सभी तकनीकी प्रगति के बावजूद हम अपने पानी, भोजन, दवाओं, कपड़े, ईंधन, आश्रय और के लिए पूरी तरह से स्वस्थ और ऊर्जा, बस कुछ के नाम बताने के लिए हैं. हम ज्यादातर संसाधनों के मामलों में जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर हैं. इसमें हमारी जैविक संपदा का सम्मान, सुरक्षा और मरम्मत शामिल है. दिसंबर 2022 में दुनिया एक साथ आई और प्रकृति के साथ हमारे संबंधों को बदलने की वैश्विक योजना पर सहमत हुई. कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे को अपनाना, जिसे जैव विविधता योजना के रूप में भी जाना जाता है. 2050 तक प्रकृति के नुकसान को रोकने और उलटने के लिए लक्ष्य और ठोस उपाय निर्धारित करता है. जैविक विविधता को अक्सर पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों की विस्तृत विविधता के संदर्भ में समझा जाता है. लेकिन इसमें प्रत्येक प्रजाति के भीतर आनुवंशिक अंतर भी शामिल होता है- उदाहरण के लिए, फसलों की किस्मों और पशुधन की नस्लों के बीच – और पारिस्थितिक तंत्र की विविधता (झीलें, जंगल, रेगिस्तान, कृषि परिदृश्य) जो अपने सदस्यों (मनुष्यों, पौधों, जानवरों) के बीच कई प्रकार की बातचीत की मेजबानी करते हैं. विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी तथा वनस्पति एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हैं, जिनका जीवन एक-दूसरे पर ही निर्भर रहता है। सही मायनों में जैव विविधता की समृद्धि ही धरती को रहने तथा जीवनयापन के योग्य बनाती है किन्तु विड़म्बना है कि निरन्तर बढ़ता प्रदूषण रूपी राक्षस वातावरण पर इतना खतरनाक प्रभाव डाल रहा है कि जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियां धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं।जैव विविधता से आशय जीवधारियों (पादप एवं जीवों) की विविधता से है, जो दुनियाभर में हर क्षेत्र, देश, महाद्वीप पर होती है। भारत में कुछ जीव-जंतुओं की प्रजातियों पर मंडराते खतरों की बात करें तो जैव विविधता पर दिसम्बर 2018 में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (सीबीडी) में पेश की गई छठी राष्ट्रीय रिपोर्ट से पता चला था कि अंतर्राष्ट्रीय ‘रेड लिस्ट’ की गंभीर रूप से लुप्तप्रायः और संकटग्रस्त श्रेणियों में भारतीय जीव प्रजातियों की सूची वर्षों से बढ़ रही है।प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक में बताया गया है कि इस सूची में शामिल प्रजातियों की संख्या में वृद्धि जैव विविधता तथा वन्य आवासों पर गंभीर तनाव का संकेत है। पुस्तक के अनुसार 2009 में पेश की गई चतुर्थ राष्ट्रीय रिपोर्ट में उस समय ‘इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर’ (आईयूसीएन) की विभिन्न श्रेणियों में गंभीर रूप से लुप्तप्रायः और संकटग्रस्त श्रेणियों में भारत की 413 जीव प्रजातियों के नाम थे किन्तु 2014 में पेश पांचवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट में इन प्रजातियों की संख्या का आंकड़ा बढ़कर 646 और छठी राष्ट्रीय रिपोर्ट में 683 हो गया। देश में इस समय नौ सौ से भी अधिक दुर्लभ प्रजातियां खतरे में बताई जा रही हैं। यही नहीं, विश्व धरोहर को गंवाने वाले देशों की सूची में दुनियाभर में भारत का चीन के बाद सातवां स्थान है।भारत का समुद्री पारिस्थितिकीय तंत्र करीब 20444 जीव प्रजातियों के समुदाय की मेजबानी करता है, जिनमें से 1180 प्रजातियों को संकटग्रस्त तथा तत्काल संरक्षण के लिए सूचीबद्ध किया गया है। अगर देश में प्रमुख रूप से लुप्त होती कुछेक जीव-जंतुओं की प्रजातियों की बात करें तो कश्मीर में पाए जाने वाले हांगलू की संख्या सिर्फ दो सौ के आसपास रह गई है, जिनमें से करीब 110 दाचीगाम नेशनलपार्कमहैं।इसी प्रकार आमतौर पर दलदली क्षेत्रों में पाई जाने वाली बारहसिंगा हिरण की प्रजाति अब मध्य भारत के कुछ वनों तक ही सीमित रह गई है। वर्ष 1987 के बाद से मालाबार गंधबिलाव नहीं देखा गया है। हालांकि माना जाता है कि इनकी संख्या पश्चिमी घाट में फिलहाल दो सौ के करीब बची है। दक्षिण अंडमान के माउंट हैरियट में पाया जाने वाला दुनिया का सबसे छोटा स्तनपायी सफेद दांत वाला छछूंदर लुप्त होने के कगार पर है। एशियाई शेर भी गुजरात के गिर वनों तक ही सीमित हैं।पृथ्वी पर पेड़ों की संख्या घटने से अनेक जानवरों और पक्षियों से उनके आशियाने छिन रहे हैं, जिससे उनका जीवन संकट में पड़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि इस ओर जल्दी ही ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में स्थितियां इतनी खतरनाक हो जाएंगी कि धरती से पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं की कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। माना कि धरती पर मानव की बढ़ती जरूरतों और सुविधाओं की पूर्ति के लिए विकास आवश्यक है लेकिन यह हमें ही तय करना होगा कि विकास के इस दौर में पर्यावरण तथा जीव-जंतुओं के लिए खतरा उत्पन्न न हो।अगर विकास के नाम पर वनों की बड़े पैमाने पर कटाई के साथ-साथ जीव-जंतुओं तथा पक्षियों से उनके आवास छीने जाते रहे और ये प्रजातियां धीरे-धीरे धरती से एक-एक कर लुप्त होती गई तो भविष्य में उससे उत्पन्न होने वाली भयावह समस्याओं और खतरों का सामना हमें ही करना होगा। बढ़ती आबादी तथा जंगलों के तेजी से होते शहरीकरण ने मनुष्य को इतना स्वार्थी बना दिया है कि वह प्रकृति प्रदत्त उन साधनों के स्रोतों को भूल चुका है, जिनके बिना उसका जीवन ही असंभव है।आज अगर खेतों में कीटों को मारकर खाने वाले चिडि़या, मोर, तीतर, बटेर, कौआ, बाज, गिद्ध जैसे किसानों के हितैषी माने जाने वाले पक्षी भी तेजी से लुप्त होने के कगार हैं तो हमें आसानी से समझ लेना चाहिए कि हम भयावह खतरे की ओर आगे बढ़ रहे हैं और हमें अब समय रहते सचेत हो जाना चाहिए।  जैव विविधता पर (जिसमें वनाग्नि, ग्लेशियर का पिघलना, आपदा और क्लाइमेट चेंज शामिल है) सीधे असर डाल रहे हैं. उत्तराखंड राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते आपदा जैसे हालात बनते रहते हैं. मौजूदा स्थिति यह है कि है हर साल राज्य को आपदा का दंश झेलना पड़ता है. जिसका असर जैव विविधता पर पड़ता दिखाई दे रहा है. यही नहीं, क्लाइमेट चेंज का जैव विविधता पर बड़ा इंपैक्ट पड़ रहा है.  हमें अब भली-भांति समझ लेना होगा कि पृथ्वी पर जैव विविधता को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण यही है कि हम धरती की पर्यावरण संबंधित स्थिति के तालमेल को बनाए रखें। हम रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे बदलाव करके बड़ा असर डाल सकते हैं। जैसे प्लास्टिक का कम इस्तेमाल, पेड़ लगाना, पानी बचाना और ऊर्जा की खपत कम करना। ये छोटे कदम ही पृथ्वी को बचाने में मदद करेंगे। इंटरनेशनल डे फॉर बायोलॉजिकल डायवर्सिटी केवल एक औपचारिक दिवस नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी समझने का अवसर है. आज जरूरत इस बात की है कि लोग जैव विविधता को केवल जंगलों तक सीमित न समझें बल्कि अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं. छोटे-छोटे गमलों में पौधे लगाना, अलग-अलग प्रजातियों को बचाना, स्थानीय पेड़ों को बढ़ावा देना और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाना ही आने वाले समय में शहरों को रहने योग्य बना सकता है.  इसके अलावा, क्लाइमेट चेंज की वजह से ग्लेशियर मेल्टिंग, इकोसिस्टम पर असर और जैव विविधता पर भी बड़ा असर पड़ रहा है. धरती पर मौजूद सभी स्पीशीज एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. ऐसे में अन्य स्पीशीज का संरक्षण नही करेंगे तो इसका असर मानव जीवन पर ही पड़ेगा. लिहाजा, लोगों को जैव विविधता को बरकरार रखने के लिए सभी को सहयोग देने की जरूरत है, ताकि जैव विविधता को बरकरार रखने में अपनी भूमिका निभा सकें.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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