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भारत में दिखने लगा है जलवायु परिवर्तन का असर

02/05/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत मौसम विभाग ने इस वर्ष देश में मॉनसून के दौरान ‘सामान्य से अधिक वर्षा’ होने का अनुमान व्यक्त किया है। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि अच्छी वर्षा और मुद्रास्फीति में कमी में सीधा संबंध नहीं है। यानी यह जरूरी नहीं  कि मॉनसून के दौरान पर्याप्त वर्षा होने से मुद्रास्फीति कम हो जाएगी।  वर्ष 2023 में तो पूरे देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से 6 प्रतिशत कम रहा था।वर्ष 2023-24 में औसत खाद्य मुद्रास्फीति 7.49 प्रतिशत रही थी जबकि अगले साल यानी 2024 में पूरे देश में 8 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई थी मगर पूरे देश में औसत मुद्रास्फीति (7.29 प्रतिशत) पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा था।संचयी वर्षा से अधिक वर्षा का स्थानिक वितरण, सही समय पर वृष्टि एवं इसका फैलाव या विस्तार जैसे महत्त्वपूर्ण कारक यह तय करते हैं किसी साल कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन कैसा रहने वाला है। मगर प्रत्येक वर्ष वर्षा का स्थानिक वितरण, इसकी समयबद्धता और विस्तार को लेकर अनिश्चितता बढ़ती ही जा रही है। कभी-कभी चरम मौसमी घटनाओं जैसे बाढ़ आने, बादल फटने और लंबे समय तक सूखे की स्थिति रहने के बावजूद पूरे देश में मॉनसून अनुमान के इर्द-गिर्द ही रहता हैं। वर्षा के क्षेत्रीय वितरण में एकरूपता नहीं होने के कारण भारत जैसे विशाल देश में कृषि क्षेत्र के ऊपर अनिश्चितता की तलवार हमेशा लटकती रहती है। अनिश्चितता के ये बादल तब तक छंटने वाले नहीं हैं जब तक व्यापक स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं। इन उपायों में जलवायु परिवर्तन रोधी बीज, लगभग 100 प्रतिशत सिंचाई सुविधा और मौसम के मिजाज में अचानक बदलाव से जुड़े जोखिमों से निपटने के अन्य तरीके शामिल हैं।संसद में पेश वित्त वर्ष 2017-18 की आर्थिक समीक्षा में जलवायु परिवर्तन से भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए मध्यम से दीर्घ अवधि के जोखिमों का जिक्र किया गया था। आर्थिक समीक्षा में अनुमान व्यक्त किया गया था कि जलवायु परिवर्तन के कारण असिंचित इलाकों में फसल उत्पादन 20-25 प्रतिशत तक घट सकता है। समीक्षा के अनुसार वर्तमान कृषि आय के हिसाब से जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मध्य कृषक परिवार की आय में सालाना 3,600 रुपये से अधिक कमी आई। समीक्षा में एक विस्तृत विश्लेषण में कहा गया कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान शुष्क दिनों (प्रति दिन 0.1 मिलीमीटर से कम वर्षा) और गीले दिनों (प्रतिदिन 80 मिलीमीटर से अधिक वर्षा) की संख्या बढ़ गई है। समीक्षा में कहा गया, ‘असिंचित क्षेत्रों में तापमान अत्यधिक होने से खरीफ और रबी फसलों का उत्पादन क्रमशः 7.0 प्रतिशत और 7.60 प्रतिशत कम हो जाता है।’समीक्षा में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन का असर कम करने के लिए सरकार को ड्रिप ऐंड स्प्रिंकलर इरीगेशन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना चाहिए। समीक्षा में यह भी कहा गया कि सरकार को बिजली और उर्वरक क्षेत्र में सीधी सब्सिडी देने के बजाय प्रत्यक्ष आय का प्रावधान करना चाहिए और अनाज-केंद्रित नीति की भी समीक्षा करनी चाहिए।वर्ष 2022 में जारी आखिरी जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) रिपोर्ट में खतरे के संकेतों का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कृषि एवं संबंधित कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का जोखिम बढ़ गया है। जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल असर के कारण भारत में फसलों की पैदावार कम होगी, व्यावसायिक मछलियों की प्रजातियों जैसे ‘हिलसा’  और ‘बॉम्बे डक’  का उत्पादन भी कम हो जाएगा और कृषि क्षेत्र में श्रम से जुड़ी क्षमता भी कम हो जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि चावल, गेहूं, दलहन, मोटे अनाज का उत्पादन 2050 तक 9 प्रतिशत कम हो सकता है। अगर कार्बन उत्सर्जन अधिक रहा तो देश के दक्षिणी हिस्से में मक्का उत्पादन में लगभग 17 प्रतिशत कमी आ सकती है। रिपोर्ट में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन से जलीय पौधे एवं शैवाल द्वारा तैयार ऊर्जा में भी कमी आएगी। यह ऊर्जा मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के लिए काफी आवश्यक मानी जाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ने से विशेषकर भारत में श्रम क्षमता में कमी आती जाएगी। उत्सर्जन निरंतर अधिक रहने से औसत वैश्विक आय 23 प्रतिशत कम हो सकती है और 2100 में भारत की औसत आय 92 प्रतिशत कम रह सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों का असर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था, बाजार, वित्त और व्यापार पर भी होगा जिससे भारत में वस्तुओं की उपलब्धता कम हो जाएगी एवं उनकी कीमतें बढ़ जाएंगी। इससे उन बाजारों को भी नुकसान पहुंचेगा जो भारतीय निर्यातकों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं।रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तापमान की अधिकता और जल की कम उपलब्धता के अलावा जलवायु परिवर्तन से जुड़े घटनाक्रम स्वच्छ जल की उपलब्धता पर भी असर डालेंगे और पानी में घुले जैविक कार्बन और जहरीले तत्त्वों की मात्रा बढ़ जाएगी। इससे भारत में स्वच्छ जल की उपलब्धता एवं आंतरिक मत्स्य व्यवसाय प्रभावित होंगे। हाल में ही आए एक अन्य सर्वेक्षण में पाया गया कि चरम मौसमी घटनाओं के कारण 50 प्रतिशत से अधिक सीमांत एवं पिछड़े किसानों की खेतों में खड़ी फसलों में कम से कम आधी से अधिक बरबाद हो गईं। अत्यधिक या बेमौसम बारिश, अधिक दिनों तक कड़ाके की सर्दी, सूखा और बाढ़ आदि चरम मौसमी घटनाएं कहलाती हैं। यह विश्लेषण डेवलपमेंट इंटेलिजेंस यूनिट (डीआईयू) द्वारा ‘भारत के सीमांत किसानों की स्थिति, 2024’ पर दूसरे सालाना सर्वेक्षण का हिस्सा था। इस सर्वेक्षण की शुरुआत फोरम ऑफ एंटरप्राइजेज फॉर इक्विटेबल डेवलपमेंट (फीड) ने थी। ‘फीड’ सीमांत एवं पिछड़े किसानों के हितों के लिए आवाज उठाता है। इस अध्ययन में कुल 6,615 सीमांत किसानों ने हिस्सा लिया था जिनका चयन एक बड़ी कृषक समिति से किया गया था। पहले चरण का सर्वेक्षण 2023 में हुआ था और इसमें किसानों का चयन उनकी जमीन की जोत के अनुसार किया गया था। 21 राज्यों से ऐसे किसानों का चयन टेली-कॉलिंग के माध्यम से किया गया था। अध्ययन में दर्शाया गया है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान 50 प्रतिशत से अधिक धान​ और 40 प्रतिशत से अधिक गेहूं किसानों की आधी फसलें बरबाद हो गई हैं। बाकी दूसरी सभी फसलों के मामले में 45-65 प्रतिशत किसानों को आधी से अधिक फसलों का नुकसान सहना पड़ा।सर्वेक्षण के अनुसार जहां तक वास्तविक नुकसान की बात है तो यह मानते हुए कि भारत में सीमांत किसानों का औसत भूमि जोत का आकार 0.38 हेक्टेयर है, खरीफ सत्र में केवल धान उगाने वाले 50 प्रतिशत सीमांत किसानों की आय 72 प्रतिशत कम हो गई। इसी तरह, अगर भूमि जोत का आकार 0.40-1.0 हेक्टेयर के बीच मानते हुए धान की फसल में 26 प्रतिशत नुकसान हुआ। रबी सत्र में गेहूं की फसलों में भी यही बात देखी गई।कुछ अध्ययन में यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में चावल एवं गेहूं उत्पादन 6-10 प्रतिशत कम हो सकता है जिससे करोड़ों लोगों के लिए सस्ता अनाज उपलब्ध कराना मुश्किल हो जाएगा।केंद्र एवं राज्य सरकारों की तरफ से जलवायु परिवर्तन के खतरों एवं गर्म मौसम से फसलों को होने वाले नुकसान से निपटने के लिए उपाय किए जा रहे हैं। पिछले खरीफ सत्र में कुल धान के रकबे में लगभग 25 प्रतिशत हिस्से में जलवायु परिवर्तन रोधी किस्में लगाई गई थीं जबकि गेहूं के मामले में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 75 प्रतिशत हो गया। गेहूं की ज्यादातर जलवायु परिवर्तन रोधी किस्में चरम तापमान झेलने में सक्षम हैं जबकि धान की ये किस्में अत्यधिक वर्षा के प्रतिकूल असर झेलने में सक्षम हैं। पिछले वित्त वर्ष सरकार ने विभिन्न फसलें उगाने वाले किसानों को 119 से अधिक जलवायु रोधी बीज दिए थे।इसके अलावा विभिन्न सरकारी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जलवायु परिवर्तन रोधी कृषि कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इन उपायों के जरिये बीज और नई किस्मों के शोध एवं विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीस) के अंतर्गत राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन में संसाधनों के संरक्षण, मृदा में उर्वरा शक्ति सुनिश्चित करने और उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एकीकृत कृषि, जल इस्तेमाल में दक्षता और वर्षा पर निर्भर कृषि क्षेत्रों में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं। यह मिशन जलवायु परिवर्तन के जोखिम कम करने में भी सहयोग कर रहा है और भारतीय कृषि को लाभ पहुंचा रहा है।  जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए अन्य कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं जिनमें प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमएसकेवाई), मृदा स्वास्थ्य कार्ड, परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई), कृषि आपात योजना और जलवायु अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (निक्रा) और कृषि वानिकी पर उप-अभियान शामिल हैं। केंद्र सरकार ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, कृषि शोध एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के माध्यम से भारत के 151 जिलों में जलवायु परिवर्तन रोधी गांवों की स्थापना की है। ये सभी आदर्श गांव के रूप में विकसित किए गए हैं जिनका मकसद भारतीय कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कार्यों को बढ़ावा देना है। जलवायु के अनुकूल और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए भारत के दूसरे कई राज्यों में भी ये आदर्श गांव स्थापित किए जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन ने उत्तराखंड की बागवानी, खासकर उष्णकटिबंधीय फलों की खेती पर गहरा असर डाला है। यह हिमालयी राज्य, जो अपनी विविध जलवायु परिस्थितियों के लिए जाना जाता है, पिछले सात वर्षों में फलों की पैदावार में भारी गिरावट का सामना कर रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं—बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश और बार-बार आने वाली चरम मौसम घटनाएँ। जिससे खेती कठिन हो गई है और उत्पादन लागत भी बढ़ रही है जबकि उपज घट रही है और फलों की गुणवत्ता भी गिर रही है। कुल मिलकर मौसम परिवर्तन का फलों की गुणवत्ता और पैदावार पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। उच्च तापमान और आर्द्रता से आम और लीची की फसल प्रभावित हो रही है। पैदावार घट रही है, लागत बढ़ रही है, और नई तकनीकें अपनाने के बावजूद स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।नई तकनीक को देख रहे हैं जैसे गर्मियों की दोपहर में रेन गन का उपयोग करके पानी गिरा कर तपती गर्मी के तापमान को कुछ नीचे लाया जा सकता है, बैगिंग और जाल प्रौद्योगिकी का उपयोग किया उत्तराखंड में सेब का बहुत अच्छा उत्पादन होता था। पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण गर्म हो रहे राज्य के ठंडे घंटों में कमी से सेब उत्पादन में गिरावट आई है। किसान अब कम ठंड में उगने वाली सेब और आड़ू की किस्में लगा रहे हैं, साथ ही ड्रैगन फ्रूट और कीवी जैसे सूखा सहन करने वाले फलों की खेती कर रहे हैं। राज्य ने अब सेब उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘एप्पल मिशन’ शुरू किया है, जिसमें उच्च घनत्व वाली खेती शामिल है। ‘एप्पल मिशन’ के तहत किसानों को कम ठंड में उगने वाली सेब की किस्में दी गई हैं, और अब वे अच्छी गुणवत्ता के सेब उगा रहे हैं। इसके अलावा, पॉली हाउस और टपक सिंचाई जैसी तकनीकें किसानों को जलवायु परिवर्तन से बचाने में मदद कर रही हैं।प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के माध्यम से ड्रिप सिंचाई योजना पर किसानों को 80% सब्सिडी प्रदान कर रहे हैं। इन उपायों से फल उत्पादकता में सुधार हो सकता है। फलों की उत्पादकता बढ़ाने में मधुमक्खी पालन महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि सेब जैसे फलों में परागण में मधुमक्खियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फलों की खेती के लिए अब कम ठंड में बढ़ने वाली और जल्दी तैयार होने वाली किस्में विकसित की जा रही हैं। तापमान बढ़ने के कारण अब हम ड्रैगन फ्रूट, कीवी और ब्लूबेरी जैसी फसलें उगा पा रहे हैं, जिनके लिए पहले हमें आयात पर निर्भर रहना पड़ता था। उत्तराखंड में इन फलों की संभावनाएं बढ़ी हैं। खासकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ड्रैगन फ्रूटऔर का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है, और हम उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में इनका आयात रुक जाएगा। इसी तरह बड़े पैमाने पर कीवी उत्पादन की संभावनाएँ बहुत बढ़ गयी हैं। ये उपाय सकारात्मक संकेत देते हैं, लेकिन उत्तराखंड की बागवानी की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए निरंतर शोध, निवेश और रणनीतिक योजना की आवश्यकता होगी ताकि जलवायु संकट से निपटा जा सके।  उत्तराखंड के फल उत्पादन क्षेत्र की स्थिरता बनाए रखने के लिए तकनीकी और बाजार आधारित समाधान अपनाना ज़रूरी है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम किया जा सके। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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