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विलुप्ति की कगार पर पेट के कीड़ों का दुश्मन जामिर

02/12/24
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड, चमोली, देहरादून, हेल्थ
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत में उगाए जाने वाले तमाम फलों में नीबू प्रजाति के फलों की खास जगह है. इन में विटामिन ए, बी, सी व खनिज काफी मात्रा में पाए जाते हैं. नीबू वर्गीय फलों में मौसमी, जामिर माल्टा, संतरा व नीबू वगैरह खास हैं. नीबू प्रजाति के फल तमाम तरह की जलवायु में उगाए जाते हैं. जामिर व मौसमी के उत्पादन के लिए गरमी के मौसम में अच्छी गरमी व सर्दी के मौसम में अच्छी सर्दी सही रहती है. इन के लिए शुष्क जलवायु जहां पर बारिश 50-60 सेंटीमीटर होती है, सही रहती है. संतरा व नीबू के लिए गरम, पाला रहित व नम जलवायु जहां बारिश 100-150 सेंटीमीटर होती है, सही रहती है. नीबू हर जगह उगाया जा सकता है. वैज्ञानिक नाम साइट्रस  आशा मेनसिस है। विटामिन-सी से भरपूर जामिर का अपने पहाड़ पर सदियों से दवा के रूप में उपयोग होता रहा है। जामिर के रस को पकाकर उससे तैयार काढ़े का चटनी में प्रयोग किया जाता है। काढ़ा लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। जामिर के काढ़े की दो-चार बूंदे पेट के कीड़ों को मारने में सक्षम हैं। पहले कूटा, जमतड़ी, अस्कोट, बगड़ीहाट में जामिर बहुतायत में होता था। अब इलाके में जामिर के 8-10 ही पेड़ रह गए हैं। बुजुर्ग कहते हैं कि पहले पहाड़ पर जामिर बहुत ज्यादा होता था। सर्दियों में नमक, चीनी, शहद डालकर लोग जामिर खाते थे। पहले अस्पताल नहीं हुआ करते थे तो उस समय पेट के कीड़ों को मारने के लिए जामिर का ही सहारा था। आजकल की पीढ़ी इसका उपयोग नहीं जानती है। कहते हैं जामिर को संरक्षित करने की जरूरत है। उद्यान सचल दल प्रभारी कहते हैं कि नीबू और बड़ा नीबू (चूख) के पौधे उपलब्ध हैं, लेकिन जामिर के पौधे उपलब्ध नहीं हैं।जामिर पेट के कीड़े मारने में कारगर है। यह मानव और जानवरों पर एक सा असर करता है। इसका कास्मेटिक इंडस्ट्रीज में भी उपयोग होता है। पकाया रस सालों तक काम आता है नीबू प्रजाति का जामिर विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया है। संरक्षण का अभाव जामिर के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। जामिर फल औषधीय गुणों से युक्त है। इसके लिए प्रख्यात डीडीहाट विकासखंड का जामिर गांव में जामिर फल के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। 30 साल पहले गांव में बहुतायत में जामिर का उत्पादन होता था। यहां की मिट्टी से जामिर की खुशबू की महक आती थी, लेकिन पिछले 10 साल से जामिर का फल ढूंढने से भी मिलना मुश्किल हो गया है।जमतड़ी गांव का जामिर तोक तीस साल पहले जामिर फल के नाम से जाना जाता था। क्षेत्र में बहुतायत में जामिर फल होने के कारण लोगों ने इस क्षेत्र का नाम जामिर रख दिया। गांव के लोग जामिर फल बेचकर जीवनयापन करते थे। औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण अधिकतर परिवार इसका रस निकालने के बाद इसका काढ़ा बनाकर बेचते थे, लेकिन पिछले दस सालों में ग्रामीणों के इस फल को नजर लग गई है। संरक्षण के अभाव और पेड़ों को रोग लगने के कारण जामिर फल अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। अब क्षेत्र में मात्र दस पेड़ ही बचे हैं। खूटा, जमतड़ी, अस्कोट, बगड़ीहाट में जामिर फल होता था। जामिर का रस पेट के कीड़े मारने में कारगर साबित होता है। जामिर का रस मनुष्य और जानवरों पर समान असर करता है। सौंदर्य प्रसाधन के उत्पादों में भी इसका उपयोग होता है। इसका संरक्षण करना जरूरी है। पहले क्षेत्र में बहुतायत में जामिर का उत्पादन होता था। चटनी, आचार में इसका बहुतायत उपयोग होता है। पहले पेट में कीड़े होने पर लोग इसी के काढ़े का प्रयोग करते थे। सर्दियों में भी इसका प्रयोग फायदेमंद है। एक दौर था जब सोरघाटी और उसके आस-पास के इलाकों में सिट्रस फलों का जमकर पैदावार होता था. लेकिन पिछले एक दशक में जहां सिट्रस फलों की पैदावार कम हुई है, वहीं इन फलों की गुणवत्ता में भी कमी आई है. उच्च हिमालयी इलाकों में सिट्रस फलों की पैदावार आज भी अच्छी है. इन इलाकों में पैदा होने वाले नींबू प्रजाति के फलों में उच्च क्वालिटी का विटामिन “सी” होता है, लेकिन निचले इलाकों में अब ये पूरी तरह खत्म होने की कगार पर है. बदलते मौसम का असर पर्वतीय इलाकों की बागवानी पर भी देखने को मिल रहा है। खासकर सोरघाटी पिथौरागढ़ में सिट्रस फलों की पैदावार में। एक दौर था जब सोरघाटी और उसके आस-पास के इलाकों में सिट्रस फलों जमकर पैदावार होती थी। लेकिन पिछले एक दशक में जहां सिट्रस फलों की पैदावार कम हुई है, वहीं इन फलों की गुणवत्ता में भी कमी आई है। उच्च हिमालयी इलाकों में सिट्रस फलों की पैदावार आज भी अच्छी है। इन इलाकों में पैदा होने वाले नींबू प्रजाति के फलों में उच्च क्वालिटी का विटामिन “सी” होता है। लेकिन निचले इलाकों में अब ये पूरी तरह खत्म होने की कगार पर है। साथ ही इन फलों की गुणवत्ता भी काफी कमी आयी है। सिट्रस फलों कम हो रही पैदावार ने कास्तकारों की रोजी-रोटी को संकट में डाल दिया है। जानकार इसके लिए बढ़ते तापमान को वजह बता रहे हैं। साथ ही बागवानी की नई तकनीक की कमी भी सिट्रस फलों की कम पैदावार के लिए जिम्मेदार है।इसके लिए अभी से ही प्रकृति संरक्षण की दिशा में काम करने की जरूरत है.लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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